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देशभर में पानी एक बड़ी समस्या है. कहीं लोगों को पीने भर का साफ पानी नहीं मिल पा रहा है तो कहीं पानी की बर्बादी की जा रही है. ऐसे में पानी को लेकर सभी को जागरूक होना होगा. यह काम किसी एक के जिम्मे नहीं हो सकता है. ऐसे में पानी को साफ करने के लिए जिला स्तर और ग्रामीण स्तर पर कुछ छोटे प्रयास भी देखने को मिल रहे हैं.
कुंदन कुमार/गया: बिहार के गया जिले के बतसपुर गांव में घरों से निकलने वाले गंदे और बदबूदार नाली और शौचालय के पानी को एक अनोखे मॉडल के जरिए उपयोगी संसाधन में बदला जा रहा है. यहां वेस्ट वाटर स्टेबलाइजेशन पॉन्ड तकनीक की मदद से गंदे पानी को ट्रीटमेंट के बाद उपयोगी बनाया जा रहा है. इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मशीनरी और बिजली की जरूरत अपेक्षाकृत कम होती है.
इस तकनीक के उपयोग के बाद गांव के लोगों को गंदे नाली के पानी से निकलने वाले दुर्गंध से काफी राहत मिली है. खास बात यह है कि जिस तालाब में पहले गंदा और बदबूदार पानी जमा होता था अब उस तालाब का उपयोग मछली पालन के लिए किया जा रहा है. लगभग 300 घरों की आबादी वाले बतसपुर गांव के नाली और शौचालय से निकलने वाला पानी पहले चार एकड़ में फैले तालाब में गिरता था जिससे तालाब का पानी प्रदूषित हो गया था और आसपास रहने वाले ग्रामीणों को दुर्गंध की समस्या से जूझना पड़ता था.
प्राकृतिक और कम लागत वाली इस अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली में गंदे नाली के पानी को तालाब जैसे संरचना में कुछ दिनों तक रखा जाता है. सूर्य की रोशनी, ऑक्सीजन, बैक्टीरिया और प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं की मदद से पानी में मौजूद जैविक गंदगी और प्रदूषकों का उपचार किया जाता है. गांव के नालियों से आने वाला पानी सबसे पहले अवायवीय टैंक में जमा होता है. लगभग 8 से 10 फीट गहरे इस टैंक में नालियों का कचरा जमा होता है.
एक से दो दिनों में बैक्टीरिया इसे पचाते हैं. इसके बाद साफ पानी को 4 से 5 फुट गहरे दूसरे वैकल्पिक टैंक में भेजा जाता है. यहां लगभग 5 दिनों तक पानी दो तरह से साफ होता है. उसके बाद परिपक्वता टैंक में पानी जाता है जहां से पानी पूरी तरह साफ होने के बाद बड़े तालाब में जाता है. तालाब के पानी का इस्तेमाल मछली पालन और खेतों की सिंचाई के लिए किया जा रहा है. माना जा रहा है ग्रामीण क्षेत्रों में जहां कम लागत में अपशिष्ट जल का उपचार करना हो यह तकनीक एक उपयोगी विकल्प हो सकता है.
बोधगया के बसाढ़ी पंचायत के बतसपुर गांव का यह मॉडल राज्य का दूसरा ऐसा मॉडल है जहां गंदे पानी को प्राकृतिक तरीके से साफ कर उपयोग करने लायक बनाया गया है. गांव के रहने वाले रामदेव मांझी बताते हैं कि पहले नाली के पानी से काफी बदबू निकलता था लेकिन, स्थानीय वार्ड सदस्य के सहयोग से इस मॉडल को लाया गया है और अब नालियों के पानी से दुर्गंध भी नहीं आती और पानी साफ होकर बड़े तालाब में जा रहा है जहां मछली पालन किया जा रहा है.
बसाढ़ी पंचायत के पूर्व उप मुखिया मनोरंजन प्रसाद समदर्शी ने जानकारी देते हुए बताया कि यह मॉडल केवल पानी से आने वाले बदबू से राहत तक सीमित नहीं है बल्कि तालाब में पानी के उपयोग और संरक्षण के माध्यम से भूमिगत जल संरक्षण में भी मदद मिलने की संभावना है. कई प्रक्रिया से होते हुए नाली के पानी की सफाई हो रही है और साफ पानी बड़े तालाब में जा रहा है. यहां बड़े स्तर पर मछली पालन किया जा रहा है और सालाना 20 लाख रुपए से अधिक आमदनी हो रही है.