44 देशों में आलू का संकट, चिल्ली पोटैटो और फ्रेंच फ्राइज पर क्यों आफत?
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यूरोप में रिकॉर्ड गर्मी और लंबे सूखे ने आलू की फसल को बड़ा झटका दिया है. ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में 35 लाख टन से ज्यादा उत्पादन प्रभावित होने का अनुमान है. कई इलाकों में पैदावार 20 प्रतिशत तक घट सकती है. उत्तरी फ्रांस में दस हफ्ते से ज्यादा समय तक बारिश नहीं हुई, जिससे आलू छोटे रह गए. दूसरी तरफ किसानों ने पिछले साल कम कीमत मिलने के बाद इस साल खेती का क्षेत्र भी घटा दिया था. अब थोक बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं. इसका असर फ्रेंच फ्राइज, जमे हुए आलू उत्पादों और आम ग्राहकों की जेब पर पड़ सकता है. (सभी फोटो Unsplash)
शाम को भूख अकसर भूख लगती है और मन करता है कुछ झटपट खा लिया जाए. अब जरा सोचिए चिल्ली पोटैटो का ऑर्डर किया, लेकिन जवाब मिला- आलू नहीं है. फ्रेंच फ्राइज की प्लेट मंगाई तो उसमें भी आलू कम नजर आया. सुनने में यह लगेगा अरे ऐसा कैसे हो सकता है. लेकिन यूरोप में ऐसा संकट दस्तक दे रहा है. इस बार मामला सिर्फ महंगे आलू का नहीं है. यूरोप में रिकॉर्ड गर्मी और भयंकर सूखे ने आलू की फसल को बुरी तरह प्रभावित किया है. हालात ऐसे हैं कि बाजार में आने वाला आलू छोटा हो रहा है और कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं. यानी जिस सब्जी को रोजमर्रा की थाली का सबसे आसान हिस्सा माना जाता है, वही अब बड़ी चिंता बनती जा रही है.
WION न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार इस संकट की जड़ मौसम में छिपी है. इस साल यूरोप ने रिकॉर्ड गर्म गर्मी का सामना किया. कई इलाकों में तापमान लगातार 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा. जुलाई और अगस्त में लंबे समय तक बारिश नहीं हुई. उत्तरी फ्रांस के कुछ हिस्सों में तो दस हफ्ते से ज्यादा समय तक मापने लायक बारिश नहीं हुई. आलू जमीन के अंदर तैयार होता है और उसके लिए पर्याप्त पानी जरूरी होता है. पानी और नमी की कमी ने कंदों के विकास को रोक दिया. नतीजा यह हुआ कि फसल की मात्रा के साथ उसका आकार और गुणवत्ता भी प्रभावित हुई. ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है.
एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट यानी ECIU के 17 सितंबर को जारी विश्लेषण के मुताबिक, यूरोप में गर्मी और सूखे के कारण 35 लाख टन से ज्यादा आलू उत्पादन प्रभावित हुआ है. कुछ प्रमुख क्षेत्रों में पैदावार में 20 प्रतिशत तक की कमी का अनुमान लगाया गया है. उद्योग के अनुमान के मुताबिक फसल नुकसान का आर्थिक मूल्य करीब 49.8 करोड़ से 81.8 करोड़ यूरो के बीच हो सकता है. यह नुकसान केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा. आलू की उपलब्धता घटने पर थोक बाजार, फूड प्रोसेसिंग कंपनियों और आखिर में ग्राहकों तक इसका असर पहुंच सकता है. खासकर जमे हुए फ्राइज और दूसरे आलू आधारित उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है.
