टैंक बंड पर क्यों खड़ा है पाकिस्तान का ये टैंक? पीछे छिपी है वीरता की कहानी
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Hussain Sagar Tank: हैदराबाद के टैंक बंड पर खड़ा हरा सैन्य टैंक महज एक शोपीस नहीं, बल्कि 1971 के भारत-पाक युद्ध और भारतीय सेना के शौर्य की ऐतिहासिक निशानी है. यह पाकिस्तानी सेना का अमेरिकी निर्मित M47 पैटन टैंक है, जिसे बैटल ऑफ बसंतर के बाद युद्ध स्मृति चिन्ह के रूप में सुरक्षित रखा गया. 54वीं इन्फैंट्री डिवीजन ने 1973 में इसे हैदराबाद और सिकंदराबाद के नागरिकों को समर्पित किया था.
हैदराबाद. हुसैन सागर झील के किनारे स्थित टैंक बंड हैदराबाद के सबसे लोकप्रिय और व्यस्त इलाकों में गिना जाता है. यहां से रोज़ाना गुज़रने वाले हज़ारों लोगों की नज़र किनारे पर रखे एक बड़े हरे सैन्य टैंक पर ज़रूर पड़ती है. कई लोग इसे महज़ एक सामान्य शोपीस या शहर की सजावट का हिस्सा मान लेते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह टैंक भारतीय सेना की बहादुरी और 1971 के भारत-पाक युद्ध की ऐतिहासिक जीत का जीता-जागता गवाह है. टैंक पर लिखी जानकारी अनुसार, टैंक यह बंड पर प्रदर्शित यह लड़ाकू वाहन कोई साधारण टैंक नहीं, बल्कि पाकिस्तान सेना का अमेरिकी निर्मित M47 पैटन टैंक है. दिसंबर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पंजाब-जम्मू सीमा के पास लड़ा गया बैटल ऑफ बसंतर टैंकों की सबसे भीषण और निर्णायक जंगों में से एक माना जाता है.
इस लड़ाई में भारतीय सेना की 54वीं इन्फैंट्री डिवीज़न, जिसे बाइसन डिवीज़न के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तानी सेना के बख्तरबंद हमलों को पूरी तरह विफल कर दिया था. इस दौरान दुश्मन के दर्जनों टैंक तबाह किए गए और कई टैंकों को भारतीय जवानों ने अपने कब्जे में ले लिया. युद्ध खत्म होने के बाद, इस पाकिस्तानी टैंक को एक युद्ध स्मृति चिन्ह के रूप में सहेज लिया गया.
54वीं इन्फैंट्री डिवीज़न की स्थापना अक्टूबर 1966 में हैदराबाद-सिकंदराबाद में ही हुई थी इसलिए, इस डिवीज़न के तत्कालीन कमांडर मेजर जनरल डब्ल्यू.ए.जी. पिंटो और सभी सैनिकों ने स्थानीय जनता के निरंतर सहयोग और सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए 26 नवंबर 1973 को यह टैंक हैदराबाद और सिकंदराबाद के नागरिकों को समर्पित कर दिया. टैंक के चबूतरे पर लगी पट्टिका पर Bash on Regardless यानी बिना परवाह किए आगे बढ़ो लिखा है जो 54वीं इन्फैंट्री डिवीज़न का आधिकारिक आदर्श वाक्य था. आज भी यह ऐतिहासिक टैंक नई पीढ़ी को भारतीय सैनिकों के पराक्रम, बलिदान और 1971 की उस गौरवशाली जीत की याद दिलाता है.