न्यूजीलैंड के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होना था. न्यूजीलैंड हमारे डेयरी और एग्रीकल्चर सेक्टर पर नजर गड़ाए हुए था. वह चाहता था कि किसी भी तरह भारत के मार्केट में उतरने का रास्ता मिल लाए. उन्होंने बातचीत के दौरान सरकार के सामने कई बार अपनी शर्तें रखीं. लेकिन भारत किसानों पर अड़ गया. साफ कर दिया कि किसी भी कीमत पर डेयरी और एग्रीकल्चर सेक्टर नहीं खोलेंगे. खूब जद्दोजहद चली और आखिरकार एक वक्त ऐसा भी आया जब न्यूजीलैंड ने अपने कदम पीछे खींच लिए. न्यूजीलैंड के वार्ताकारों को कहना पड़ा-भारत तो नहीं मान रहा, अब हमें रणनीति बदलनी पड़ेगी… इसके बाद डील सामने आई तो डेयरी उत्पादों दूध, क्रीम, दही, चीज, मक्खन को पूरी तरह एक्स्क्लूजन लिस्ट में डाल दिया गया. यह बातें न्यूजीलैंड की मीडिया खुद लिख रही है.
NZ Herald ने लिखा, न्यूजीलैंड की डेयरी इंडस्ट्री बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट बेस्ड है. जबकि भारत में दूध उत्पादन का बड़ा हिस्सा छोटे किसानों और छोटे पशुपालकों से आता है. भारत का डेयरी सेक्टर लंबे समय से बेहद संवेदनशील रहा है और यही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट में सबसे बड़ा अड़ंगा था. अधिकारी बात करते रहे, लेकिन भारत इस सेक्टर को खोलने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था.
मिल्क पाउडर था निशाना
आखिर क्यों अड़ा भारत
न्यूजीलैंड दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी निर्यातक देशों में से एक है. वहां का दूध, चीज, मक्खन और अन्य डेयरी उत्पाद बहुत सस्ते हैं. अगर भारत ने इन उत्पादों को बाजार खोल दिया होता तो देश के करीब आठ करोड़ डेयरी किसानों पर भारी असर पड़ता. कीमतें गिरतीं, दूध उत्पादकों की आय घटती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती. लेकिन भारत ने शुरुआत से ही साफ रुख अपनाया कि डेयरी सेक्टर को छुआ भी नहीं जाएगा. पीयूष गोयल ने कई बार दोहराया कि भारत ने अब तक किसी भी एफटीए में डेयरी पर कोई रियायत नहीं दी है… न यूरोपियन यूनियन के साथ, न ब्रिटेन के साथ, न ऑस्ट्रेलिया के साथ और न ही न्यूजीलैंड के साथ.
प्याज-चना, मटर के लिए भी नहीं खोला
सिर्फ डेयरी ही नहीं. प्याज, चना, मटर, मक्का और बादाम जैसे कृषि उत्पादों को भी बाहर रखा गया. ये सभी भारतीय किसानों की इनकम से सीधे जुड़े हैं. प्याज की कीमतों में उतार-चढ़ाव हमेशा राजनीतिक मुद्दा बनता रहा है. मटर और चना दाल की उपलब्धता और कीमत को प्रभावित करते हैं. अगर इन पर शुल्क हटा दिया जाता तो विदेशी सस्ते उत्पाद बाजार में आ जाते और स्थानीय किसानों को नुकसान होता. भारत ने इन्हें भी सुरक्षित रखा. भारत ने कुल टैरिफ लाइनों में से करीब 30 प्रतिशत को एक्स्क्लूजन लिस्ट में रखा है.
किन प्रोडक्ट्स के लिए खोला रास्ता और क्यों
सिर्फ सेब, कीवीफ्रूट और मनुका हनी जैसे आइटम टैरिफ रेट कोटा (टीआरक्यू) के जरिए आएंगे. यानी तय मात्रा तक ही कम शुल्क पर आयात होगा, उससे ज्यादा पर ऊंचा शुल्क लगेगा. साथ में मिनिमम इंपोर्ट प्राइस भी तय की गई है ताकि बहुत सस्ते उत्पाद न आ सकें. यही वजह है कि इस डील की न्यूजीलैंड में कुछ आलोचना भी है. कुछ राजनीतिक दलों ने कहा कि डेयरी को बाहर रखने से हमारे किसानों का नुकसान हुआ.