What Is ECINET Controversy: चुनाव आयोग में अनबन की खबर के बीच सबसे बड़ा बवाल ECINET सॉफ्टवेयर को लेकर है. इसी सॉफ्टवेयर के जरिए वोटरलिस्ट से किसी मतदाता के नाम काटे या जोड़े जाते हैं. देश के 13 राज्यों में चले एसआईआर में इसी सॉफ्टवेयर के जरिए वोटरों के नाम काटे या जोड़े गए. इसी के जरिए आपत्तियों का निपटारा किया जाता है. यानी यह एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो बेहद संवेदनशील और पूरी चुनावी प्रक्रिया की रीढ़ है. इसमें वोटर्स की हर एक समस्या का निदान है. लेकिन, बुधवार को चुनाव आयोग के भीतर अनबन की आई खबर में सबसे ज्यादा विवाद इसी सॉफ्टवेयर को लेकर है. चुनाव आयुक्तों ने अपनी आपत्तियों में लिखा है कि ECINET सॉफ्टवेयर का एक्सेस उन अधिकारियों के पास नहीं है जिनके पास कानूनी तौर पर इसका एक्सेस होना चाहिए.
इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य को स्थापित करने के लिए गोवा का उदाहरण दिया है. गोवा में 97 वोटर्स के नाम वोटर लिस्ट में जोड़ने के लिए वहां के अधिकारियों ने सात दिन में आठ बार मेल किए लेकिन, उनके नाम लिस्ट में नहीं जोड़े गए. जबकि होना यह चाहिए था कि ईसीआईनेट का एक्सेस इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ईआरओ के पास होना चाहिए था. यह अधिकारी आमतौर पर एसडीएम स्तर के अधिकारी होते हैं. वैधानिक तौर पर यही अधिकारी वोटर लिस्ट में किसी व्यक्ति के नाम रखने, जोड़ने या हटाने के लिए उत्तरदायी होती है. लेकिन, आरोप लग रहे हैं कि अब मामला पूरी तरह सेंट्रलाइज कर दिया गया है. इसी कारण पूरा विवाद मचा हुआ है.
क्या है ECINET सॉफ्टवेयर?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ECINET आखिर है क्या. चुनाव आयोग ने जनवरी 2026 में ECINET नाम का एक एकीकृत डिजिटल मंच शुरू किया था. इसका मकसद चुनाव से जुड़ी अलग-अलग डिजिटल व्यवस्थाओं को एक जगह लाना है. चुनाव आयोग के मुताबिक इसमें मतदाता सेवाओं से लेकर चुनाव संबंधी कई डिजिटल काम शामिल हैं. मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्था भी इसी डिजिटल ढांचे का हिस्सा है. यानी मतदाता का नाम जोड़ने, हटाने, सुधार करने और दावों-आपत्तियों की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाला डिजिटल तंत्र अब इस पूरी व्यवस्था से जुड़ा है. यहीं से विवाद की असली शुरुआत होती है.
कागज पर फैसला लेने का अधिकार जिस अधिकारी के पास है, उसके पास डिजिटल व्यवस्था में उस फैसले को दर्ज करने या बदलने की सुविधा नहीं है. ऐसे में सवाल सिर्फ सॉफ्टवेयर का नहीं रह जाता. सवाल यह बन जाता है कि कानून के तहत फैसला कौन ले रहा है और उस फैसले को लागू कौन कर रहा है? यही सवाल दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की दर्ज आपत्तियों में भी उठाए जाने का दावा किया गया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों ने पिछले 10 महीनों में कई मौकों पर मतदाता सूची से जुड़े काम के केंद्रीकरण और ईआरओ की भूमिका सीमित होने पर सवाल उठाए.
कानूनी तौर पर ECINET में किसका एक्सेस?
