नई दिल्ली (DUSU Election Result History). दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ और साउथ कैंपस की सड़कों पर सितंबर की ठंडी हवाओं के साथ पर्चे उड़ने शुरू होते हैं तो समझ लीजिए कि देश की राजधानी का सियासी पारा अपने चरम पर है. डीयू छात्रसंघ यानी डूसू चुनाव सिर्फ कॉलेजों के कुछ नुमाइंदे चुनने का जरिया नहीं हैं. यह देश की मुख्यधारा की राजनीति की वो नर्सरी हैं, जहां से कई बड़े राष्ट्रीय नेता अपनी सियासी जमीन तैयार करते हैं. डूसू चुनाव के पिछले 10 सालों के पन्ने पलटें तो साफ नजर आता है कि यहां की जंग किसी आम लोकसभा या विधानसभा चुनाव से कम रोमांचक नहीं होती.
डूसू चुनाव में पिछले 10 सालों में किसका दबदबा रहा?
पिछले 10 सालों के चुनावी आंकड़ों का हिसाब लगाया जाए तो पलड़ा भारी तौर पर एबीवीपी के पक्ष में झुका नजर आता है. साल 2014, 2015, 2016 और उसके बाद के कई अन्य सालों में एबीवीपी ने मुख्य पदों पर एकछत्र राज किया और कई बार पैनल पर क्लीन स्वीप भी किया. हालांकि, ऐसा नहीं है कि मुकाबला एकतरफा रहा हो. बीच-बीच में एनएसयूआई (NSUI) ने भी जोरदार वापसी करते हुए प्रेसिडेंट या वाइस प्रेसिडेंट जैसे अहम पदों पर कब्जा जमाकर साबित कर दिया कि कैंपस की हवा किस तरफ बह रही है, इसका अनुमान लगाना कभी आसान नहीं होता.
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के प्रमुख चेहरे
इन 10 सालों में कई ऐसे नाम उभरे जिन्होंने डीयू के गलियारों से निकलकर सुर्खियां बटोरीं.
वर्ष 2014-15
अध्यक्ष: मोहित नागर (ABVP)
उपाध्यक्ष: प्रवेश मलिक (ABVP)
वर्ष 2015-16
अध्यक्ष: सतेंदर अवाना (ABVP)
उपाध्यक्ष: सनी सिहाग (ABVP)
वर्ष 2016-17
अध्यक्ष: अमित तंवर (ABVP)
उपाध्यक्ष: प्रियंका छिब्बर (ABVP)
वर्ष 2017-18
अध्यक्ष: रॉकी तुषार तंवर (NSUI)
उपाध्यक्ष: कुणाल सहरावत (NSUI)
वर्ष 2018-19
अध्यक्ष: अंकश बैसला (ABVP)
उपाध्यक्ष: शक्ति सिंह (ABVP)
वर्ष 2019-20
अध्यक्ष: अक्षित दहिया (ABVP)
उपाध्यक्ष: प्रदीप तंवर (ABVP)
वर्ष 2020 और 2021- (कोविड-19 महामारी के कारण चुनाव आयोजित नहीं किए गए थे)
वर्ष 2022 (शैक्षणिक कैलेंडर और अन्य कारणों से चुनाव नहीं हुए)
वर्ष 2023-24
अध्यक्ष: तुषार डेडा (ABVP)
उपाध्यक्ष: अभि दहिया (NSUI)
वर्ष 2024-25
अध्यक्ष: रौनक खत्री (NSUI)
उपाध्यक्ष: यश नांदल (ABVP)
वर्ष 2025-26
अध्यक्ष: आर्यन मान (ABVP)
उपाध्यक्ष: राहुल झंसला (NSUI)
इन पदों पर जीतने वाले ज्यादातर चेहरे आगे चलकर अपनी-अपनी पार्टियों के युवा मोर्चों या राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि डूसू चुनाव राजनीतिक दलों के लिए किसी लैब से कम नहीं हैं.
महिला कैंडिडेट्स की स्थिति: आगे बढ़ने की चुनौती
डूसू चुनावों में महिला उम्मीदवारों की भागीदारी संवेदनशील और चर्चा का विषय रही है. पिछले एक दशक में दीपिका झा जैसी तेज-तर्रार महिला नेताओं ने सचिव और संयुक्त सचिव जैसे पदों पर जीत हासिल की है. लेकिन अध्यक्ष या उपाध्यक्ष जैसे टॉप पदों पर महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले काफी कम है. बीच में अनन्या जैसी छात्राओं को अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतारा गया है. इससे पता चलता है कि छात्र संगठनों पर जेंडर रिप्रेजेंटेशन बढ़ाने का दबाव है. बावजूद इसके, टिकट बंटवारे से लेकर जमीनी प्रचार तक महिलाओं को आज भी पितृसत्तात्मक सोच और पुरुष-प्रधान कैंपस राजनीति से संघर्ष करना पड़ता है.
वोटर टर्नआउट और बदलता छात्रों का मिजाज
डूसू चुनाव में मतदान प्रतिशत हमेशा से बहस का मुद्दा रहा है. पिछले 10 सालों में यह आंकड़ा 35% से 45% के बीच ही घूमता रहा है. इसका मतलब है कि डीयू के ढाई से पौने तीन लाख मतदाताओं में से आधे से ज्यादा छात्र वोट डालने आते ही नहीं हैं. दरअसल राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और समर्थक तो अपनी पूरी ताकत झोंकते हैं, लेकिन आम कॉलेज छात्र इन हंगामों, क्लास सस्पेंड होने और ट्रैफिक जाम से दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं. हालांकि, जब भी कोई बड़ा स्थानीय मुद्दा (जैसे मेट्रो कंसेशनल पास, हॉस्टल की भारी कमी या फीस बढ़ोतरी) सामने आता है तो टर्नआउट में हल्का उछाल जरूर देखने को मिलता है.
निष्कर्ष: क्या बदला और क्या बाकी है?
पिछले 10 सालों का सफर बताता है कि डूसू चुनाव केवल वैचारिक लड़ाई नहीं रह गई है. यह मैनेजमेंट, रिसोर्स और सोशल मीडिया कैंपेन की जंग बन चुका है. पर्चों और दीवारों पर पोस्टर चिपकाने के पुराने तरीकों से लेकर इंस्टाग्राम रील्स और डिजिटल मेनिफेस्टो तक का सफर तय कर चुका यह चुनाव छात्रों के दिलों पर राज करता है. भले ही नेता चुनाव जीतने के बाद बड़े-बड़े वादे करते हों, लेकिन कैंपस की जमीनी हकीकत और छात्रों की बेसिक समस्याएं आज भी वहीं खड़ी हैं. देखना यह है कि आने वाले सालों में क्या डीयू का यह चुनाव सिर्फ रैलियों और ग्लैमर तक सीमित रह जाएगा या विकास की धुरी बनेगा.