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मौसम ने इस बार संकट को और गहरा कर दिया, लेकिन कहानी सिर्फ गर्मी और सूखे की नहीं है. पिछले साल यूरोप के कई बाजारों में आलू की ज्यादा पैदावार हुई थी. इससे खुले बाजार में कीमतें काफी नीचे चली गई थीं. नुकसान से बचने के लिए कई किसानों ने इस साल आलू की खेती का रकबा कम कर दिया. ECIU के अनुसार, इस फैसले से बाजार में संभावित रूप से आने वाली करीब 36 लाख टन अतिरिक्त उपज भी कम हो गई. यानी एक तरफ खेतों में मौसम ने फसल घटाई और दूसरी तरफ किसानों ने पिछले साल के कम दाम देखकर पहले ही उत्पादन कम कर दिया. दोनों असर एक साथ आए तो आपूर्ति पर दबाव और बढ़ गया.
आलू की कमी का असर अब बाजार में दिखाई देने लगा है. बेल्जियम में खुले बाजार की कीमतें साल की शुरुआत में लगभग शून्य स्तर के आसपास थीं, लेकिन अब 200 यूरो प्रति टन से ऊपर पहुंच गई हैं. जर्मनी में भी तेजी देखी गई. जून में जहां कीमत करीब 15 यूरो प्रति टन थी, वहीं यह बढ़कर लगभग 240 यूरो प्रति टन तक पहुंच गई. कीमतों में इतनी तेज उछाल का असर केवल किसानों और व्यापारियों तक सीमित नहीं रहता. आलू को कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ती है और फिर उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंच सकता है. यही वजह है कि फ्राइज और दूसरे प्रोसेस्ड आलू उत्पादों को लेकर चिंता बढ़ रही है.
इस बार समस्या सिर्फ आलू की संख्या की नहीं है. खेतों से निकलने वाले आलू का आकार भी कई जगह छोटा रह गया है. लंबे सूखे के दौरान जमीन में पर्याप्त नमी नहीं रही, जिससे आलू के कंदों का विकास प्रभावित हुआ. खासकर उत्तरी फ्रांस जैसे क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश नहीं होने से फसल की गुणवत्ता पर असर पड़ा. फूड प्रोसेसिंग उद्योग के लिए आलू का आकार और गुणवत्ता दोनों महत्वपूर्ण होते हैं. फ्रेंच फ्राइज जैसे उत्पादों के लिए एक समान आकार के आलू की जरूरत होती है. इसलिए छोटी और कमजोर फसल का असर सीधे प्रोसेस्ड उद्योग पर भी पड़ सकता है.
कृषि विशेषज्ञों और उद्योग संगठनों के लिए यह स्थिति सिर्फ एक फसल का संकट नहीं है. यह बदलते मौसम और खाद्य सुरक्षा के बीच बढ़ते संबंध की ओर भी इशारा करती है. यूरोप 2018 के बाद से चार बड़ी सूखे की घटनाओं का सामना कर चुका है. किसानों के लिए मौसम का अनुमान लगाना और खेती की योजना बनाना मुश्किल होता जा रहा है. यूरोपीय आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस गर्मी में यूरोपीय संघ की कुल फसल पैदावार पांच साल के औसत से 14 प्रतिशत तक नीचे रहने का अनुमान है. ऐसे में आलू का संकट एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा बनकर सामने आ रहा है.
आलू उत्पादकों की मुश्किलें खेतों में खत्म नहीं होतीं. किसानों को डीजल की बढ़ती कीमत, खेती की लागत और व्यापार शुल्क जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है. अब अगर कम फसल के साथ उत्पादन लागत भी बढ़ेगी, तो बाजार में कीमतों पर दबाव रह सकता है. इसका असर फूड प्रोसेसिंग कंपनियों पर भी पड़ेगा. कंपनियां जमे हुए फ्राइज और दूसरे उत्पादों के लिए आलू खरीदती हैं. कच्चा माल महंगा होने पर उत्पादन लागत बढ़ती है. ऐसे में आने वाले समय में ग्राहकों को छोटी मात्रा या महंगे उत्पाद का सामना करना पड़ सकता है. फिलहाल यूरोप का आलू संकट यह दिखा रहा है कि मौसम में आया बड़ा बदलाव सीधे हमारी प्लेट तक पहुंच सकता है.