बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक निजी चैनल के कार्यक्रम के मंच से भरत तिवारी एनकाउंटर मामले पर कहा कि इस मामले में पुलिस से भारी गलती हुई थी. एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का अपनी ही सरकार में हुई गलती की स्वीकारोक्ति सामान्य प्रशासनिक जवाब भर नहीं मानी जा सकती है. दरअसल, किसी सरकार के मुखिया का पुलिस कार्रवाई में गलती स्वीकार करना अपने आप में राजनीतिक जवाबदेही का बड़ा संदेश भी देता है. इसी कड़ी में सीएम सम्राट की अगली बात और भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने साफ कहा कि पुलिस को काम करने की पूरी आजादी मिलेगी, लेकिन जवाबदेही की जिम्मेदारी होगी. साफ है कि सम्राट सरकार का मॉडल पुलिस को कमजोर करने का नहीं, बल्कि पुलिस की कार्रवाई को और अधिक जवाबदेह बनाने का संदेश है.
दरअसल, यह सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि 26 साल के समाजसेवी भरत भूषण तिवारी की मौत के बाद ब्राह्मण समाज में भारी नाराजगी है और बीजेपी के भीतर ही इसे सवर्णों के प्रति पार्टी के भीतर दुराग्रह भी कहा गया. इसको राजनीतिक-सामाजिक समीकरण की दृष्टि से देखें तो बिहार में ब्राह्मण वोट 3 से 4 प्रतिशत है, लेकिन शाहपुर, बक्सर, आरा, बक्सर-भोजपुर बेल्ट में निर्णायक है. सम्राट चौधरी खुद पिछड़े वर्ग के चेहरे के तौर पर उभरे हैं, जबकि दूसरी ओर बीजेपी को सवर्ण मतदाताओं का भरोसा भी आवश्यक रूप से चाहिए. इसलिए मंच से गलती मानना सीधे ब्राह्मणों को मनाने की कोशिश कही जा रही है. हालांकि, पहलू का दूसरा राजनीतिक कोण भी है.
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं, भरत तिवारी एनकाउंटर पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का बयान पहली नजर में पुलिस की गलती स्वीकार करने और परिवार को न्याय का भरोसा देने वाला बयान है. लेकिन, बिहार की राजनीति में इसे केवल कानून-व्यवस्था के चश्मे से देखना अधूरा होगा. इस बयान के पीछे एक और सवाल है. क्या नई सरकार उस राजनीति से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है, जिसमें पुलिस को अपराध के खिलाफ खुली छूट देना और आम लोगों, विशेषकर सवर्ण समाज की शिकायतों को अलग-अलग तरीके से संभालना दो अलग राजनीतिक रेखाएं थीं. यहां सीएम सम्राट चौधरी ने एक ही मंच से दोनों संदेश देने की कोशिश की है. पुलिस को काम करने की आजादी भी मिलेगी और गलती पर पुलिस भी बचेगी नहीं.
क्या है भरत तिवारी एनकाउंटर की पृष्ठभूमि
भोजपुर के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव निवासी 26 वर्ष के भरत भूषण तिवारी 17 जून 2026 को पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे. पुलिस का दावा था कि वह पिस्टल लेकर हवाई फायरिंग कर रहे थे, इसी बीच STF के सरेंडर कहने पर भी पुलिस पर 8 से 10 राउंड फायर किए, जवाबी कार्रवाई में पैर में गोली लगी और पटना के पीएमसीएच में मौत हो गई. लेकिन फेसबुक लाइव वीडियो वायरल होने के बाद कहानी पलट गई. वीडियो में भरत पिस्टल फेंककर सरेंडर करता दिख रहा था. स्थानीय लोग उसे बाढ़ पीड़ितों और विस्थापितों के लिए लड़ने वाला समाजसेवी मानते थे. लेकिन, भरत तिवारी के कथित फर्जी एनकाउंटर की बात सामने आई तो पुलिस-प्रशासन के खिलाफ लोगों का भारी गुस्सा दिखने लगा. आरा-बक्सर फोरलेन जाम किया गया, प्रदर्शन हुए और सत्ताधारी बीजेपी नेताओं ने भी भोजपुर पुलिस को घेरा.
48 घंटे में न्यायिक कमेटी और फिर FIR
सम्राट चौधरी ने भरे मंच पर कहा कि सरकार ने घटना के 48 घंटे के अंदर हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में न्यायिक कमेटी बना दी थी. कमेटी की रिपोर्ट में पुलिस की चूक सामने आई. इसके बाद 4 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया गया, तत्कालीन शाहपुर थानाध्यक्ष राजेश मालाकार और जगदीशपुर एसडीपीओ राजेश शर्मा समेत कई अधिकारियों पर 22 जून को केस नंबर 178/26 दर्ज हुआ. कुछ लोगों को जेल भी भेजा गया. मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार भरत तिवारी के परिवार के साथ खड़ी है. परिवार को आर्थिक सहायता दी गई है और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा भी की गई है. DM-SP खुद बिलौटी गांव जाकर परिवार से मिले और सुरक्षा में गार्ड दिया. साफ है कि सरकार अब इस मामले को दबाने या केवल पुलिस का बचाव करने के बजाय ‘गलती हुई, जांच हुई, कार्रवाई हुई’ वाले नैरेटिव में बदलना चाहती है.
