Nestle Controversy: मल्टिनैशनल कंपनी नेस्ले एक बार फिर से विवादों के घेरे में है. साल 2015 के ‘मैगी नूडल्स’ विवाद के एक दशक बाद एक बार फिर भारत में गंभीर रेगुलेटरी जांच और कानूनी पचड़े में फंस गई है. इस बार मामला बच्चों के खानपान यानी बेबी फूड प्रोडक्ट्स और इन्फेंट फॉर्मूला से जुड़ा है. भारतीय खाद्य सुरक्षा नियामक (FSSAI) की तरफ से नेस्ले के प्रोडक्ट्स पर कड़ी कानूनी कार्रवाई शुरू किए जाने के बाद से यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि क्या कंपनी ने भारत जैसे बड़े और मुनाफे वाले बाजार में अपनी फॉर्मूलेशन और क्वालिटी की नीतियों से समझौता किया है?
बायोटिन की कमी
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाल ही में नेस्ले के ‘फॉलो-अप फॉर्मूला’ के सैंपल की जांच की. यह बच्चों के लिए एक दूध का प्रोडक्ट है, जिसमें वह तय मानकों पर खरा नहीं उतरा. दोबारा एनालिसिस में पता चला कि इस प्रोडक्ट में बायोटिन यानी विटामिन B7 की क्वांटिटी निर्धारित कानूनी मानदंडों के अनुसार नहीं थी.
भ्रामक दावों पर केस
FSSAI ने नेस्ले के दो अन्य लोकप्रिय बेबी फूड उत्पादों NAN Excella Pro Stage 1 और Lactogen Pro 1 पर भी विज्ञापनों और लेबलों के भ्रामक दावे करने के आरोप में अलग से मामले दर्ज किए हैं. कुल मिलाकर कंपनी के खिलाफ 3 अलग-अलग एडजुडिकेशन केस दर्ज किए गए हैं.
शेयरों पर कैसा असर
इस खबर के सामने आने के बाद भारतीय शेयर बाजार में नेस्ले इंडिया के शेयरों में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.
भारत का मार्केट और नेस्ले
भारत असल में नेस्ले के लिए दुनिया के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण मार्केट्स में से एक है. मार्च में खत्म हुए फाइनैंशियल ईयर्स में दूध और न्यूट्रिशन प्रोडक्ट्स की बिक्री नेस्ले इंडिया का सबसे बड़ा रेवेन्यू सेक्टर रहा है. इनमें इन्फेंट फॉर्मूला और बेबी फूड शामिल हैं. इससे कंपनी की कुल प्रोडक्ट्स बिक्री का लगभग एक तिहाई यानी 2.4 अरब डॉलर का कारोबार हुआ.
नेस्ले इंडिया ने इन कानूनी कार्रवाइयों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उसके प्रोडक्ट्स सभी लागू नियमों का पूरी तरह पालन करते है. कंपनी ने स्पष्ट किया कि लेबल पर दिए गए बयान पूरी तरह से फैक्चुअल हैं, जिन्हें वैज्ञानिक सपोर्ट हासिल है और इन्हें पहले FSSAI की एक्सपर्ट समिति की तरफ से रिकमेंड भी किया जा चुका है. कंपनी लगातार रेग्युलेटर्स संपर्क में है.
मैगी संकट का वो विवाद
यह पहली बार नहीं है जब नेस्ले को भारत में इस तरह की रेगुलेटर्स की चुनौतियों का सामना करना पड़ा हो. साल 2015 में, मैगी नूडल्स में तय सीमा से अधिक लेड यानी सीसा मिलने और लेबलिंग से जुड़ी कमियों की वजह से अधिकारियों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके चलते कंपनी को अपने प्रोडक्ट्स को भारी मात्रा में मार्केट से वापस लेना करना पड़ा था. हालांकि बाद में नए सिरे से टेस्ट पास होने के बाद मैगी ने बाजार में वापसी की थी.
किटकैट का विवाद
नेस्ले के लोकप्रिय प्रोडक्ट किटकैट को लेकर भारत में मुख्य रूप से दो बड़े विवाद सामने आए थे. एक टैक्स और प्रोडक्ट के क्लासिफिकेशन को लेकर और दूसरा धार्मिक भावनाओं से जुड़े पैकेजिंग विवाद को लेकर. 90 के दशक में प्रोडक्ट क्लासिफिकेशन को लेकर बवाल मचा था. इसमें सेंट्रल एक्साइज विभाग ने नेस्ले इंडिया पर आरोप लगाया था कि वह ‘किटकैट’ को चॉकलेट की बजाय वेफर (Wafer) बताकर कम टैक्स (10% ड्यूटी) भर रही है, जबकि इसमें चॉकलेट की मात्रा अधिक होने के कारण इस पर 20% ड्यूटी टैक्स लगना चाहिए. इस मामले में बाद में साल 1999 में सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क न्यायाधिकरण (CEGAT) ने फैसला नेस्ले के पक्ष में सुनाया और किटकैट को वेफर के रूप में मान्यता दी गई.
इसके अलावा, जनवरी 2022 में किटकैट के पैकेट्स पर ओडिशा की प्रसिद्ध ‘पट्टचित्र’ कला के तहत भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की तस्वीरें छापे जाने पर सोशल मीडिया पर भारी विरोध हुआ था. कन्ज्यूमर्स का मानना था कि इस्तेमाल के बाद इन रैपरों का कचरे में जाना धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है. इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद नेस्ले इंडिया ने तुरंत अपनी गलती स्वीकार की, लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन खास पैकेट्स को बाजार से वापस मंगा लिया और भविष्य में ऐसी सावधानियां बरतने की बात कही.
शुगर और न्यूट्रिशन विवाद
बेबी फूड को लेकर नेस्ले की ग्लोबल नीतियों पर पहले भी सवाल उठ चुके हैं. कुछ समय पहले पब्लिक आई और IFBAN की अंतरराष्ट्रीय जांच रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि नेस्ले विकासशील देशों खासतौर पर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे लोअर और मिडिल इनकम वाले देशों में बेचे जाने वाले अपने बेबी फूड प्रोडक्ट्स जैसे सेरेलैक में अतिरिक्त चीनी ऐडेड शुगर मिलाती है.
वहीं स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन जैसे डेवलप देशों में यही उत्पाद बिना चीनी के बेचे जाते हैं. हालांकि, उस समय नेस्ले ने सफाई दी थी कि वे स्थानीय मानकों और CODEX के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करते हैं और पिछले कुछ सालों में भारतीय प्रोडक्ट्स में चीनी की क्वांटिटी को काफी हद तक कम भी किया गया है.
भारत में बढ़ते खाद्य सुरक्षा नियमों की सख्ती और हालिया रेगुलेटरी ऐक्शन ने यह साफ कर दिया है कि मल्टिनैशनल कंपनियों के लिए अब उपभोक्ता के हेल्थ से जुड़े मानकों पर किसी भी प्रकार की कोताही बरतना आसान नहीं होगा. मैगी विवाद के बाद, बेबी फूड पर मंडराते इन कानूनी बादलों ने नेस्ले की साख और उसकी फॉर्मूलेशन रणनीति के सामने एक बार फिर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.