शताब्दी एक्सप्रेस का नाम क्यों पड़ा? जनशताब्दी से कैसे अलग, बैठने वाली लग्जरी
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Indian Railways Train Series: शताब्दी का मतलब 100 साल से जोड़कर देखा जाता है. आखिर भारतीय रेलवे की ट्रेन का ऐसा नाम क्यों पड़ा? इसे शुरू करने के पीछे बेसिक आइडिया क्या था? और यह जन शताब्दी ट्रेन से किस तरह अलग है? दोनों की खासियत क्या है?
शताब्दी एक्सप्रेस
Shatabdi Express: भारतीय रेलवे के ट्रेन की सीरीज में आज बात प्रीमियम क्लास की एक ट्रेन की. यात्रियों को अपनी मंजिल तक पहुंचाने वाले रेलवे नेटवर्क में लोकल और पैसेंजर ट्रेनों से लेकर राजधानी, शताब्दी और वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेनें शामिल हैं. इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय प्रीमियम ट्रेन का नाम शताब्दी एक्सप्रेस है. अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि इस ट्रेन का नाम ‘शताब्दी’ ही क्यों पड़ा? इसे शुरू करने के पीछे बेसिक आइडिया क्या था? और यह जन शताब्दी ट्रेन से किस तरह अलग है?
शताब्दी एक्सप्रेस क्यों पड़ा नाम?
शताब्दी शब्द का हिंदी में मतलब होता है 100 साल. अंग्रेजी में सेंचुरी. इस ट्रेन की शुरुआत साल 1988 में तत्कालीन रेल मंत्री माधवराव सिंधिया के कार्यकाल में हुई थी. दरअसल 1988 में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की 100वीं जयंती थी. पंडित नेहरू के जन्म शताब्दी के मौके पर 100वें जन्मोत्सव को यादगार बनाने के लिए खास प्लान रखा गया.
यात्रियों को तेज गति और बेहतर सुविधाएं देने के मकसद से इस स्पेशल ट्रेन को लॉन्च किया गया था. इसी वजह से इसका नाम ‘शताब्दी एक्सप्रेस’ रखा गया. देश की पहली शताब्दी एक्सप्रेस 10 जुलाई 1988 को नई दिल्ली से झांसी के बीच में चलाई गई. इसको बाद में इसे भोपाल तक बढ़ाया गया.
क्या है शताब्दी एक्सप्रेस की खासियत?
- फास्ट कनेक्टिविटी: यह एक इंटरसिटी यानी कि दो महत्वपूर्ण शहरों को जोड़ने वाली डे टाइम ट्रेन है. यानी यह सुबह अपनी मंजिल के लिए निकलती है और शाम तक वापस अपने शुरुआती स्टेशन लौट आती है. गौरतलब है कि शताब्दी में स्लीपर कोच नहीं होते हैं. केवल सीटिंग चेयर की सुविधा ही होती है.
- फुल एसी: इस ट्रेन के सभी कोच एयर कंडीशन्ड होते हैं. इसमें एसी चेयर कार (AC Chair Car) और एग्जीक्यूटिव चेयर कार (Executive Chair Car) होते हैं. इसमें कोई स्लीपर या नॉन-एसी कोच नहीं होता है.
- कैटरिंग सर्विस: ट्रेन के किराये में ही खाना और नाश्ता भी शामिल होता है. सफर के दौरान ऑन-बोर्ड कैटरिंग की सेवा दी जाती है.
- कम स्टॉपेज और हाई स्पीड: शताब्दी ट्रेनें कम स्टेशनों पर रुकती हैं और इनकी रफ्तार 130 से 150 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है, जिससे समय की भारी बचत होती है.
जन शताब्दी एक्सप्रेस क्या है?
आम जनता की सुविधा और बजट को ध्यान में रखते हुए रेलवे ने बाद में ‘जन शताब्दी एक्सप्रेस’ की शुरुआत की. इसके नाम में समानता होने के बावजूद दोनों में काफी बड़े अंतर हैं.
शताब्दी और जन शताब्दी में अंतर
साल 1988 में शताब्दी एक्सप्रेस की शुरुआत की गई थी. तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने देश के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू के 100वें जन्मदिन पर प्रीमियम यात्रियों के लिए इसकी शुरुआत की थी. यह सीटिंग चेयर वाली फुल एयर कंडीशन ट्रेन है. इसमें चेयर कार और एग्जीक्यूटिव क्लास होती है. इसमें प्रीमियम कैटिगरी में किराया भी अधिक होता है. हालांकि किराये में ही खाना कैटरिंग शामिल होता है. इसमें लग्जरी और प्रीमियम सुविधाएं मौजूद होती हैं.
वहीं जनशताब्दी एक्सप्रेस की बात करें तो 2002 में नीतीश कुमार के कार्यकाल में आम पब्लिक को कम खर्चे में तेज सफर की सुविधा के लिए इसकी शुरुआत की गई. इसमें सीटिंग की व्यवस्था है लेकिन एसी और नॉन एसी दोनों ही कोच होती है. इसमें किराया काफी कम और किफायती होता है. इसके किराए में खाना शामिल नहीं होता है, बल्कि यात्री खुद ही खरीद कर खा सकते हैं. बुनियादी और कम्फर्टेबल सुविधाएं होती हैं.
क्यों शुरू हुई थी जन शताब्दी?
शताब्दी एक्सप्रेस का किराया प्रीमियम होने के कारण यह आम लोअर मिडिल क्लास के बजट से बाहर थी. हर कोई एसी कोच का महंगा टिकट नहीं खरीद सकता था. इसी जरूरत को समझते हुए साल 2002 में रेलवे ने जन शताब्दी एक्सप्रेस शुरू की. इसका मकसद आम लोगों को भी शताब्दी ट्रेन जैसी ही स्पीड और समय पर पहुंचने की सुविधा देना था. लेकिन बिना महंगे किराये और बिना मैन्डेटरी कैटरिंग चार्ज के ही.