Who is Saba Haider | UP की बेटी का अमेरिका में जलवा, 71% वोट पाकर बनीं सीनेटर, जानिए सबा हैदर की पूरी कहानी

Who is Saba Haider | UP की बेटी का अमेरिका में जलवा, 71% वोट पाकर बनीं सीनेटर, जानिए सबा हैदर की पूरी कहानी


बुलंदशहर : एक बार फिर विदेश में यूपी का डंका बज रहा है. यूपी के बुलंदशहर की बेटी सबा हैदर ने अमेरिका में एक अलग पहचान बनाई है. दरअसल, अमेरिका में हुए 2026 के मध्यावधि चुनावों में 71.8 फीसदी वोट हासिल कर शानदार जीत हासिल की. उन्होंने इलिनॉयसस राज्य की 84वीं डिस्ट्रिक्ट सीट पर डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था. इस मुकाबले में उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार ब्रायन स्कोपा को बड़े अंतर से हराया. इसके साथ ही वह इलिनोइस जनरल असेंबली के लिए चुनी जाने वाली पहली दक्षिण एशियाई महिला बन गईं.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में वाइल्डलाइफ साइंस की पढ़ाई करने वाली सबा ने पहले योग टीचर के रूप में लोगों के बीच जगह बनाई और अब राजनीति में भी बड़ी कामयाबी हासिल की है. सबा की इस जीत से गाजियाबाद में रह रहे उनके परिवार में खुशी का माहौल है. वहीं बुलंदशहर में रहने वाले रिश्तेदारों ने भी उनकी कामयाबी पर खुशी जताई. सबा के परिवार की जड़ें बुलंदशहर के औरंगाबाद कस्बे से जुड़ी हैं. उनकी इस जीत को परिवार के साथ-साथ भारत के लिए भी गर्व का पल बताया जा रहा है.

‘पूरे देश के लिए गर्व की बात’

सबा के पिता सैयद अली हैदर रिटायर्ड इंजीनियर हैं. चुनाव परिणाम आने के बाद से ही उन्हें लगातार बधाई देने के लिए फोन आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उनके परिवार की जीत नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का पल है. वहीं, सबा की मां चांदनी ने बताया कि उनकी बेटी को बचपन से ही सामाजिक मुद्दों और राजनीति में दिलचस्पी थी. वह स्कूल के दिनों से ही डिबेट और भाषण प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती थीं.

गाजियाबाद में हुई पढ़ाई, AMU से हासिल किया गोल्ड मेडल

सबा हैदर की शुरुआती पढ़ाई गाजियाबाद के होली चाइल्ड स्कूल में हुई. इसके बाद उन्होंने राम चमेली चड्ढा विश्वास गर्ल्स कॉलेज से बीएससी की डिग्री हासिल की. पढ़ाई में शुरू से अच्छी रहीं सबा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से वाइल्डलाइफ साइंस में पढ़ाई की और गोल्ड मेडल हासिल किया. साल 2006 में उनकी शादी बुलंदशहर के रहने वाले अली काजमी से हुई. अली कंप्यूटर साइंस इंजीनियर हैं. शादी के एक साल बाद यानी 2007 में सबा अपने पति के साथ अमेरिका चली गईं. इसके बाद उन्होंने शिकागो इलाके में अपना नया जीवन शुरू किया.

अमेरिका में बनीं योग टीचर

अमेरिका पहुंचने के बाद सबा ने अपनी पढ़ाई और अनुभव को नए तरीके से आगे बढ़ाया. उन्होंने सर्टिफाइड योग टीचर का प्रशिक्षण लिया और योग सिखाने लगीं. उनके पास कॉलेज के छात्रों से लेकर कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वाले प्रोफेशनल्स तक योग सीखने आते थे. योग और वेलनेस के क्षेत्र में काम करते हुए सबा ने स्थानीय लोगों के बीच अपनी पहचान बनाई. इसके साथ ही वह सामाजिक गतिविधियों से भी जुड़ी रहीं. धीरे-धीरे उनका संपर्क अलग-अलग समुदायों के लोगों से बढ़ता गया. यही आगे चलकर उनकी राजनीतिक सफर में भी काम आया.

मां चांदनी ने कहा कि सबा के पति अली काजमी ने भी हर कदम पर उसका साथ दिया. उन्होंने सबा को सामाजिक मुद्दों पर काम करने और राजनीति में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया. परिवार ने भी हमेशा उनके सपनों और फैसलों का समर्थन किया. बता दें, सबा और अली काजमी के दो बच्चे हैं. उनके बेटे का नाम अजीम है, जिसकी उम्र 16 साल है, जबकि बेटी आइजा 12 साल की है.

पहली बार चुनाव लड़ा तो मिली थी हार

सबा हैदर का राजनीति में पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा. उन्होंने सबसे पहले साल 2022 में ड्यूपेज काउंटी बोर्ड का चुनाव लड़ा था. हालांकि, इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. वह करीब 1000 वोटों के अंतर से चुनाव हार गई थीं. इस हार के बाद भी उन्होंने राजनीति में आगे बढ़ने का फैसला नहीं छोड़ा. साल 2024 में उन्होंने एक बार फिर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया. इस बार उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी की मौजूदा सदस्य पैटी गस्टिन को हराकर ड्यूपेज काउंटी बोर्ड में अपनी जगह बनाई. बताया गया कि उन्होंने यह चुनाव 8,521 वोटों के अंतर से जीता था. ड्यूपेज काउंटी बोर्ड में छह जिलों से चुने गए प्रतिनिधि शामिल होते हैं. बोर्ड के सदस्यों का कार्यकाल ड्रॉ के आधार पर तय होता है, जो दो से चार साल तक अलग-अलग हो सकता है.

काउंटी बोर्ड में संभाली अहम जिम्मेदारी

ड्यूपेज काउंटी बोर्ड में चुने जाने के बाद सबा को कई अहम जिम्मेदारियां मिलीं. उन्होंने बोर्ड की पर्यावरण और रणनीतिक योजना समितियों की अध्यक्षता की. इस दौरान उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य और समुदाय के विकास से जुड़े मुद्दों पर काम किया. सबा का फोकस स्थानीय लोगों की जरूरतों और उनकी समस्याओं को समझने पर रहा. योग और सामाजिक गतिविधियों के जरिए पहले से ही समुदाय के बीच उनकी अच्छी पहचान बन चुकी थी. काउंटी बोर्ड में काम करने के अनुभव ने उनकी राजनीतिक समझ और मजबूत की.



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