Success Story: कोविड ने पढ़ाई छीनी, गरीबी ने मजदूर बनाया… अब पहनी BSF की वर्दी; नेमाराम की कहानी दिल छू लेगी

Success Story: कोविड ने पढ़ाई छीनी, गरीबी ने मजदूर बनाया… अब पहनी BSF की वर्दी; नेमाराम की कहानी दिल छू लेगी


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Inspiring Success Story of Nemaram Chauhan: बाड़मेर के सीमावर्ती गांव भिलो का तला निवासी नेमाराम चौहान ने मुश्किल हालातों को मात देकर बीएसएफ में चयन हासिल किया है. कोविड के दौरान पढ़ाई छूटने के बाद नेमाराम को परिवार पालने के लिए गुजरात के ईंट भट्ठे पर मजदूरी करनी पड़ी. गांव के दो युवाओं के सीआईएसएफ में चयन से प्रेरणा लेकर उन्होंने फिर से पढ़ाई शुरू की. एसएससी जीडी 2025 परीक्षा पास कर नेमाराम ने 22 सप्ताह की कठिन ट्रेनिंग पूरी की है. वर्दी पहनकर गांव लौटने पर उनका भव्य स्वागत हुआ. उनका यह सफर हर युवा के लिए एक बड़ी प्रेरणा है.

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Barmer: मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है. इस कहावत को राजस्थान में बाड़मेर जिले के एक युवा नेमाराम चौहान ने पूरी तरह से सच साबित कर दिखाया है. जीवन में जब चुनौतियां पहाड़ बनकर खड़ी हो गईं, तो नेमाराम ने हार मानने के बजाय उनसे लड़ना सीखा. कोविड-19 महामारी के दौर में जब सब कुछ थम गया था, तब नेमाराम की पढ़ाई भी बीच में ही छूट गई थी. परिवार का पेट पालने और आर्थिक संकट से उबरने के लिए उन्हें अपना घर छोड़कर गुजरात जाना पड़ा. वहां उन्होंने एक ईंट भट्ठे पर अपने पिता के साथ मजदूरी की, लेकिन उन्होंने अपनी आंखों में पल रहे देश सेवा के सपने को कभी धुंधला नहीं होने दिया. आज वही नेमाराम सीमा सुरक्षा बल (BSF) में एक जवान के रूप में देश की सीमाओं की रक्षा करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं.

बाड़मेर जिले में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे गांव भिलो का तला (आरबी की गफन) के रहने वाले नेमाराम चौहान का बचपन बेहद साधारण और अभावों में बीता है. 12वीं कक्षा तक की शिक्षा पूरी करने के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई थी. इसी दौरान कोविड-19 महामारी ने हालात को और ज्यादा बिगाड़ दिया. घर की जिम्मेदारियों का बोझ उनके कंधों पर आ गया. अपने पिता विरधाराम का हाथ बंटाने और दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए नेमाराम ने गुजरात का रुख किया. गुजरात की तपती धूप में ईंट भट्ठे पर कड़ी मेहनत करना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी नियति नहीं माना. वे दिन भर ईंटें बनाते और रात में अपने भविष्य के सपने बुनते थे.

गांव के युवाओं से मिली आगे बढ़ने की प्रेरणा
नेमाराम बताते हैं कि संघर्ष के उस दौर में उन्हें अपने ही गांव के दो युवाओं से एक नई ऊर्जा और प्रेरणा मिली. साल 2024 की सुरक्षा बलों की भर्ती में उनके गांव के दो लड़कों का चयन सीआईएसएफ (CISF) में हो गया था. जब नेमाराम ने उन युवाओं को वर्दी में देखा और उन्हें जिंदगी में आगे बढ़ते हुए पाया, तो उनके अंदर भी कुछ कर गुजरने की आग भड़क उठी. उन्होंने उसी दिन ठान लिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, वे भी फौज में भर्ती होने की पूरी तैयारी करेंगे. इसके बाद उन्होंने गुजरात से वापस लौटकर दोबारा अपनी किताबों से नाता जोड़ा और दिन-रात एक करके पढ़ाई शुरू कर दी.

22 सप्ताह की कठिन ट्रेनिंग और बीएसएफ में चयन
कड़ी मेहनत और पक्के इरादे के दम पर नेमाराम ने एसएससी जीडी 2025 (SSC GD 2025) की भर्ती परीक्षा में अपनी किस्मत आजमाई. उनका यह प्रयास सफल रहा और उनका चयन सीमा सुरक्षा बल में हो गया. चयन के बाद नेमाराम ने 22 सप्ताह की बेहद कठोर और चुनौतीपूर्ण ट्रेनिंग पूरी की है. हाल ही में जब वे अपना प्रशिक्षण पूरा करके एक फौजी की वर्दी में अपने गांव भिलो का तला लौटे, तो पूरे गांव ने उनका भव्य स्वागत किया. उनके पिता विरधाराम और पूरे परिवार की आंखों में खुशी के आंसू थे.

बचपन से ही देखा था देश सेवा का सपना
चूंकि नेमाराम का गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटा हुआ है, इसलिए उन्होंने बचपन से ही वहां बीएसएफ के जवानों को ड्यूटी करते हुए देखा था. वे हमेशा से उन जवानों की कार्यप्रणाली और उनकी वर्दी से काफी प्रभावित थे. सीमा पर तैनात उन वीर जवानों को देखकर ही उनके मन में देश की सेवा करने का जज्बा पैदा हुआ था. आज अपनी अटूट लगन और मेहनत के बल पर नेमाराम ने अपने उस बचपन के सपने को हकीकत में बदल दिया है. उनकी यह सफलता की कहानी आज न सिर्फ बाड़मेर बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल बन गई है, जो यह सिखाती है कि अगर हौसला हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती.



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