Russia Sanctions Bill Live Update : ट्रंप के दस्तखत और अमेरिका का बड़ा दांव, भारत पर 100% टैरिफ लगा या नहीं? जानें इंडिया का ‘प्लान बी’

Russia Sanctions Bill Live Update : ट्रंप के दस्तखत और अमेरिका का बड़ा दांव, भारत पर 100% टैरिफ लगा या नहीं? जानें इंडिया का ‘प्लान बी’


वॉशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026’ कानून पर दस्तखत करने जा रहे हैं, जिसके बाद ये पूरे अमेरिका में एक कड़ा कानून बन जाएगा. अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से पास हो चुके इस बिल के तहत अब वाशिंगटन को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक का भारी टैरिफ लगाने की कानूनी ताकत मिल जाएगी. क्योंकि भारत और चीन दुनिया में रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल आयात करते हैं, इसलिए इस कानून के बनते ही भारतीय सामानों पर भारी टैक्स लगने की आशंका बढ़ गई है. हालांकि, नई दिल्ली ने साफ शब्दों में कह दिया है कि देश की 140 करोड़ जनता की ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा और भारत अपनी आर्थिक जरूरतों के हिसाब से तेल खरीदता रहेगा.

क्या है ‘लिंडसे ओ. ग्राहम’ बिल और ट्रंप को मिली कौन-सी नई ताकत?

अमेरिका की संसद यानी कांग्रेस ने जिस नए बिल को अपनी हरी झंडी दी है, उसका सीधा मकसद रूस की अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंचाना और उसकी तेल से होने वाली कमाई को पूरी तरह से सुखा देना है. अमेरिकी सीनेट के बाद प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) में इस बिल को 262-159 के भारी बहुमत से पास किया गया है. ये बिल अमेरिका के पूर्व सीनेटर लिंडसे ग्राहम की बनाई सख्त विदेश नीति पर आधारित है.

इस नए कानून के लागू होते ही अमेरिकी राष्ट्रपति को ये सीधी पावर मिल जाएगी कि वे रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस मंगाने वाले किसी भी देश से आने वाले सामान पर 100% तक का टैरिफ थोप सकें. इस कानून में रूस के टॉप 5 तेल खरीदारों को सीधा निशाना बनाने की बात कही गई है, जिनमें भारत और चीन सबसे आगे हैं. इनके अलावा स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे यूरोपीय और एशियाई देश भी अमेरिका के इस रडार पर आ चुके हैं.

इससे पहले ट्रंप प्रशासन को दूसरे देशों पर टैरिफ लगाने के लिए इमरजेंसी पावर्स का सहारा लेना पड़ता था, जिसे अक्सर अमेरिकी अदालतों में चुनौती दे दी जाती थी. लेकिन संसद से इस नए बिल के पास होने से अब राष्ट्रपति को एक पक्का और मजबूत कानूनी हथियार मिल गया है. अब अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) को हर 180 दिनों में रूस से तेल खरीदने वाले देशों की लिस्ट की समीक्षा करनी होगी, जिसका मतलब है कि भारत पर ये कूटनीतिक और आर्थिक दबाव लगातार बना रहेगा.

भारत पर कितना असर और 100% टैरिफ का क्या है असली गणित?

जैसे ही वाशिंगटन से इस बिल की खबर आई, वैसे ही भारतीय बाजारों में ये डर फैल गया कि क्या कल से ही भारत के सामानों पर अमेरिका में 100% टैक्स लगने लगेगा? लेकिन आर्थिक मामलों के एक्सपर्ट्स और ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) का कहना है कि मामला उतना सीधा नहीं है जितना दिखता है, और तुरंत 100% टैरिफ लागू होने की संभावना बहुत कम है.

असल में, इस कानून के पास होने का ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि भारत से अमेरिका जाने वाली हर चीज रातों-रात दोगुनी महंगी हो जाएगी. ये बिल राष्ट्रपति ट्रंप को सिर्फ एक पावर देता है, लेकिन इस पावर का इस्तेमाल कब, कैसे और कितना करना है, इसका फैसला वाशिंगटन को ही करना है. भारत पर असर इस बात पर तय होगा कि अमेरिका असल में कितनी टैरिफ दरें तय करता है, किन-किन भारतीय प्रॉडक्ट्स को इसकी लिस्ट में डालता है और इसे कब से लागू करता है.

इसके अलावा, इस कानून में एक बेहद अहम क्लॉज ये भी जोड़ा गया है कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति चाहें तो ‘राष्ट्रीय हित’ का हवाला देकर किसी भी देश को इस टैरिफ से छूट दे सकते हैं. हालांकि, अगर ट्रंप ने आगे चलकर भारतीय सामानों पर थोड़ा भी अतिरिक्त टैरिफ लगाया, तो अमेरिका के बाजारों में भारतीय गारमेंट्स, आईटी सर्विसेस और दवाइयां महंगी हो जाएंगी. इससे हमारे एक्सपोर्टर्स के मुनाफे पर सीधा असर पड़ेगा और खुद अमेरिका में भी आम जनता के लिए महंगाई बढ़ सकती है.

रूस से तेल खरीदना भारत के लिए क्यों मजबूरी और जरूरी दोनों है?

भारत अपनी कुल जरूरत का 88 फीसदी से भी ज्यादा कच्चा तेल दुनिया के अलग-अलग देशों से खरीदता है. ऐसे में भारत के लिए रूस से सस्ता तेल मिलना कोई शौक या राजनीतिक चाल नहीं है, बल्कि ये देश की पूरी अर्थव्यवस्था को संभाल कर रखने और 140 करोड़ लोगों को पेट्रोल-डीजल की महंगाई से बचाने की सबसे बड़ी जरूरत है.

