River Restoration Miracle | 100 साल तक बंद रही ये नदी, बांध टूटते ही हुआ कुदरत का ऐसा चमत्कार, जो इतिहास में कभी नहीं देखा गया!

River Restoration Miracle | 100 साल तक बंद रही ये नदी, बांध टूटते ही हुआ कुदरत का ऐसा चमत्कार, जो इतिहास में कभी नहीं देखा गया!


एक नदी जिसकी छाती पर बांध बनाकर उसे दबा दिया गया था. उसके अंदर बसी मछलियां, आस-पास उगे पेड़-पौधे मर गए थे. 100 सालों से यहां सिर्फ दूर-दूर तक बंजर जमीन नजर आती थी. लेकिन एक दिन अचानक जब इस नदी पर बने बांध को तोड़ दिया गया तो नजारा कुछ ऐसा था कि ऐसा लगा मानो जंजीरों में जकड़ी हरियाली आजाद होकर चारों तरफ फैल गई हो. एक सदी बाद इस नदी के पानी को आगे जाने का रास्ता दिया गया तो लोगों ने कुदरत का ऐसा चमत्कार देखा जो इतिहास में बहुत कम ही देखने को मिला है.

45 मील लंबी ‘एल्व्हा नदी’ की कहानी

ये कहानी अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में बहने वाली ‘एल्व्हा नदी’ की है, जो आज पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल बन चुकी है. ओलंपिक प्रायद्वीप में स्थित ये नदी भले ही सिर्फ 45 मील लंबी हो, लेकिन एक समय था जब इसे अलास्का के बाहर सबसे बेहतरीन साल्मन मछलियों का घर माना जाता था.

करीब 100 साल पहले इस नदी की छाती पर दो विशाल बिजली के बांध बना दिए गए, जिसने इसके पूरे इकोसिस्टम को बर्बाद कर दिया. बहता पानी थम गया, मछलियों के रास्ते बंद हो गए और नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया. फिर दशकों की लंबी कानूनी और पर्यावरणीय लड़ाई के बाद जब इन बांधों को हटाने का दुनिया का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट शुरू हुआ, तो उसके जो नतीजे सामने आए, उसने अमेरिकी इतिहास में पर्यावरण सुधार की सबसे खूबसूरत और हैरान कर देने वाली कहानी लिख दी.

100 साल पुराना इतिहास: क्यों और कैसे बनीं दो बड़ी दीवारें?

लगभग 110 साल पहले जब कनाडा के बिजनेसमैन थॉमस एल्डवोल ने वाशिंगटन के पोर्ट एंजिल्स नाम के नए बस रहे शहर को बिजली सप्लाई करने का सपना देखा. इस शहर में नए-नए कारखाने और लकड़ी की मिलें खुल रही थीं, जिन्हें भारी मात्रा में बिजली की जरूरत थी. इसी जरूरत के लिए नदियों पर बांध बनने शुरू हुए थे.

  • पहला बांध (एल्व्हा डैम): थॉमस एल्डवोल को सरकार से एल्व्हा नदी पर बांध बनाने की मंजूरी मिल गई. साल 1910 में एल्व्हा डैम का निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1913 में ये पूरी तरह बनकर तैयार हो गया.
  • दूसरा बांध (ग्लाइन्स कैन्यन डैम): शहर की बिजली मांग जैसे-जैसे बढ़ती गई, पहले बांध से करीब 8 मील ऊपर की तरफ साल 1927 में एक और विशाल बांध खड़ा कर दिया गया, जिसे ‘ग्लाइन्स कैन्यन डैम’ नाम दिया गया.

इन दोनों हाइड्रोइलेक्ट्रिक बांधों ने उस दौर में स्थानीय अर्थव्यवस्था, उद्योग-धंधों और शहर को रोशन करने का काम तो किया, लेकिन नदी की सेहत और उसमें पनपने वाले जीवों के लिए ये फैसला एक बहुत बड़ा अभिशाप साबित हुआ.