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि, सम्राट चौधरी के बयान का वास्तविक सार तो यह है कि असली सवाल ब्राह्मणों या सवर्णों की नाराजगी नहीं, बल्कि ‘न्याय की विश्वसनीयता’ भी है. इस मामले को सवर्ण नाराजगी से जोड़ना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक है क्योंकि भरत तिवारी की सामाजिक पहचान ने इसे जातीय विमर्श में पहुंचाया. लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी समुदाय की नाराजगी केवल मुआवजा, नौकरी और बयान से खत्म होती है… संभवतः नहीं! किसी परिवार को आर्थिक सहायता और नौकरी देना तत्काल राहत हो सकती है, लेकिन राजनीतिक विश्वास तब होता है जब जनता में यह भरोसा पैदा हो कि जिस व्यवस्था ने गलती की, उसी व्यवस्था ने अपनी गलती स्वीकार भी की और दोषियों पर कार्रवाई भी की.
यहां से UGC और परीक्षा विवाद जुड़ता है
यहीं कहानी का दूसरा सिरा खुलता है. बिहार में UGC के नियमों, विश्वविद्यालयों की नियुक्ति व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी को लेकर अलग-अलग वर्गों में असंतोष है. परीक्षा आंदोलन के दौरान सीवान में पुलिसवाले के AK 47 से फायरिंग का मामला भी चाहे-अनचाहे इसी बड़ी बहस का हिस्सा बन गया. इन घटनाओं को एक ही राजनीतिक मुद्दा मानना सही नहीं होगा. लेकिन इनमें एक साझा तत्व जरूर है- व्यवस्था पर भरोसा. युवा पूछ रहे हैं कि परीक्षाएं निष्पक्ष होंगीं या नहीं. शिक्षक औप छात्र पूछ रहे हैं कि विश्वविद्यालयों में नियम किनके मुताबिक लागू होंगे, और भरत तिवारी केस में सवाल यह उठा कि पुलिस की कार्रवाई कितनी निष्पक्ष थी? यानी तीनों मुद्दों के केंद्र में अलग-अलग वर्ग हैं, लेकिन सवाल एक है- क्या सिस्टम अपने फैसले के लिए जवाबदेह है?
SC-ST एक्ट ने भी मामले को दूसरी दिशा दी
भरत तिवारी प्रकरण के विवाद के बीच SC-ST एक्ट का मुद्दा भी सामने आया. कहा जा रहा है कि इस एक्ट से सवर्णों को टारगेट किया जा रहा है जिससे सवर्णों में भारी नाराजगी है. सियासी जमीन पर भी भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण, यूजीसी रेगुलेशन और एससी एसटी एक्ट जैसे मुद्दे ने असर भी दिखाना शुरू कर दिया है. बिहार की राजधानी पटना की बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर की जीत को इस नाराजगी से जोड़कर देखा गया. वहीं, हाल में ही राजस्थान निकाय चुनाव में भी निर्दलीयों की भारी जीत ने भाजपा नेताओं के कान खड़े कर दिए हैं. आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं तो ऐसे में बीजेपी के लिए अब तीसरी बार जीत चुनौती सामने खड़ी दिख रही है.
‘अगड़ों के वोट’ से ज्यादा बड़ा है यह सवाल
बिहार की राजनीति में हर विवाद को जातीय वोट के चश्मे से देखना आसान है. भरत तिवारी मामले में भी यही हो रहा है. लेकिन शायद इस मामले का बड़ा राजनीतिक अर्थ इससे थोड़ा अलग है. आगे यूपी चुनाव भी है और नाराज तबका और भरत तिवारी का यह मामला सीधा सवाल पूछ रहा है कि क्या बीजेपी सरकार अपने समर्थक सामाजिक वर्गों से भी असहमति या शिकायत आने पर उसी तरह जवाबदेही दिखाएगी, जैसे वह दूसरे वर्गों के मामले में दिखाने का दावा करती है. दरअसल, भारती जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी पता है कि अभी तक सवर्णों की नाराजगी भाजपा को हराने के लिए खुलकर सामने नहीं आई है, और न ही विपक्ष को स्पेस देने का कोई सियासी सीन दिखा है, ऐसे में वक्त रहते ही इस गुस्से को संभालने की कवायद शुरू हो चुकी है. पहल सम्राट चौधरी ने कर दी है और यह यूपी का रास्ता तय करेगा, यह भी तय है. लेकिन असली चुनौती यह है कि भरत तिवारी पर सम्राट चौधरी की माफी पॉलिटिक्स से क्या भाजपा के लिए सवर्णों की नाराजगी दूर हो पाएगी?