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Maharashtra Politics: महाराष्ट्र के नांदेड में सूखे की समीक्षा बैठक के दौरान काजू-बादाम और सूखे मेवे की तस्वीरें सामने आने के बाद सियासी बवाल मच गया. बैठक की अध्यक्षता कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे कर रहे थे. विपक्ष ने आरोप लगाया कि जब किसान फसल बर्बाद होने और पानी की कमी से परेशान हैं तब नेताओं और अधिकारियों के सामने ऐसी शाही व्यवस्था किसानों के जख्म पर नमक छिड़कने जैसी है. रोहित पवार ने सरकार से सूखे की स्थिति को गंभीरता से लेने और किसानों को राहत देने की मांग की. उन्होंने सूखा घोषित करने की प्रक्रिया और सरकारी आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठाए.
महाराष्ट्र के नांदेड में सूखा समीक्षा बैठक के दौरान काजू-बादाम की तस्वीरों पर विवाद बढ़ गया.
न्यूज18 मराठी
महाराष्ट्र के नांदेड में सूखे की समीक्षा बैठक चल रही थी. सामने किसानों का संकट था. खेतों में फसल बर्बाद होने की चिंता थी. पानी की किल्लत का सवाल था. चारे का संकट भी किसानों और पशुपालकों की परेशानी बढ़ा रहा है. इसी बीच बैठक से जुड़ा एक वीडियो और तस्वीरें चर्चा में आ गईं. दावा किया जा रहा है कि कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे की मौजूदगी में नेता और अधिकारी काजू-बादाम समेत सूखे मेवे खाते नजर आए. बस फिर क्या था इसे लेकर सियासी बवाल शुरू हो गया. विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए इसे किसानों के प्रति असंवेदनशीलता बताया. सवाल यह उठ रहा है कि जब मराठवाड़ा का किसान बारिश और सूखे की मार झेल रहा है तब समीक्षा बैठक में ऐसी व्यवस्था क्यों दिखाई दी.
नांदेड की इस बैठक में सूखे की स्थिति और उससे निपटने के उपायों पर चर्चा होनी थी. लेकिन बैठक की शुरुआत से पहले सामने आई तस्वीरों ने पूरी चर्चा का रुख बदल दिया. एक तरफ किसान फसल खराब होने के बाद आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. दूसरी तरफ बैठक में मौजूद लोगों के सामने काजू-बादाम और दूसरे सूखे मेवे रखे होने को लेकर सवाल खड़े हो गए. विपक्ष ने इसे किसानों के जख्म पर नमक छिड़कने जैसा बताया. हालांकि काजू-बादाम खाने की तस्वीर या वीडियो अपने आप में किसी नीति या निर्णय का प्रमाण नहीं है. विवाद का केंद्र यह है कि सूखे जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बैठक के दौरान दिखाई गई यह व्यवस्था किसानों के बीच किस तरह का संदेश देती है.
सूखे की बैठक में काजू-बादाम पर क्यों मचा बवाल?
नांदेड में कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे की अध्यक्षता में सूखे की समीक्षा बैठक आयोजित की गई थी. बैठक में जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद थे. इसी दौरान काजू-बादाम और सूखे मेवों की तस्वीरें सामने आईं. विपक्ष ने इसे मुद्दा बना लिया. आलोचना का आधार यह है कि जिस समय किसान अपनी फसल बचाने और आर्थिक नुकसान से निकलने के लिए सरकार से मदद की उम्मीद कर रहे हैं उसी समय समीक्षा बैठक में ऐसी व्यवस्था दिखाई देना संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करता है.
मराठवाड़ा में किसान कई मोर्चों पर परेशान
मराठवाड़ा में कम बारिश और गिरते भूजल स्तर ने किसानों की चिंता बढ़ाई है. सोयाबीन कपास और अरहर जैसी फसलों को नुकसान होने की बात सामने आ रही है. कई किसानों ने दोबारा बुआई पर भी खर्च किया लेकिन उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली. फसल खराब होने से बीज खाद और मजदूरी पर किया गया खर्च निकालना मुश्किल हो गया है. इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में कुओं और ट्यूबवेल का जलस्तर घटने से पीने के पानी का संकट भी गहरा सकता है. पशुपालकों के सामने चारे की समस्या अलग है. ऐसे में किसान कर्ज और अगले मौसम की खेती को लेकर भी चिंतित हैं.
रोहित पवार ने सरकार से पूछा बड़ा सवाल
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता रोहित पवार ने इस मामले को लेकर सरकार पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि राज्य में सूखे की स्थिति गंभीर है और सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए. उन्होंने विशेष सत्र बुलाकर सूखे पर विस्तृत चर्चा करने और किसानों को राहत देने की मांग की. रोहित पवार ने सूखा घोषित करने की प्रक्रिया का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक जिला स्तर से लेकर विभागीय और राज्य स्तर तक रिपोर्ट तैयार करने की समयसीमा तय है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर जून जुलाई और अगस्त की स्थिति से जुड़ा जरूरी आंकड़ा समय पर तैयार नहीं हुआ है तो यह प्रशासन के लिए गंभीर विषय है. उन्होंने इसी संदर्भ में तंज कसते हुए पूछा कि क्या बैठकों में मंत्री और अधिकारी सिर्फ काजू-बादाम खाने के लिए आते हैं.
अब नजर सरकार की अगली कार्रवाई पर
नांदेड की बैठक से सामने आई तस्वीरों ने सूखे के मुद्दे को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है. किसानों के लिए असली सवाल राहत और नुकसान के आकलन का है. फसल खराब होने के बाद उन्हें आर्थिक मदद कब मिलेगी. पानी और चारे की व्यवस्था कैसे होगी. सूखे की स्थिति का आधिकारिक आकलन किस आधार पर किया जाएगा. इन सवालों पर सरकार की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी. फिलहाल काजू-बादाम वाली तस्वीर ने एक प्रशासनिक बैठक को सियासी मुद्दा जरूर बना दिया है. विपक्ष इसे किसानों के प्रति संवेदनशीलता से जोड़ रहा है जबकि आगे की चर्चा सूखे के वास्तविक आकलन और राहत उपायों पर टिकेगी.