सुल्तानपुर का मठिया धाम मंदिर, जिसका दो हिस्सा जमीन में एक हिस्से पर होता है दर्शन, अनोखी बनावट और प्राचीनता के लिए है खास महत्व

सुल्तानपुर का मठिया धाम मंदिर, जिसका दो हिस्सा जमीन में एक हिस्से पर होता है दर्शन, अनोखी बनावट और प्राचीनता के लिए है खास महत्व


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सुल्तानपुर के निजाम पट्टी गांव में मौजूद मठिया धाम अपनी धार्मिक मान्यता के साथ-साथ अनोखी बनावट के लिए भी खास है. बाहर से देखने पर यह मंदिर सामान्य नजर आ सकता है, लेकिन जैसे ही आप इसकी संरचना को करीब से देखते हैं. इसकी कहानी अलग दिखाई देती है. स्थानीय लोगों के मुताबिक मंदिर का दो हिस्सा समय के साथ जमीन के अंदर चला गया. आज मंदिर का जो हिस्सा दिखाई देता है, उसमें जाने के लिए श्रद्धालुओं को एक संकरी जगह से झुककर अंदर जाना पड़ता है.

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सुल्तानपुरः धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला एक ऐतिहासिक जिला माना जाता है. प्राचीन काल से ही भारत में धर्म प्रकृति को लेकर लोगों की गहरी आस्था रही है. आज हम आपको बताने वाले हैं सुल्तानपुर के एक ऐसे मंदिर के बारे में जिसने बाढ़ जैसी भीतर त्रासदी को देखा लेकिन उसके बावजूद भी वह अपने अस्तित्व को बचा कर रखा हुआ है. सुल्तानपुर में गोमती नदी के किनारे मौजूद मठिया धाम मंदिर, इसके बारे में कहा जाता है कि यह मंदिर का दो हिस्सा जमीन में धंस गया है और जहां पर अभी मूर्ति स्थापित है वहां लोग झुक दर्शन करने जाते हैं.

दो हिस्सा जमीन में एक तल पर होता है दर्शन

सुल्तानपुर के निजाम पट्टी गांव में मौजूद मठिया धाम अपनी धार्मिक मान्यता के साथ-साथ अनोखी बनावट के लिए भी खास है. बाहर से देखने पर यह मंदिर सामान्य नजर आ सकता है, लेकिन जैसे ही आप इसकी संरचना को करीब से देखते हैं. इसकी कहानी अलग दिखाई देती है. स्थानीय लोगों के मुताबिक मंदिर का दो हिस्सा समय के साथ जमीन के अंदर चला गया. आज मंदिर का जो हिस्सा दिखाई देता है, उसमें जाने के लिए श्रद्धालुओं को एक संकरी जगह से झुककर अंदर जाना पड़ता है. यही रास्ता इस प्राचीन मंदिर को दूसरे मंदिरों से अलग बनाता है. अब सवाल यह है कि आखिर मंदिर का यह हिस्सा जमीन में कैसे धंसा?

मोटी दीवारों में छिपी पुरानी तकनीक

मठिया धाम की मौजूदा संरचना में आज भी मोटी दीवारें और पुरानी शैली की ईंटें दिखाई देती हैं. मंदिर का इतिहास लिखने वाले अमरेंद्र नाथ द्विवेदी के मुताबिक, यहां लखौरी ईंटों का इस्तेमाल हुआ है, जो पुरानी निर्माण शैली की पहचान मानी जाती हैं. मंदिर की दीवारों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसके निर्माण में मजबूती का खास ध्यान रखा गया था. स्थानीय मान्यता इसे बेहद प्राचीन धार्मिक स्थल से जोड़ती है. हालांकि मंदिर के जमीन में धंसने को लेकर अलग-अलग बातें कही जाती हैं. किसी प्राकृतिक घटना को इसका कारण बताया जाता है, लेकिन इसकी वास्तविक वजह क्या थी, यह आज भी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आती. यही अनसुलझा पहलू इस मंदिर की कहानी को और दिलचस्प बनाता है.

विरासत के रूप में जानते हैं स्थानीय

मंदिर की संरचना भले ही समय के साथ बदल गई हो, लेकिन यहां की आस्था आज भी कायम है. पुजारी वीरेंद्र कुमार तिवारी बताते हैं कि मठिया धाम में साल में दो बार बड़े आयोजन और भंडारे होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. मंदिर के आसपास मौजूद पेड़-पौधे और पास से बहती गोमती नदी इसके वातावरण को और खास बनाते हैं. यहां मठिया माता को लड्डू और बताशे का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा भी है. यानी एक तरफ जमीन के अंदर समाई पुरानी संरचना है, तो दूसरी तरफ आज भी उसी जगह पर जारी धार्मिक परंपराएं. यही वजह है कि मठिया धाम सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि सुल्तानपुर की पुरानी वास्तुकला और लोक आस्था को एक साथ संजोए हुए विरासत स्थल के रूप में सामना आता है.



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