Pitru Paksha Utensils Rules: पितृपक्ष में स्टील, लोहा नहीं केवल इन 3 धातुओं के बर्तन से करें श्राद्ध कर्म और तर्पण, जानें किस धातु का प्रयोग वर्जित

Pitru Paksha Utensils Rules: पितृपक्ष में स्टील, लोहा नहीं केवल इन 3 धातुओं के बर्तन से करें श्राद्ध कर्म और तर्पण, जानें किस धातु का प्रयोग वर्जित


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पितृपक्ष में स्टील, लोहा नहीं केवल इन धातुओं के बर्तन से करें श्राद्ध व तर्पण

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Pitru Paksha Utensils Rules: पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म और तर्पण का विशेष महत्व है. इस दौरान कुछ खास धातुओं के बर्तनों का ही प्रयोग शुभ माना जाता है, जबकि कुछ धातुएं वर्जित होती हैं. क्या आप जानते हैं कि स्टील और लोहे के बर्तनों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? आइए जानते हैं कि पितृपक्ष में किन 3 धातुओं के बर्तनों से श्राद्ध कर्म करना चाहिए और किस धातु का प्रयोग बिल्कुल वर्जित है, ताकि आपके पितरों को शांति मिल सके.

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Pitru Paksha Utensils Rules: पितृपक्ष की आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरुआत हो जाती है और अमावस्या तिथि को समापन हो जाता है. इस बार 27 सितंबर दिन रविवार से तर्पण और श्राद्धकर्म शुरू हो जाएंगे और 10 अक्टूबर दिन शनिवार को पितरों की विदाई हो जाएगी. पितृपक्ष के 16 दिनों में पितरों का तर्पण और श्राद्ध करने की विशेष परंपरा है. हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करने और उनके निमित्त दान-पुण्य करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और पितृदोष से भी मुक्ति मिलती है. पितृपक्ष में तर्पण की विधि में इस्तेमाल होने वाले पात्र को लेकर भी शास्त्रीय परंपराओं में विशेष महत्व बताया गया है. आइए जानते हैं पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म और तर्पण के लिए किस धातु के बर्तन का प्रयोग करें…

तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए किन धातुओं के बर्तन शुभ?

  • धार्मिक परंपराओं के अनुसार, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए चांदी के बर्तन का प्रयोग करना सबसे उत्तम माना गया है. हिंदू धर्म और ज्योतिष में चांदी को सबसे पवित्र और शुद्ध धातु माना गया है और इसका संबंध चंद्रमा से है. तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज के लिए चांदी का बर्तन का प्रयोग करना चाहिए.
  • अगर घर में चांदी के बर्तन उपलब्ध नहीं है तो पीतल, तांबे व कांसे के बर्तन का प्रयोग आप कर सकते हैं. ज्योतिष में तांबे का संबंध सूर्य और मंगल ग्रह से है, पीतल का देवगुरु बृहस्पति और कांसे का संबंध बुध व शुक्र ग्रह से माना गया है. इन धातु के बर्तन का प्रयोग आप तर्पण, पिंडदान या ब्राह्मण भोज में कर सकते हैं.
  • अगर आपके पास तांबे, पीतल व कांसे के बर्तन नही हैं तो दोने व पत्तल का प्रयोग आप कर सकते हैं. साथ ही ध्यान रखें कि श्राद्ध कर्म के लिए गाय के दूध, घी व दही का ही प्रयोग करें और उनको सीधे जमीन पर ना बिठाएं. इसके लिए कुश के आसन का प्रयोग कर सकते हैं. अगर कुश का आसन नहीं है तो कंबल, ऊन, लकड़ी या रेशमी कपड़ा बिछा सकते हैं.

तर्पण और श्राद्ध कर्म में इन धातु का प्रयोग ना करें
पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए स्टील या लोहे के बर्तन का प्रयोग करने से बचें. बहुत से लोग स्टील या लोहे के बर्तन से तर्पण और ब्राह्मण भोज कर देते हैं, जो कि सही नहीं है. स्टील या लोहे के बर्तन पितृपक्ष में प्रयोग करना पूरी तरह वर्जित है. इसके अलावा कांच या प्लास्टिक के बर्तन भी इस्तेमाल नहीं करने चाहिए क्योंकि इन्हें नकारात्मक ऊर्जा व अशुद्धि से जोड़कर देखा जाता है.

कैसे करें पितरों का तर्पण?
पितृपक्ष में 16 दिन तक तर्पण के लिए सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद शांत स्थान पर बैठकर पितरों का स्मरण करें. एक साफ पात्र में जल लें और उसमें काला तिल मिलाएं. परंपरा के अनुसार, तर्पण करते समय जल दक्षिण दिशा की ओर अर्पित किया जाता है. इसके बाद अपने पितरों का नाम और गोत्र स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करें. सामान्य रूप से जल को हाथों की अंजलि से धीरे-धीरे छोड़ने की परंपरा है. तर्पण के दौरान मन में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव रखें.

तर्पण के बाद क्या करें?
तर्पण के बाद पितरों के निमित्त भोजन, अन्न, वस्त्र या अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्य वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है. जरूरतमंद व्यक्ति, ब्राह्मण अथवा गौ सेवा के रूप में दान करने की परंपरा भी कई परिवारों में प्रचलित है. धार्मिक मान्यता है कि श्राद्ध कर्म केवल विधि-विधान का विषय नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्मरण का अवसर भी है.



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