न कंप्यूटर, न इंटरनेट.. चुटकियों में बता देते हैं पूर्वजों का इतिहास, पंडित सामने रखते हैं 200 साल पुरानी वंशावली

न कंप्यूटर, न इंटरनेट.. चुटकियों में बता देते हैं पूर्वजों का इतिहास, पंडित सामने रखते हैं 200 साल पुरानी वंशावली


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न कंप्यूटर, न इंटरनेट.. पंडित चुटकियों में बता देते हैं पूर्वजों का इतिहास

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उज्जैन में श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही सिद्धवट घाट पर पितरों के तर्पण के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. यहां 200 साल पुरानी पोथियों में परिवारों की वंशावली सुरक्षित है. यहां नाम और शहर बताते ही पुरोहित पीढ़ियों का इतिहास आपके सामने रख देते हैं. उज्जैन के सिद्धवट घाट पर पंडे-पुजारियों के पास आज भी सालों पुराने बही-खाते हैं. बड़ी संख्या में लोग यहा अपने पितरों का तर्पण करने पहुंचते हैं.

उज्जैन. आज से श्राद्ध पक्ष की शुरुआत हो चुकी है. 16 दिनों तक श्रद्धालु पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करेंगे. इस बार श्राद्ध विशेष माना जा रहा है. 1966 के बाद 60 वर्ष में दोबारा 6 ग्रहों के पुनरावृत्ति योग में महालय श्राद्ध हो रहा है. सिद्धवट की 200 साल पुरानी पोथियों में आज भी परिवारों की पीढ़ियों का इतिहास दर्ज है. देखा जाता है आज के डिजिटल युग में लेखा-जोखा रखने के लिए जहा बड़े-बड़े कंप्यूटर मौजूद हैं, जिसमें दुनिया भर का डाटा सेव रखा जा सकता है. लेकिन, अगर हमें अपने पूर्वजों के बारे में जानना हो तो क्या करें? इस सवाल का जवाब महाकाल की नगरी उज्जैन में है.

मान्यता है कि क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित सिद्धवट घाट पर पितरों का तर्पण करने से गया जी के समान पुण्य की प्राप्ति होती है. यहां लोग अपना नाम और शहर बताते हैं, जिसके बाद तीर्थ पुरोहित पुरानी पोथियों में दर्ज वंशावली के जरिए उनकी पीढ़ियों की जानकारी सामने रखते हैं. आधुनिक दौर में जहां हर रिकॉर्ड कंप्यूटर में सुरक्षित होता है, वहीं यहां करीब 200 वर्ष पुरानी पोथियों से परिवारों का लेखा-जोखा खोजा जाता है. दावा है कि इन पोथियों में दर्ज जानकारी से पारिवारिक और संपत्ति विवादों के समाधान में भी मदद मिली है.

प्राचीन वटवृक्ष की मान्यता
तीर्थ पुरोहित पंडित राजेश त्रिवेदी ने लोकल 18 को बताया कि लोग प्राचीन वट वृक्ष का पूजन अर्चन कर पितृ शांति के लिए प्रार्थना करते हैं. मान्यता है कि वट वृक्ष देशभर में सिर्फ चार जगह पर स्थित है. इसमें से एक उज्जैन के सिद्धवट घाट पर है. कहते हैं इसे माता पार्वती ने लगाया था. इसका वर्णन स्कंद पुराण में भी है. सिद्धवट पर पितरों के तर्पण का यह कार्य 16 दिन तक चलता है.

गूगल से नहीं, तीर्थ पुरोहित से पूछो
उन्होंने बताया कि कोई भी जानकारी आप गुगल से प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन अपनी वंश बेल की जानकारी आपको गूगल नहीं बल्कि तीर्थ पुरोहित से ही लेनी पड़ेगी. हमारे पूर्वजों ने यह समृद्ध ज्ञान दस्तावेजों में दर्ज कर रखा है, इसे वंशावली कहते हैं. इसमें यजमान की पीढ़ी दर पीढ़ी के नाम दर्ज है, संबंधित कुल से कोई भी व्यक्ति तीर्थ पर आता है, तो उसका नाम उनके पिता, दादा, परदादा के साथ दर्ज कर लिया जाता है. यह परंपरा 200 साल से चली आ रही है.

भावुक हो जाते हैं पिंडदानी
तीर्थ यात्री न सिर्फ यहां अपने गयापाल पंडे से पिंडदान श्राद्ध का कर्मकांड करवाते हैं, बल्कि वहां उनके पास बही-खातों में अपने पूर्वजों की विवरणी देखते हैं. अपने पूर्वजों के नाम देखकर वे खुशी से झूम उठते हैं. वह तब भावुक हो जाते हैं, जब वे अपने पूर्वजों के हस्ताक्षर देखते हैं, तब उनकी खुशियों का ठिकाना नहीं रह जाता है.



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