जब भी त्योहारों का जिक्र होता है, बचपन की खूबसूरत यादें ताजा हो जाती हैं. बात जब बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश की दिवाली की हो, तो इसकी रौनक ही बिल्कुल अलग होती है. यहां पटाखों और दीयों के साथ-साथ कुछ ऐसी प्यारी लोक परंपराएं जुड़ी हैं, जो दिल को छू लेती हैं. क्या आप जानते हैं कि बिहार में दिवाली के दिन कुंवारी लड़कियां मिट्टी के छोटे-छोटे ‘घरौंदे’ क्यों बनाती हैं? और इसके ठीक अगले दिन भाई को खोई-बताशा क्यों खिलाया जाता है? आइए, जानते हैं इन अनोखी और मजेदार परंपराओं के पीछे की असली कहानी!
दिवाली पर क्यों बनाए जाते हैं मिट्टी के घरौंदे?
बिहार के कई इलाकों में दिवाली के मौके पर घर की लड़कियां मिलकर मिट्टी के घरौंदे बनाती हैं. घरौंदा यानी घर का एक छोटा-सा रूप. इसे मिट्टी, गत्ते या दूसरी उपलब्ध चीजों से बनाया जाता है. पारंपरिक रूप से घरौंदे को दो मंजिला बनाया जाता है. फिर इसे रंगों, फूलों, कागज, छोटी-छोटी सजावटी चीजों और दीयों से सजाया जाता है. घरौंदे को देखकर ऐसा लगता है, जैसे किसी ने अपने सपनों का छोटा-सा आशियाना तैयार कर लिया हो.
इस घरौंदों को गीली चिकनी मिट्टी, ईंट, चूना, कार्डबोड आदि से तैयार किया जाता है. (pinterest)
इस परंपरा को भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की मान्यता से भी जोड़कर देखा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 14 साल का वनवास पूरा करने के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौटे थे, तब लोगों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था. इस खुशी में पूरी अयोध्या को सजाया गया था. माना जाता है कि घरौंदा बनाना भी नए घर, नई शुरुआत और सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक है.
लड़कियों के भावी जीवन से भी जुड़ी है परंपरा-
घरौंदा बनाने की परंपरा का एक सामाजिक और पारिवारिक पहलू भी है. पुराने समय में इसे लड़कियों के भावी गृहस्थ जीवन से जोड़कर देखा जाता था. बच्चियां जब मिट्टी से घर बनाती थीं, तो घर की बड़ी महिलाएं उन्हें घर को सहेजने, अनाज रखने, रसोई और परिवार की देखभाल जैसी बातें खेल-खेल में समझाती थीं.
हालांकि, आज इस परंपरा को सिर्फ गृहस्थ जीवन की सीख तक सीमित करके देखना जरूरी नहीं है. यह बच्चियों की रचनात्मकता, मिल-जुलकर काम करने और त्योहार में अपनी भागीदारी निभाने का भी खूबसूरत तरीका है. घरौंदा बनाते समय कौन-सा रंग इस्तेमाल करना है, कहां दीया रखना है और किस तरह घर को सजाना है, इन छोटी-छोटी बातों में बच्चों की पूरी कल्पनाशक्ति नजर आती है.
कुलहिया-चुकिया के बिना अधूरा है घरौंदा
घरौंदा तैयार हो जाए और उसमें छोटे-छोटे बर्तन न हों, ऐसा कैसे हो सकता है! इसके लिए बाजार से बेहद छोटे बर्तन खरीदे जाते हैं या मिट्टी से ही बनाया जाता है. इन्हें स्थानीय बोलचाल में कुलहिया-चुकिया या चरघरवा कहा जाता है. इन बर्तनों को भी घरौंदे की तरह सजाया जाता है. फिर इनमें खोई यानी धान से तैयार लावा, बताशे, मखाने और चीनी से बने रंग-बिरंगे खिलौने रखे जाते हैं.
इन छोटे बर्तनों को अन्न और मिठाइयों से भरने के पीछे भी एक प्यारी भावना है. यह घर में कभी अन्न की कमी न होने और रसोई हमेशा खुशियों से भरी रहने की कामना का प्रतीक माना जाता है. जिस तरह घरौंदा एक सुंदर घर का प्रतीक है, उसी तरह कुलहिया-चुकिया में रखा अनाज सुख-समृद्धि की उम्मीद को दर्शाता है.
अगले दिन भाई को क्यों खिलाते हैं खोई-बताशा?
अब आते हैं इस परंपरा के सबसे दिलचस्प हिस्से पर. दिवाली की रात पूजा और घरौंदे की सजावट के बाद अगले दिन बहनें अपने भाइयों को खोई-बताशा खिलाती हैं. इसके लिए कुलहिया-चुकिया में रखे प्रसाद को निकाला जाता है और बहनें अपने हाथों से भाइयों को खिलाती हैं.
इसके पीछे भाई-बहन के प्यार और उनकी लंबी उम्र की कामना जुड़ी है. बहनें चाहती हैं कि उनके भाई का जीवन खुशहाल रहे, वे स्वस्थ रहें और जीवन में तरक्की करें. भाई भी बहनों को शगुन या उपहार देकर अपना प्यार जताते हैं. इस तरह मिट्टी के छोटे-से घरौंदे से शुरू हुआ त्योहार भाई-बहन के रिश्ते की मिठास तक पहुंच जाता है.
यह रस्म अलग-अलग परिवारों और इलाकों में थोड़े बदलाव के साथ निभाई जा सकती है. कहीं इसे गोवर्धन पूजा के दिन किया जाता है, तो कहीं भाई दूज के आसपास. लेकिन इसके पीछे की भावना एक ही है- अपनों की खुशहाली और रिश्तों में प्यार बना रहे.
आज बाजार में सजावट के लिए कितनी ही चीजें मिल जाती हैं. बच्चे मोबाइल और ऑनलाइन गेम में भी व्यस्त रहते हैं. ऐसे में घरौंदा बनाने जैसी परंपराएं उन्हें मिट्टी, रंगों और परिवार के साथ जुड़ने का मौका देती हैं. इसमें महंगे सामान की जरूरत नहीं होती. थोड़ी-सी मिट्टी, कुछ रंग, छोटे बर्तन और ढेर सारी कल्पना से बच्चे अपना छोटा-सा संसार बना सकते हैं.
बिहार की इस परंपरा की खूबसूरती भी यही है. घरौंदा भले ही मिट्टी का होता है, लेकिन उसमें परिवार की उम्मीदें, त्योहार की रौनक और बचपन की अनगिनत यादें बसती हैं. और अगले दिन भाई को खिलाया जाने वाला खोई-बताशा याद दिलाता है कि त्योहारों का असली स्वाद पकवानों में ही नहीं, बल्कि अपनों के साथ निभाई जाने वाली छोटी-छोटी रस्मों में भी छिपा होता है.