Explained: क‍िसी राज्‍य में कैसे घोष‍ित होता है सूखा? केंद्र या राज्‍य क‍िसके पास है अध‍िकार

Explained: क‍िसी राज्‍य में कैसे घोष‍ित होता है सूखा? केंद्र या राज्‍य क‍िसके पास है अध‍िकार


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महाराष्ट्र सरकार ने शनिवार को 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया है. सामने आए आंकड़े बताते हैं कि छत्रपति संभाजीनगर मंडल में सूखे से प्रभावित तालुकों की संख्या सबसे ज्यादा (74) है. लेकिन यहां सवाल उठता है कि आखिर भारत में कोई राज्‍य ‘सूखा’ कैसे घोषित करता है. क्‍या इसके ल‍िए राज्‍यों को केंद्र की इजाजत लेनी होती है या राज्‍य अपनी मर्जी से ‘सूखा’ घोष‍ित कर सकते हैं.

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क‍िसी राज्‍य में कैसे घोष‍ित होता है सूखा? केंद्र या राज्‍य क‍िसके पास है अध‍िकार

महाराष्ट्र सरकार ने शनिवार को राज्य के 358 तालुकों में से 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया है. सरकार का कहना है कि राज्य में करीत 74% तालुकों को सूखे की मार पड़ी है. राज्‍य में इस बार 18.8% बार‍िश कम दर्ज की गई है. विदर्भ, मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में मानसून की कमी यहां के क‍िसानों को सालभर रुलाती है. सामने आए आंकड़े बताते हैं कि छत्रपति संभाजीनगर मंडल में सूखे से प्रभावित तालुकों की संख्या सबसे ज्यादा (74) है. सरकारी आदेश में ये भी कहा गया है कि तय प्रक्रिया के बाद, 265 तालुकों में किसानों को फसल के नुकसान के लिए आर्थिक मदद देने के बारे में एक अलग सरकारी आदेश जारी किया जाएगा. लेकिन यहां सवाल उठता है कि आखिर भारत में कोई राज्‍य ‘सूखा’ कैसे घोषित करता है. क्‍या इसके ल‍िए राज्‍यों को केंद्र की इजाजत लेनी होती है या राज्‍य अपनी मर्जी से ‘सूखा’ घोष‍ित कर सकते हैं. आइए इस पूरी व्‍यवस्‍था को समझते हैं.

कौन करता है सूखे की घोषण- केंद्र या राज्‍य?
भारत में सूखा घोष‍ित करने के न‍ियम काफी सख्‍त और वैज्ञानिक हैं. हालांकि सूखा घोष‍ित करने का अध‍िकार मुख्‍य रूप से राज्‍य सरकारों के पास ही होता है. केंद्र सरकार खुद क‍िसी राज्‍य में सूखा घोषित नहीं करती. राज्‍य सरकारें जब सूखे की घोषणा करती हैं तो ये 6 महीनों तक मान्‍य रहती है. यानी 6 महीने बाद फिर से स्‍थ‍िति की जांच की जानी जरूरी है.

क्‍या हैं सूखा घोष‍ित होने के चरण?
केंद्र द्वारा तय क‍िए गए सूखा प्रबंधन कोड के आधार पर सूखा की जांच की प्रक्र‍िया तीन चरणों में होती है. ‘ट्र‍िगर-1’ राज्‍य के सूखा प्रबंधन ढांचे का पहला चरण है. ट्रिगर-1 तब एक्टिव होता है, जब बारिश में 25% से ज्यादा की कमी हो और लगातार 21 दिनों तक सूखा मौसम (यानी एक द‍िन भी बार‍िश न हो) रहे. दूसरे चरण में प्रभाव और संकेत देखे जाते हैं, जैसे बोई गई फसल का क्षेत्र क‍ितना कम है, र‍िमोट सेंस‍िग, म‍िट्टी की नमी, भूजल की स्‍थ‍िति और कमी. तीसरे चरण में प्रभाव‍ित गांवों के 10% गावों में सर्वे क‍िया जाता है. अगर 80 प्रतिशत सर्वे में 50 प्रतिशत से ज्यादा फसल नुकसान दिखे तो सूखे को मध्यम से गंभीर श्रेणी में अपग्रेड किया जा सकता है.

हमारे देश में खरीफ फसलों (जून-जुलाई में बोई जाने वाली फसलें, यानी गर्मी की फसलें) के लिए सूखा घोषणा की अंतिम तारीख 31 अक्टूबर है. हालांकि जल्दी यानी अगस्त के महीने में भी घोषणा की जाती है लेकिन तभी, जब जून-जुलाई में भारी बारिश की कमी से बुवाई ही न हो पाई हो. रबी फसलों (अक्‍टूबर से दिसंबर यानी सर्दी में बोई जाने वाली फसलें) के लिए अंतिम तारीख 31 मार्च है.

राज्‍य में इस बार 18.8% बार‍िश कम दर्ज की गई है. (फाइल फोटो PTI)

कैसे म‍िलती है इन सूखा-प्रभावित क्षेत्रों को मदद?
ड‍िजास्‍टर मैनेजमेंट एक्‍ट 2005 के अनुसार सूखा प्रभावित राज्‍यों को 2 तरह से पैसे की मदद म‍िलती है. SDRF यानी राज्‍य आपदा प्रतिक्र‍िया कोष और NDRF यानी राष्‍ट्र‍ीय आपदा प्रतिक्र‍िया कोष ये मदद करते हैं. एसडीआरएफ को राज्‍य खुद इस्‍तेमाल कर सकते हैं. मीड‍ियम या गंभीर दोनों ही तरह के सूखे के हालातों में. लेकिन राष्‍ट्र‍ीय आपदा प्रतिक्र‍िया कोष से मदद सिर्फ गंभीर सूखे पर और राज्‍यों का बजट कर करने पर ही म‍िलती है.

देश में इस समय उत्तर भारत में जमकर मानसून बरसा है. कई इलाके बाढ़ की त्रासदी झेल रहे हैं. जबकि महाराष्‍ट्र सूखे की मार झेल रहा है. मानूसन का असमान व‍ितरण देश में ऐसे दो ब‍िलकुल व‍िपरीत पर बेहद गंभीर हालात पैदा कर रहा है. सूखा गांवों में गहरा सामाजिक और आर्थिक संकट पैदा कर देता है. इससे सरकार के लिए यह नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वह जल्दी और सही तरीके से राहत पहुंचाए, जो महाराष्‍ट्र सरकार ने घोषित क‍िया है. जब राहत की घोषणा में देरी होती है तो छोटे किसानों के बुनियादी हक कमजोर पड़ जाते हैं. मानसून के महीनों में फसल बर्बाद होने के बावजूद अगर सूखे की आधिकार‍िक घोषणा न हो तो क‍िसानों को ऊंची ब्‍याज में कर्जा लेना पड़ता है. महाराष्‍ट्र का व‍िदर्भ इलाका इससे पहले भी कई क‍िसानों की आत्‍महत्‍या का दृष्टा बन चुका है. यही हालात गावों से पलायन का भी कारण बनता है.



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