बांधों ने कैसे तबाह की मछलियां और स्थानीय लोगों की जिंदगी?

जब एल्व्हा नदी पर ये दोनों बांध बनाए गए, उस समय के इंजीनियरों ने पर्यावरण और समुद्री जीवन का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा. बांधों के निर्माण में मछलियों के आने-जाने के लिए कोई ‘फिश पैसेज’ या रास्ता नहीं बनाया गया था.

इसका सबसे घातक असर ‘एनाड्रोमस’ प्रजाति की मछलियों पर पड़ा. ये ऐसी खास मछलियां होती हैं जो अपना आधा जीवन समंदर के खारे पानी में बिताती हैं और अंडे देने के लिए वापस नदियों के मीठे पानी में तैरकर आती हैं. साल्मन मछली इसी प्रजाति का हिस्सा है.

  1. सिमटता दायरा: बांध बनने से पहले साल्मन मछलियां एल्व्हा नदी में मीलों दूर तक पहाड़ों की तरफ जाकर अपने अंडे देती थीं. लेकिन बांध की ऊंची दीवारों ने उनका रास्ता रोक दिया, जिससे उनका दायरा नदी के मुहाने से महज 5 मील के इलाके में सिमट कर रह गया.
  2. मिट्टी और रेत की नाकेबंदी: पहाड़ों से बहकर आने वाली उपजाऊ मिट्टी, रेत और गाद बांध के जलाशयों में ही जमा होने लगी. निचले हिस्सों तक नई गाद न पहुंचने के कारण नदी के तटों का कटाव तेज हो गया और मछलियों के अंडे देने वाली नेचुरल जगहें पूरी तरह तबाह हो गईं.
  3. जनजाति का टूटता वजूद: इस तबाही का सबसे बुरा असर ‘लोअर एल्व्हा क्लालम ट्राइब’ पर पड़ा. ये स्थानीय जनजाति सदियों से एल्व्हा नदी और साल्मन मछलियों पर निर्भर थी. साल्मन उनके लिए केवल खाने का जरिया नहीं थीं, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक आस्था का मुख्य केंद्र थीं. मछलियों का गायब होना इस जनजाति की पूरी जीवन शैली के लिए एक बड़ा झटका था.

1992 का ऐतिहासिक कानून और नदी को आजाद कराने की लड़ाई

जैसे-जैसे साल बीतते गए, नदी का इकोसिस्टम बेजान होता चला गया. लेकिन स्थानीय जनजाति, पर्यावरण वैज्ञानिकों और कार्यकर्ताओं ने हार नहीं मानी. उन्होंने एल्व्हा नदी को फिर से जीवित करने के लिए दशकों तक आंदोलन चलाया और अमेरिकी सरकार पर दबाव बनाया.

आखिरकार, साल 1992 में अमेरिकी संसद ने एक ऐतिहासिक बिल पास किया, जिसे ‘एल्व्हा रिवर इकोसिस्टम एंड फिशरीज रीस्टोरेशन एक्ट’ कहा गया.

इस कानून ने अमेरिका के गृह मंत्री को अधिकार दिया कि वो दोनों निजी बांधों का मालिकाना हक सरकार के हाथों में लें और एल्व्हा नदी के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र तथा मछलियों की प्रजातियों को पूरी तरह बहाल करने के लिए जो भी जरूरी हो, कदम उठाएं. हालांकि, कानूनी पेचीदगियों, जमीनी सर्वे और बजट आवंटन में कई साल लग गए, लेकिन ये तय हो गया था कि नदी की छाती पर खड़ी ये कृत्रिम दीवारें अब ढहा दी जाएंगी.