यहां सॉफ्टवेयर और कानून के बीच का फर्क समझना सबसे जरूरी है. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने, सुधारने या हटाने की जिम्मेदारी से जुड़े अधिकारियों का स्पष्ट ढांचा है. कानून में राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी सीईओ, जिला निर्वाचन अधिकारी यानी डीईओ और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ के पदों का प्रावधान है. ईसीआई के अपने चुनावी रोल मैनुअल के मुताबिक किसी विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन की वैधानिक जिम्मेदारी ईआरओ की होती है. ईआरओ राज्य सरकार का ऐसा अधिकारी होता है जिसे चुनाव आयोग संबंधित विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने के लिए नियुक्त करता है. आमतौर पर यह अधिकारी एसडीएम स्तर का होता है.
ईसीआई की वेबसाइट भी साफ कहती है कि किसी व्यक्ति के नाम को मतदाता सूची में शामिल करने के दावे और आपत्तियों की जांच का अधिकार संबंधित ईआरओ या एईआरओ यानी सहायक ईआरओ के पास होता है. यानी साधारण भाषा में समझें तो ईआरओ वह अधिकारी है जो किसी विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची के मामले में जमीन पर वैधानिक फैसला लेता है. अब विवाद यह है कि उस फैसले को डिजिटल सिस्टम में दर्ज करने के लिए उसके पास कितनी पहुंच है.
ERO, DEO और CEO कौन होते हैं?
तीनों अधिकारियों की भूमिका अलग-अलग है. ईआरओ किसी विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची का वैधानिक अधिकारी होता है. नाम जोड़ने, हटाने या सुधार से जुड़े दावों और आपत्तियों पर फैसला करने में उसकी केंद्रीय भूमिका होती है.
डीईओ जिले के स्तर पर चुनाव से जुड़े कामों का समन्वय और निगरानी करता है. ईसीआई के मैनुअल के मुताबिक डीईओ आमतौर पर कलेक्टर, जिलाधिकारी या डिप्टी कमिश्नर स्तर का अधिकारी होता है. वह जिले में मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन से जुड़े कामों का समन्वय करता है.
इसके ऊपर आता है सीईओ. यह राज्य स्तर का अधिकारी होता है. वह राज्य में मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव कराने से जुड़े कामों की निगरानी करता है. हालांकि वह भी चुनाव आयोग के समग्र नियंत्रण और निर्देश के तहत काम करता है. इसलिए अगर किसी ईआरओ ने जांच के बाद किसी मतदाता को पात्र पाया है, तो उस फैसले को डिजिटल व्यवस्था में दर्ज करने की क्षमता भी उसी वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए- यही इस विवाद का मूल सवाल है.
फिर ECINET को लेकर बवाल क्यों?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक विवाद सिर्फ इस बात पर नहीं है कि ECINET का इस्तेमाल हो रहा है. विवाद इस बात पर है कि किस अधिकारी के पास सॉफ्टवेयर में कौन-सा अधिकार है. रिपोर्ट के मुताबिक ईआरओ, एईआरओ, डीईओ और सीईओ के स्तर पर लिए गए फैसलों को दर्ज करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें सुधारने के लिए सॉफ्टवेयर में जरूरी सुविधाओं को लेकर सवाल उठे हैं. दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि मतदाता सूची के आंकड़ों का नियंत्रण धीरे-धीरे केंद्रीकृत होता गया और जमीनी अधिकारियों की सॉफ्टवेयर तक पहुंच सीमित कर दी गई. और इसी सवाल का सबसे बड़ा उदाहरण गोवा बना है.
गोवा के 97 मतदाताओं का पूरा मामला क्या?