अगर हम हाल के आंकड़ों को देखें, तो अकेले जुलाई 2026 के महीने में भारत ने रूस से 7.27 अरब डॉलर का कच्चा तेल इंपोर्ट किया था. ये उस महीने भारत के कुल क्रूड ऑयल इंपोर्ट (14.21 अरब डॉलर) का करीब 51.1 फीसदी हिस्सा था. यानी भारत अपनी आधी से ज्यादा तेल की सप्लाई अकेले रूस के दम पर चला रहा है.

अगर 2022 से पहले की बात करें, तो भारत अपनी जरूरत का आधा तेल मिडिल ईस्ट (गल्फ देशों) से लेता था और रूस की हिस्सेदारी 15% भी नहीं थी. लेकिन जब गल्फ क्षेत्र में तनाव बढ़ा और ग्लोबल मार्केट में तेल के दाम भागे, तो भारत ने अपनी एनर्जी सिक्योरिटी के लिए रूस से डील बढ़ा ली. आज रूस भारत का सबसे बड़ा और भरोसेमंद तेल पार्टनर बन चुका है. अगर भारत अमेरिकी दबाव में आकर रूस से अचानक तेल खरीदना बंद कर देता है, तो देश में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे और हर सामान महंगा हो जाएगा.

ट्रेड का पूरा गणित: 42.8 अरब डॉलर का दांव और ट्रंप का ‘मास्टरकार्ड’

एक तरफ जहां रूस भारत को सबसे ज्यादा तेल बेचता है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक खरीदार (लार्जेस्ट ट्रेडिंग पार्टनर) है. ऐसे में नई दिल्ली के लिए दोनों देशों के साथ अपने रिश्ते संतुलित रखना एक बहुत ही कठिन टास्क बन गया है.

अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो चालू वित्तीय वर्ष (अप्रैल से अगस्त 2026-27) के शुरुआती पांच महीनों में ही भारत ने अमेरिका को 42.8 अरब डॉलर का सामान एक्सपोर्ट किया है. भारत से अमेरिका को कपड़े, दवाइयां, आईटी सर्विसेज, जेम्स एंड ज्वैलरी और भारी इंजीनियरिंग सामान बड़े पैमाने पर भेजे जाते हैं. लाखों लोगों का रोजगार इस व्यापार से सीधा जुड़ा हुआ है.

अगर वाशिंगटन रूस से तेल खरीदने की सजा के तौर पर भारतीय सामानों पर अतिरिक्त टैरिफ थोपता है, तो अमेरिकी बाजार में भारत के प्रॉडक्ट्स पिछड़ सकते हैं और भारतीय कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि ट्रंप असल में 100% टैरिफ लगाने के मूड में नहीं हैं, बल्कि वे इस कानून का इस्तेमाल भारत के साथ चल रही ट्रेड डील में अपनी शर्तें मनवाने और वाशिंगटन के पक्ष में फैसला झुकाने के लिए एक ‘मास्टरकार्ड’ की तरह कर रहे हैं.

भारत का कड़ा संदेश: ‘140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा से नो कॉम्प्रोमाइज’

अमेरिकी संसद से बिल पास होने और राष्ट्रपति के दस्तखत की खबरों के बीच भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने अपना रुख पूरी तरह से शीशे की तरह साफ कर दिया है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि भारत सरकार की पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी देश के 140 करोड़ नागरिकों को सस्ती और लगातार बिजली-ईंधन मुहैया कराना है, और इससे किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटा जाएगा.

विदेश मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि भारत बाजार की स्थितियों और अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर दुनिया के किसी भी देश से तेल खरीदने का पूरा हक रखता है. नई दिल्ली ने वाशिंगटन के अधिकारियों के सामने भी ये बात रख दी है कि एकतरफा टैरिफ जैसे सख्त कदम उठाने से दोनों देशों के मजबूत होते व्यापारिक रिश्तों को नुकसान पहुंचेगा और पूरी दुनिया का तेल बाजार अस्त-व्यस्त हो जाएगा. इसके साथ ही सरकार ने भारतीय निर्यातकों को भरोसा दिया है कि वह ट्रेड बॉडीज के साथ मिलकर काम कर रही है ताकि हमारे एक्सपोर्टर्स के बिजनेस पर कोई आंच न आए.

ट्रेड वॉर की ओर दुनिया या निकलेगा कूटनीतिक हल?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इस बिल पर दस्तखत किए जाने के बाद अब आगे का पूरा खेल वाशिंगटन की नीतियों पर निर्भर करेगा. अब देखना ये होगा कि क्या वाशिंगटन सचमुच भारत जैसे रणनीतिक और भरोसेमंद दोस्त पर 100% का भारी-भरकम टैरिफ लगाकर एक नया ट्रेड वॉर शुरू करने की गलती करेगा, या फिर पर्दे के पीछे बैठकर कोई कूटनीतिक रास्ता निकाला जाएगा.

ग्लोबल ट्रेड से जुड़ी रिसर्च संस्थाओं का मानना है कि भारत को अमेरिकी धमकियों के दबाव में आकर अपनी एनर्जी पॉलिसी से बिल्कुल भी पीछे नहीं हटना चाहिए. जब तक रूस से तेल खरीदना देश के फायदे में है, तब तक भारत को अपनी जरूरतों के मुताबिक तेल आयात करते रहना चाहिए. आने वाले हफ्तों में नई दिल्ली और वाशिंगटन के डिप्लोमैट्स की टेबल पर होने वाली बातचीत ही ये तय करेगी कि दोनों देश अपनी आर्थिक जरूरतों और रणनीतिक साझेदारी के बीच इस मुश्किल मामले को कैसे सुलझाते हैं.



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