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हल्दी की बुवाई के शुरुआती समय में पौधे का विकास जमीन के ऊपर दिखाई देता है, लेकिन करीब डेढ़ महीने के बाद जमीन के अंदर कंद बनने और बढ़ने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है. किसान ललित शंकर पाटिल के मुताबिक इस समय फसल की देखभाल में थोड़ी भी लापरवाही आगे चलकर उत्पादन पर असर डाल सकती है.इस दौरान खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना, जरूरत के मुताबिक पोषण देना और समय पर मिट्टी चढ़ाना जरूरी है.
खंडवा में अब किसान पारंपरिक फसलों के साथ हल्दी की खेती की ओर भी बढ़ रहे हैं. लेकिन कई बार पूरी मेहनत और खर्च करने के बाद भी किसानों को उम्मीद के मुताबिक उत्पादन नहीं मिल पाता. इसका एक कारण फसल को सही समय पर पोषण नहीं मिलना भी हो सकता है. हल्दी की खेती में बुवाई के करीब 45 से 50 दिन बाद का समय काफी अहम माना जाता है। इसी दौरान जमीन के अंदर कंद का विकास शुरू होता है.
किसान अगर इस समय फसल की जरूरत के मुताबिक खाद, नमी और मिट्टी चढ़ाने का सही प्रबंधन करें तो कंदों के विकास में मदद मिल सकती है. किसान चाहें तो बाजार की खाद के साथ जैविक विकल्प के तौर पर घर पर तैयार होने वाला घन जीवामृत भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे खेत में जैविक पदार्थ पहुंचाने के साथ बाहर से खाद खरीदने का खर्च भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है.
45 से 50 दिन बाद का समय क्यों अहम
हल्दी की बुवाई के शुरुआती समय में पौधे का विकास जमीन के ऊपर दिखाई देता है, लेकिन करीब डेढ़ महीने के बाद जमीन के अंदर कंद बनने और बढ़ने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है. किसान ललित शंकर पाटिल के मुताबिक इस समय फसल की देखभाल में थोड़ी भी लापरवाही आगे चलकर उत्पादन पर असर डाल सकती है.इस दौरान खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना, जरूरत के मुताबिक पोषण देना और समय पर मिट्टी चढ़ाना जरूरी है.हालांकि खाद की मात्रा मिट्टी की जांच और फसल की स्थिति के अनुसार तय करना बेहतर रहता है.
पोटाश और फास्फोरस की जरूरत
हल्दी की फसल में कंद के विकास के दौरान पोटाश और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फास्फोरस जड़ और शुरुआती विकास में मदद करता है, जबकि पोटाश पौधे के विकास और कंद की गुणवत्ता से जुड़ा होता है. किसान बाजार में उपलब्ध पोटाश आधारित खाद जैसे 0-0-50 या म्यूरेट ऑफ पोटाश का इस्तेमाल कृषि विशेषज्ञ की सलाह और मिट्टी की जरूरत के अनुसार कर सकते हैं. सिर्फ ज्यादा खाद डाल देने से उत्पादन बढ़ेगा, ऐसा जरूरी नहीं है। सही मात्रा और सही समय ज्यादा महत्वपूर्ण है.
जैविक तरीके से करना है तो घन जीवामृत का विकल्प
जो किसान हल्दी की फसल में जैविक तरीके से पोषण देना चाहते हैं, उनके लिए घन जीवामृत एक विकल्प हो सकता है. इसे किसान घर पर उपलब्ध सामग्री से तैयार कर सकते हैं। इसमें मुख्य रूप से देशी गाय का गोबर, गुड़, दाल का आटा, थोड़ी मिट्टी और जरूरत के अनुसार गौमूत्र का इस्तेमाल किया जाता है.किसान ललित शंकर पाटिल भी हल्दी की फसल में जीवामृत जैसे जैविक इनपुट के इस्तेमाल की बात बताते हैं। इसका उद्देश्य खेत में जैविक पदार्थ और सूक्ष्मजीव गतिविधि को बढ़ावा देना है.
घर पर ऐसे बनाएं घन जीवामृत
करीब एक एकड़ के लिए किसान 100 किलो देशी गाय का गोबर लेकर उसमें करीब 1 किलो गुड़ और 1 से 2 किलो बेसन या किसी दाल का आटा मिला सकते हैं। इसमें थोड़ी खेत की मिट्टी भी मिलाई जाती है. जरूरत के अनुसार गौमूत्र डालकर मिश्रण में नमी तैयार की जाती है.सबसे पहले गुड़ को गौमूत्र में घोल लें. इसके बाद इसमें बेसन और थोड़ी मिट्टी मिलाएं. अब इस घोल को गोबर पर धीरे-धीरे छिड़कते हुए अच्छी तरह मिला लें। ध्यान रखें कि मिश्रण बहुत ज्यादा गीला होकर कीचड़ जैसा न हो जाए. इसमें इतनी नमी रहे कि सामग्री आपस में अच्छी तरह मिल जाए.इसके बाद मिश्रण को छायादार जगह पर ढेर लगाकर जूट की बोरी से ढक सकते हैं. कुछ समय रखने के बाद इसे छांव में फैलाकर सुखाया जाता है. जब यह अच्छी तरह सूखकर भुरभुरा हो जाए तो इसे बारीक करके खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
हल्दी में खाद के साथ मिट्टी चढ़ाना भी जरूरी
हल्दी के कंद जमीन के अंदर विकसित होते हैं, इसलिए केवल खाद डालना ही काफी नहीं है. समय-समय पर पौधों के आसपास मिट्टी चढ़ाना भी जरूरी होता है. इससे कंदों को बढ़ने के लिए बेहतर जगह मिलती है और वे सीधे धूप के संपर्क से भी बचे रहते हैं.मिट्टी चढ़ाने का सही समय और तरीका खेत की स्थिति के अनुसार रखा जाना चाहिए. बहुत ज्यादा मिट्टी एक साथ चढ़ाने के बजाय फसल की अवस्था देखकर यह काम करना बेहतर रहता है.