गोवा में एसआईआर के दौरान कुछ मतदाताओं के नाम को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति के आधार पर जांच के दायरे में रखा गया. लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी का मतलब यह नहीं होता कि व्यक्ति अपने आप अयोग्य हो गया. यह उस समय सामने आती है जब सॉफ्टवेयर पुराने मतदाता रिकॉर्ड से किसी व्यक्ति के नाम, रिश्ते या उम्र जैसी जानकारियों का मिलान करता है और उसमें अंतर दिखाई देता है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को निर्देश दिया था कि ऐसे मतदाताओं को अपनी आपत्ति या दस्तावेज देने का मौका दिया जाए और उन्हें सुनवाई का अवसर मिले. गोवा में इसके बाद 649 लोग दस्तावेज या आपत्ति लेकर सामने आए. ईआरओ और एईआरओ ने इन मामलों की जांच की. इनमें 97 लोगों को ईआरओ स्तर पर अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया गया. यहीं से असली पेच शुरू हुआ.
पहले सॉफ्टवेयर में इन लोगों को लेकर जो फैसला दर्ज हुआ था, उसे वापस लेने के लिए ईआरओ के पास जरूरी ‘रोल बैक’ सुविधा उपलब्ध नहीं थी. गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस सुविधा के लिए दिल्ली स्थित अधिकारियों को लगातार ईमेल किए. 11 से 17 फरवरी के बीच सात दिनों में आठ बार इस सुविधा की मांग की गई. लेकिन इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक अंतिम सूची प्रकाशित होने तक यह सुविधा उपलब्ध नहीं हुई. 21 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी हुई और जांच के मुताबिक वे 97 नाम उसमें शामिल नहीं थे.
चुनाव आयोग.
इन 97 लोगों का मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों?
सिर्फ 97 नाम सुनकर लग सकता है कि इतने बड़े देश में यह बहुत छोटी संख्या है. लेकिन विवाद संख्या का नहीं, प्रक्रिया का है. यहां सवाल यह है कि अगर स्थानीय स्तर पर वैधानिक अधिकारी ने दस्तावेज देखकर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल करने योग्य पाया, तो क्या तकनीकी व्यवस्था उस फैसले को लागू करने में सक्षम थी? अगर निचले स्तर के जिम्मेदार अधिकारी के पास यह एक्सेस नहीं था तो इस पूरे सिस्टम को कौन कंट्रोल कर रहा था. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अपने आधिकारिक नोट्स में सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठाए हैं.
जोशी ने मतदाता सूची के आंकड़ों के क्रमिक केंद्रीकरण की बात कही, जबकि संधू ने यह सवाल उठाया कि ईआरओ, डीईओ और सीईओ को ईआरओनेट पर पूरा और उचित एक्सेस नहीं मिल रहा है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को कानून के तहत काम करने वाले इन अधिकारियों की पहुंच सीमित करने का अधिकार है या नहीं.
तो असली सवाल क्या है?
ECINET विवाद का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सॉफ्टवेयर नया है या पुराना. न ही सिर्फ यह कि उसका नियंत्रण दिल्ली में है. असल सवाल यह है-
- क्या डिजिटल व्यवस्था ने कानून में तय अधिकारी की शक्ति को सिर्फ तकनीकी सुविधा तक सीमित कर दिया है?
- कानून कहता है कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने-हटाने की वैधानिक जिम्मेदारी ईआरओ की है. ईसीआई का अपना मैनुअल भी ईआरओ को संबंधित विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची का वैधानिक अधिकारी बताता है.
- अगर ईआरओ किसी मामले की सुनवाई करके फैसला लेता है, लेकिन उस फैसले को लागू करने के लिए उसे किसी दूसरे स्तर से सॉफ्टवेयर की अनुमति लेनी पड़े, तो यहां कानूनी अधिकार और तकनीकी नियंत्रण के बीच टकराव का सवाल उठता है.
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला इसी सवाल को सामने लाता है. और यही वजह है कि ECINET को लेकर चल रहा विवाद सिर्फ किसी सॉफ्टवेयर की तकनीकी गड़बड़ी की कहानी नहीं है. यह उस बड़े सवाल से जुड़ा है कि मतदाता सूची में अंतिम फैसला लेने की शक्ति कानून ने जिस अधिकारी को दी है, डिजिटल दौर में उस शक्ति का वास्तविक नियंत्रण भी उसी के पास है या नहीं.