क्या CEC के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है? कहना आसान लेकिन करना क्यों मुश्किल? प्रक्रिया क्या है

क्या CEC के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है? कहना आसान लेकिन करना क्यों मुश्किल? प्रक्रिया क्या है


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क्या CEC के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है? कहना आसान लेकिन करना क्यों मुश्किल

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SIR पर चुनाव आयोग के सदस्यों में मतभेद की खबरों के बाद से मामला राजनीतिक हो गया है. कांग्रेस ने CEC के खिलाफ महाभियोग की बात कही है. ये महाभियोग क्या होता है और क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को इस प्रक्रिया से हटाया जा सकता है? ऐसा क्यों है कि ये बात कहने में तो आसान है लेकिन करना उतना ही मुश्किल है.

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CEC के खिलाफ महाभियोग

कांग्रेस पार्टी SIR विवाद के बीच देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की तैयारी में जुट गई है. चुनाव आयोग में मतभेद का मसला राजनीतिक हो गया है. भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव को संपन्न कराने की जिम्मेदारी भारतीय निर्वाचन आयोग पर होती है. चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दबाव में काम ना करे, इसके लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (ECs) की सेवा शर्तों और उन्हें पद से हटाने के लिए खास व्यवस्था दी गई है. हालांकि अहम सवाल है कि ये महाभियोग क्या होता है और क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को इस प्रक्रिया से हटाया जा सकता है? ऐसा क्यों है कि ये बात कहने में तो आसान है लेकिन करना उतना ही मुश्किल है.

क्या चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है?
अगर तकनीकी और संवैधानिक नजरिए से समझा जाए तो महाभियोग यानी Impeachment शब्द का प्रयोग भारतीय संविधान में केवल भारत के राष्ट्रपति को हटाने के लिए अनुच्छेद 61 के तहत ही किया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संविधान में निष्कासन यानी रिमूवल की प्रक्रिया का जिक्र है. हालांकि, बोलचाल और राजनीतिक शब्दावली में CEC को हटाने की इस प्रक्रिया को भी महाभियोग ही कह दिया जाता है, क्योंकि यह प्रक्रिया ठीक वैसी ही है जैसी सुप्रीम कोर्ट के जज को पद से हटाने के लिए अपनाई जाती है.

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आधार क्या है?
संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल दो ही आधार पर पद से हटाया जा सकता है. पहला है साबित हो चुका मिसबिहैवियर यानी पद का दुरुपयोग या फिर पक्षपातपूर्ण रवैया साबित होना. दूसरी है अक्षमता, मतलब मानसिक या शारीरिक रूप से पद के दायित्व निभाने में असमर्थ होना.

CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल और कठिन है, जिसे Judges (Inquiry) Act, 1968 से गवर्न किया जाता है. प्रस्ताव की शुरुआत के बाद लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ प्रस्ताव पेश किया जाना जरूरी है. वहीं राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होना जरूरी है. इसके बाद पीठासीन अधिकारी का निर्णय आता है. लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को यह अधिकार होता है कि वे प्रस्ताव को स्वीकार करें या खारिज कर दें.

  • जांच समिति का गठन: प्रस्ताव स्वीकार होने पर आरोपों की जांच के लिए 3-सदस्यीय समिति बनाई जाती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज, किसी हाई कोर्ट के मुख्य जज, प्रतिष्ठित जूरिस्ट शामिल होते हैं.
  • संसद में मतदान की बात: अगर समिति आरोपी को दोषी पाती है, तो संसद में प्रस्ताव पर चर्चा होती है. इसे पास कराने के लिए विशेष बहुमत चाहिए होता है. सदन के कुल सदस्यों का बहुमत भी जरूरी है. उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) बहुमत होना चाहिए. यह प्रस्ताव दोनों सदनों में एक ही सत्र में पारित होना आवश्यक है. दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, जिसके बाद राष्ट्रपति औपचारिक निष्कासन आदेश जारी करते हैं.

अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के रिमूवल के नियम में अंतर है. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को संसद की विशेष प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है. जैसे जज हटाने की प्रक्रिया होती है. वहीं अन्य चुनाव आयुक्त पर गौर करें तो संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए संसद की जटिल प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती. इन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा सीधे हटाया जा सकता है.

भारत के इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस प्रक्रिया के जरिए पद से नहीं हटाया गया है. इस प्रक्रिया को इतना कठोर इसलिए बनाया गया है ताकि देश का मुख्य निर्वाचन अधिकारी बिना किसी सरकारी या राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र होकर काम कर सके.

किस बात पर है विवाद?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में SIR को लेकर चुनाव आयोग के अधिकारियों के बीच मतभेदों का जिक्र है. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने तीन सदस्यीय चुनाव पैनल में एसआईआर पर सवाल उठाए हैं. संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई. ऐसा आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपनी मनमर्जी से काम कर रहे थे.



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