दुनिया का सबसे बड़ा ‘डैम रिमूवल’ प्रोजेक्ट

साल 2011 पर्यावरण के इतिहास का एक यादगार साल बन गया. एल्व्हा नदी पर बने दोनों विशाल बांधों को ध्वस्त करने का काम शुरू हुआ. ये दुनिया के इतिहास में अपनी तरह का सबसे बड़ा ‘डैम रिमूवल’ प्रोजेक्ट था.

  • गाद का महा-विस्फोट: 100 सालों से दोनों बांधों के पीछे करीब 2.4 करोड़ क्यूबिक यार्ड मिट्टी, रेत और गाद जमा हो चुकी थी. ये मात्रा इतनी विशाल थी कि इससे 8 बड़े फुटबॉल स्टेडियमों को जमीन से लेकर छत तक भरा जा सकता था!
  • कुदरत का नया रूप: जैसे ही बांध ढहाए गए, 100 साल से थमी ये गाद पानी के तेज बहाव के साथ समंदर की तरफ बह निकली. महज कुछ ही वर्षों के भीतर, नदी के मुहाने पर एक नया और खूबसूरत रेतीला तट बनकर तैयार हो गया. जो तट दशकों पहले पूरी तरह गायब हो चुके थे, वो कुदरत के इस बहाव से दोबारा जिंदा हो उठे.

‘न्यूट्रिएंट एक्सप्रेस’ की वापसी: जब बेजान नदी में फिर दौड़ी जिंदगी

बांध पूरी तरह हटने के बाद जो इलाके पहले विशाल जलाशयों के पानी में डूबे हुए थे, वो सूखी जमीन के रूप में बाहर आए. वैज्ञानिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने इस नई जमीन पर तुरंत काम शुरू किया.

  • लाखों देसी पौधे लगाए गए: खाली हुई जमीन को ढलान और कटाव से बचाने के लिए टीमों ने स्थानीय प्रजातियों के हजारों पेड़-पौधे लगाए.
  • हजारों पाउंड बीजों का छिड़काव: जमीन को हरा-भरा करने और बाहरी नुकसानदायक खरपतवारों को उगने से रोकने के लिए स्थानीय घास और झाड़ियों के हजारों पाउंड बीज चारों तरफ फैलाए गए.
  • ‘न्यूट्रिएंट एक्सप्रेस’ की वापसी: बांध टूटते ही साल्मन मछलियां 100 साल बाद फिर से नदी के ऊपरी हिस्सों और पहाड़ों की तरफ तैरकर जाने लगीं. वैज्ञानिक साल्मन मछलियों को ‘न्यूट्रिएंट एक्सप्रेस’ कहते हैं, क्योंकि जब वो समंदर से मीठे पानी में आती हैं तो अपने साथ समंदर के कई पोषक तत्व लाती हैं.

जब भालू, चील और अन्य जंगली जानवर इन मछलियों का शिकार करते हैं, तो वो पोषक तत्व पूरे जंगल के इकोसिस्टम में फैल जाते हैं. इससे जंगल की मिट्टी उपजाऊ बनती है और पेड़ों का विकास तेजी से होता है.

इंसान की गलती और कुदरत का कमबैक

एल्व्हा नदी की ये कहानी इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अगर इंसान अपनी पुरानी गलतियों को स्वीकार करे और प्रकृति के रास्ते में रोड़ा अटकाना बंद कर दे, तो पर्यावरण खुद को बहुत तेजी से रिकवर कर सकता है. 100 साल तक इंसानी बंदिशों में कैद रहने वाली एल्व्हा नदी आज एक बार फिर से अपनी पूरी आजादी के साथ बह रही है.

साल्मन मछलियां अपने पुराने रास्तों पर लौट आई हैं, जंगल फिर से घने हो रहे हैं और स्थानीय जनजाति की सांस्कृतिक धरोहर को एक नया जीवन मिल गया है. एल्व्हा नदी का ये पुनर्जन्म आज पूरी दुनिया के लिए पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी मिसाल बन चुका है.



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