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मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों के मामले में देश में अलग पहचान रखता है. यहां के 53 प्रतिशत भू-भाग पर वन है. इसके अलावा कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहर है, जिसे देख हर कोई हैरान रह जाता है. यहां पर देवी-देवताओं के कई मंदिर है.
मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों के मामले में देश में अलग पहचान रखता है. यहां के 53 प्रतिशत भू-भाग पर वन है. इसके अलावा कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहर है, जिसे देख हर कोई हैरान रह जाता है.यहां पर देवी-देवताओं के कई मंदिर है. ऐतिहासिक धरोहरों की बात करें, तो हट्टा कई बावड़ी, लाँजी का किला और लाँजी का कोटेश्वर धाम सुप्रसिद्ध स्थानों में से एक है.
कई ऐसे स्थल है, जो सिस्टम की अनदेखी का शिकार और गुमनाम धरोहर बन चुकी है. इसका जीता-जागता उदाहरण जिला मुख्यालय से लगे ग्राम गोंगलई में देखने को मिला। जहां पर 10वीं शताब्दी की भगवान गणेश की प्रतिमा, जो किसान के खेत में स्वयं ही प्रकट हुई है. जिसकी हर साल गणेश उत्सव पर पूजा अर्चना होती है.
जमीन से निकली थी भगवान गणेश की प्रतिमा
अब से करीब 15 साल पहले साल 2011 में बाालाघाट के गोंगलाई गांव में भगवान गणेश और भगवान राम की प्रतिमाएं जमीन के भीतर से प्रकट हुई थी. इन प्रतिमाओं क़ो देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी. पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की टीम भी गोंगलई गांव पहुंची थी और इन प्रतिमाओ क़ो लें जाने की बात कही गई थी. लेकिन उस समय ग्रामीणों ने खुलकर विरोध किया था. ग्रामीणों की सहमति न मिलने के चलते विभाग इन प्रतिमाओं को संग्रहालय तक नहीं ले जा सका. पुरातत्व विभाग के मुताबिक, यह प्रतिमा लगभग 10वीं शताब्दी के आसपास की मानी गई। प्रतिमा की बनावट और कलात्मक शैली इसे ऐतिहासिक दृष्टि से अहम बनाती है. अगर समय रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में उनके मूल आकृति और ऐतिहासिक महत्व को नुकसान पहुंच सकता है.
खुले में पड़ी सदियों पुरानी धरोहर
बालाघाट जिले का ग्राम गोंगलई पुरातत्विक पाषाण प्रतिमाओ के लिए एक अलग पहचान रखता है. यहाँ प्राचीन इतिहास और पुरातात्विक धरोहर से जुड़ी कई महत्वपूर्ण प्रतिमाएं आज भी खुले आसमान के नीचे एक खेत में पड़ी हुई हैं. इनमें करीब 10वीं शताब्दी की मानी जा रही भगवान गणेश की विशाल प्रतिमा के साथ महिला योद्धाओं की प्रतिमाओं के अवशेष भी शामिल हैं. इन ऐतिहासिक प्रतिमाओं के संरक्षण और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण अब इनके धीरे-धीरे जर्जर होने का खतरा बना हुआ है. आस्था की बड़ी बात यह है कि हर साल विशेष अवसरो पर या कहे गणेश उत्सव पर स्थानीय किसान और ग्रामीण पूजा अर्चना करने आते है.
जमीन के भीतर खजाना
जिनके खेत में ये प्रतिमाएं निकली है, वह उर्मिला बिसेन बताती है कि उन्होंने जब खेत में मूर्तियों को लेकर पुजा पाठ करवाया था. पुजारी ने कहा था कि जहां से मूर्तियां निकली है, उस जमीन के भीतर कई कमरे भी है.वहीं, टांकों में सोना-चांदी और जवारात है। हालांकि, भूमि मालिक ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया है.
गांव में म्यूजियम बनाने की है मांग
गांव मे खुले आसमान के नीचे भगवान गणेश की प्रतिमा के अलावा भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता समेत कई महिला योद्धाओं से जुड़ी प्रतिमाओं के अवशेष भी सामने आए. इन प्रतिमाओं को देखकर क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश को समझने की संभावनाएं भी जुड़ी हुई हैं. गोंगलई की यह धरोहर सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि बालाघाट के प्राचीन ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हो सकती है ऐसे में ग्रामीणों की मांग है कि गांव में एक म्यूजियम बनाकर मुर्तियों को संरक्षित किया जाए.