Lalbaugcha Raja History: गणेश उत्सव की बात हो और मुंबई के लालबागचा राजा का जिक्र ना आए, ऐसा हो ही नहीं सकता है. मुंबई के परेल इलाके में सजने वाले इस भव्य दरबार में बप्पा के दर्शन के लिए आम जनता से लेकर बॉलीवुड सितारे, उद्योगपति और नेता तक लाइन में खड़े नजर आते हैं. मुकेश अंबानी यहां पहुंचे. फिल्मी सितारों से लेकर राजनेताओं तक यहां माथा टेकते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर में प्रसिद्ध इस ‘राजा’ का इतिहास मुंबई के गरीब मछुआरों, मिल मजदूरों और एक मन्नत से जुड़ा हुआ है? आखिर लालबागचा राजा के नाम, इतिहास और मछुआरों से जुड़ी वो खास कहानी क्या है, जिसने एक छोटे से बाजार को आस्था के सबसे बड़े केंद्र में बदल दिया. इस जगह का नाम लालबाग कैसे पड़ा, इसका भी किस्सा है.
कैसे पड़ा नाम ‘लालबागचा राजा’?
मराठी भाषा में लालबागचा राजा का मतलब होता है लालबाग का राजा. इसके अलावा, इन्हें नवसाचा गणपति यानी ‘मन्नत पूरी करने वाले गणेश’ भी कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त यहां सच्चे दिल से मन्नत मांगता है, बप्पा उसकी मनोकामना जरूर पूरी करते हैं. मुंबई का लालबाग इलाका 1900 के शुरुआती दशक में कपड़ा मिलों का गढ़ हुआ करता था. इसे गिरनगांव यानी मिलों का गांव भी कहा जाता था. लालबाग में स्थापित होने वाले गणपति बप्पा को यहां के स्थानीय लोग अपने पूरे इलाके का रक्षक और ‘राजा’ मानते हैं.
मछुआरों की मन्नत से हुई शुरुआत
लालबागचा राजा की स्थापना की कहानी साल 1934 से शुरू होती है. उस दौर में अंग्रेजों के शासन और आर्थिक मंदी के कारण परेल में खुला पेरू चाल बाजार बंद कर दिया गया. इस बाजार में सब्जी बेचने वाले फेरीवाले, छोटे व्यापारी और मुख्य रूप से कोली समुदाय के मछुआरे अपना कारोबार चलाते थे. बाजार बंद होने से इन मछुआरों और दुकानदारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया.
स्थानीय मछुआरों और व्यापारियों ने मिलकर फैसला किया कि अगर उन्हें व्यापार के लिए स्थायी जगह मिल गई, तो वे यहां भगवान गणेश की स्थापना करेंगे. फिर मन्नत पूरी भी हो गई. कुंवरजी जेठाभाई शाह, डॉ. वी. बी. कोरगांवकर, स्थानीय नेताओं और जमीन मालिक मालक रजबअली तय्यबअली की मदद से 1934 में बाजार के लिए एक नया भूखंड मंजूर हो गया, जिसे आज हम लालबाग मार्केट के नाम से जानते हैं.
मन्नत पूरी होने की खुशी में 12 सितंबर 1934 को कोली मछुआरों और स्थानीय व्यापारियों ने पहली बार पारंपरिक रूप से मछुआरों के पहनावे में गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित की. तभी से ‘लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल’ की शुरुआत हुई.
क्यों प्रसिद्ध है लालबागचा राजा
1935 से लेकर आज तक 91 साल का समय गुजर गया लेकिन लालबागचा राजा की मूर्ति बनाने का काम कांबली परिवार ही करता आ रहा है. इस मूर्ति की सबसे बड़ी खासियत इसका अनूठा और भव्य रूप है. 20 फीट ऊंची प्रतिमा, सिंह पर विराजमान शाही मुद्रा और शांत-करुणामयी चेहरा. बप्पा के इस खास रूप का पेटेंट भी कांबली परिवार के नाम पर ही दर्ज है.
जगह का नाम लालबाग कैसे पड़ा?
इस इलाके का नाम ‘लालबाग’ पड़ने के पीछे का भी एक किस्सा है. मराठी में मुख्य शहर से कुछ अलग हटकर बसी हुई बस्ती को वाडी कहा जाता है. इस जगह पर बस्तियां बसाने के लिए जो मिट्टी लाकर भरी गई थी, उसका रंग लाल था. इस लाल रंग की मिट्टी से ही जमीन को समतल किया गया. बाद में यहां पर पेड़-पौधे उगने से यह बाग में तब्दील हो गया. यहां सुपारी, कटहल आम के पेड़ लगे. इस तरह से वाडी बदलकर बाग हो गया. फिर इसे लालबाग कहा जाने लगा.
मन्नत के लिए कई घंटों की लाइन
लालबागचा राजा के दर्शन के लिए दो अलग-अलग लाइनें लगती हैं. एक मेन लाइन है, जहां से भक्त दूर से ही बप्पा के दर्शन करके निकल जाते हैं. दूसरी मन्नत लाइन है, जहां भक्त बप्पा के चरणों में अपना माथा टेककर मन्नत मांगते हैं. इस लाइन में आम लोग 24 से 40 घंटे तक बिना थके खड़े रहते हैं.
सामाजिक सेवा और चैरिटी
लालबागचा राजा मंडल केवल एक धार्मिक संगठन नहीं है, बल्कि यह चढ़ावे में मिलने वाले पैसों से मुफ्त डायलिसिस सेंटर, अस्पताल, एम्बुलेंस सेवाएं, अनाथालयों की मदद और आपदा राहत कोष में करोड़ों रुपये का दान भी देता है.