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Property knowledge : जमीन के बंटवारे में एक समस्या अक्सर आती है कि यह पता नहीं होता कि जमीन पुश्तैनी या बंटवारे वाली. यहीं पर चूक होती है और पिता एक बेटे को ज्यादा हिस्सा थमा देता है. ऐसे में आप कैसे पता करेंगे कि जमीन पुश्तैनी या नहीं. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने 4 पिलर बताए हैं. इनके आधार पर आप साबित कर सकते हैं कि संबंधित जमीन पुश्तैनी है और उस पर कोर्ट में परिवाद भी दायर कर सकते हैं.
पुश्तैनी जमीन साबित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 4 पिलर बताए हैं.
नई दिल्ली. जमीन-जायदार के बंटवारे में एक विवाद अक्सर सामने आता है कि संबंधित जमीन पुश्तैनी है या फिर बंटवारे वाली है, जिसमें सभी का हिस्सा नहीं होता है. अगर एक परिवार में 3 भाई हैं और उनके पिता ने किसी एक बेटे को ज्यादा संपत्ति दे दी तो अन्य बेटों को उसमें हिस्सा लेने का अधिकार है या नहीं, इसका निर्धारण पुश्तैनी जमीन से ही होता है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों पुश्तैनी जमीन को लेकर बड़ा फैसला सुनाया और कोई जमीन पुश्तैनी या नहीं, इसे लेकर 4 फॉर्मूले भी दिए हैं.
अगर आपके साथ भी जमीन विवाद में यह समस्या सामने आ रही है कि संबंधित प्रॉपर्टी पुश्तैनी है या नहीं तो इसकी पहचान करने के लिए कुछ फैक्टर पर नजर रखना जरूरी है. यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि अगर आपने परिवाद दायर किया है तो जमीन को पुश्तैनी साबित करने का जिम्मा भी आपका ही होगा. अगर विवाद के दौरान यह साबित कर दिया कि संबंधित जमीन पुश्तैनी है तो निश्चित रूप से आपको उसमें से हिस्सा लेने से कोई रोक नहीं सकता है. अब सुप्रीम कोर्ट के वह 4 पिलर भी जान लीजिए जिससे जमीन के पुश्तैनी होने का पता चलता है.
संयुक्त परिवार का होना जरूरी
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 में साफ कहा गया है कि किसी पुश्तैनी जमीन का निर्धारत इस बात से होता है कि दादा, परदादा, पिता और चाचा सभी संयुक्त परिवार से ही आए हैं. इसके लिए वंशावली, परिवार रजिस्टर और जन आधार से सुबूत जुटाए जा सकते हैं. इसका मतलब है कि अगर परिवार के सारे लोग एकसाथ रहते हैं तो संभव है कि उनके द्वारा इस्तेमाल की जा रही संपत्ति पुश्तैनी हो.
जमीन से दादा या पिता का संबंध
सुप्रीम कोर्ट का पिलर नंबर 2 कहता है कि आपको यह साबित करना होगा कि संबंधित आपके परदादा और दादा से ही पिता के पास आई है, उन्होंने इसे खुद नहीं खरीदी है. अगर पिता ने दादा की संपत्ति के इस्तेमाल से भी नई जमीन खरीदी है तो भी वह पुश्तैनी जमीन ही मानी जाएगी. यह सबसे जरूरी प्वाइंट है, क्योंकि कई बार ऐसा दावा किया जाता है कि पिता ने कुछ जमीन अपने नाम से खरीदी है तो वह उनकी होगी. ऐसा नहीं है, अगर उन्होंने जमीन खुद की कमाई से खरीदी तो अलग बात है, लेकिन पुश्तैनी जमीन से ही कमाई करके और जमीन खरीदी तो वह भी पुश्तैनी ही मानी जाएगी.
पिता की खरीदी जमीन पर भी हक
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में एक प्रावधान यह भी है कि अगर पिता ने अपनी कमाई से जमीन खरीदी और उसे पुश्तैनी जमीन के साथ मिलाकर हिंदू अविभाज्य परिवार यानी एचयूएफ के तहत संपत्ति का वर्गीकरण कर दिया तो उनकी खरीदी जमीन भी पुश्तैनी हिस्सा बन जाएगी. मिताक्षरा कानून के तहत बंटवारे के समय इस जमीन को भी पुश्तैनी ही माना जाएगा.
संयुक्त कब्जा और उसका इस्तेमाल
अगर परिवार संयुक्त है यानी उसकी रसोई, बिजली बिल आदि एक ही नाम से आता है और तहसील में जमीन का उल्लेख पुत्रान दादा यानी पूर्वजों के अंश के रूप में दर्ज है तो यह संपत्ति भी पुश्तैनी मानी जाएगी. यह सबूत कोर्ट में भी पर्याप्त माना जाएगा. फिर भी अगर कोई भाई यह दावा करे कि संबंधित जमीन पिता की खुद की खरीदी है तो यह सवाल जरूर पूछें कि इसके लिए पैसा कहां से आया. इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 6 के तहत यह साबित करने की जिम्मेदारी जमीन खरीदने वाले की है कि पैसा कहां से आया.