DUSU Election History: संसद से सत्ता के गलियारों तक, डीयू छात्रसंघ की ‘गोल्डन नर्सरी’ के इन 5 चेहरों ने रचा इतिहास

DUSU Election History: संसद से सत्ता के गलियारों तक, डीयू छात्रसंघ की ‘गोल्डन नर्सरी’ के इन 5 चेहरों ने रचा इतिहास


नई दिल्ली (DUSU Election). दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव का इतिहास काफी पुराना है. डूसू चुनाव हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं. इन्हें राजनीति की नर्सरी कहा जाता है. यह कुछ कॉलेजों के प्रतिनिधियों को चुनने भर का उत्सव नहीं होता. डूसू चुनाव देश की राजनीति का वह शुरुआती पायदान हैं, जहां से देश की तकदीर और तस्वीर बदलने वाले कई धुरंधर निकले हैं. डूसू चुनाव सिर्फ छात्र नेता नहीं चुनते, बल्कि देश के भावी केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री या संसद के दिग्गज चेहरे की राजनीतिक यात्रा की नींव रख रहे होते हैं.

डीयू कैंपस के इन गलियारों में पर्चे बांटने, नारेबाजी करने और नुक्कड़ सभाओं में पसीना बहाने वाले कई युवा आज राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता के शीर्ष पदों पर विराजमान हैं. इतिहास गवाह है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी का चुनावी अखाड़ा भारत की मुख्यधारा की राजनीति के लिए सबसे बड़ी ‘नर्सरी’ साबित हुआ है. चाहे वित्त मंत्रालय की कमान संभालना हो, देश के खेल महकमे को चलाना हो या राज्यों की कमान अपने हाथों में लेनी हो- डीयू की राजनीतिक प्रयोगशाला ने एक से बढ़कर एक सियासी सितारे देश को दिए हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से निकले राजनीति के दिग्गज

दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस से निकलकर संसद तक पहुंचने वालों में अरुण जेटली, अजय माकन, विजय गोयल, अलका लांबा और रेखा गुप्ता आदि शामिल हैं. जानिए उनका सफर.

अरुण जेटली से अजय माकन तक: दिग्गजों का शुरुआती सफर

दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति का जिक्र आते ही सबसे पहला नाम दिवंगत अरुण जेटली का आता है. श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) में पढ़ाई के दौरान उन्होंने साल 1974 में एबीवीपी (ABVP) के टिकट पर डूसू अध्यक्ष का चुनाव जीता था. आपातकाल के दौरान छात्र आंदोलनों की आग में तपकर निकले जेटली ने आगे चलकर देश के वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री और राज्यसभा में सदन के नेता जैसे अहम पद संभाले.

इसी तरह, हंसराज कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने वाले अजय माकन ने साल 1985 में महज 21 साल की उम्र में एनएसयूआई (NSUI) के बैनर तले डूसू अध्यक्ष का चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया था. वे न सिर्फ दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री बने, बल्कि यूपीए सरकार के दौरान केंद्रीय खेल मंत्री और आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री (Minister for Urban Poverty Alleviation) जैसे बड़े पदों पर भी रहे.

विजय गोयल और अलका लांबा: संघर्ष से शिखर तक

साल 1977-78 के दौरान एबीवीपी के बैनर तले डूसू अध्यक्ष बने विजय गोयल ने भी अपनी राजनीतिक जमीन इसी कैंपस से तैयार की थी. बाद में उन्होंने वाजपेयी और मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री की जिम्मेदारी निभाई. वहीं, साल 1995 में एनएसयूआई से भारी मतों से डूसू अध्यक्ष चुनी गईं अलका लांबा अपनी तेजतर्रार भाषण शैली के दम पर कैंपस की सबसे चर्चित महिला नेताओं में रहीं. बाद में वह विधायक और ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष तक बनीं.

रेखा गुप्ता और अन्य चर्चित नाम: मुख्यमंत्री के ताज तक का सफर

दौलत राम कॉलेज की छात्रा रहीं रेखा गुप्ता ने 1996-97 में ABVP से डूसू अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था. उन्होंने कैंपस में छात्राओं की सुरक्षा और हॉस्टल के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय रहते हुए महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं. 1991 के ऐतिहासिक मंडल आयोग विरोध प्रदर्शनों के चर्चित चेहरे राजीव गोस्वामी, नूपुर शर्मा, रागिनी नायक और डूसू के पहले अध्यक्ष रहे गजराज बहादुर नागर (जो बाद में हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री बने) जैसे कई नाम इस लिस्ट में शामिल हैं.

डूसू की चमक आज भी क्यों है बरकरार?

डीयू में स्टूडेंट्स को अपने मतों का इस्तेमाल करते देख स्पष्ट है कि यह डूसू चुनाव सिर्फ कागजी वादों या पोस्टरों की नुमाइश नहीं है. यह युवाओं को नेतृत्व क्षमता सिखाने और उन्हें देश की बड़ी राजनीतिक चुनौतियों के लिए तैयार करने का जीवंत मंच भी है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के इन गलियारों से शुरू हुआ सफर साबित करता है कि जो युवा आज कैंपस की किसी टपरी पर बहस कर रहा है, कल वह देश की संसद में नीति निर्धारण कर रहा हो सकता है.



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