इजरायल में इस समय चुनावी सरगर्मी है. नई सरकार को लेकर माथापच्ची जारी है. एक तरफ बेंजामिन नेतन्याहू हैं तो दूसरी तरफ पूर्व मिलिट्री चीफ और याशर पार्टी के लीडर गादी आइजेनकोट हैं, जिन्हें विपक्षी दलों ने समर्थन दिया है. चुनाव में 120 सदस्यों वाले नेसेट में किसी को भी बहुमत हासिल नहीं हुआ है. जरूरी आंकड़े तक पहुंचने के लिए थर्ड फ्रंट यानी अरब पार्टी का रोल अहम है. ये जिसके साथ चले जाएं, उसकी सरकार बन जाएगी. लेकिन दोनों ही खेमे इनसे दूरी बनाकर चल रहे हैं. सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों? इसकी वजह 31 साल पहले हुई एक हत्या है. इजरायल के उस समय के प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन की ताबड़तोड़ गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. मारने वाला भी इजरायली यहूदी शख्स ही था. खास बात है कि राबिन की हत्या आज के दिन ही हुई थी. वो हत्या ही वजह है कि इजरायली नेता कोई फैसला लेने से पहले कई बार सोचने को मजबूर हैं.
यित्जाक राबिन आजतक इजरायल के एकमात्र ऐसे नेता हुए हैं, जिनकी हत्या हुई है. तेल अवीव शहर के मेन इलाके में जहां उन्हें गोली मारी गई, वहां राबिन स्क्वैयर बना हुआ है. राबिन को 4 नवंबर 1995 के दिन गोली क्यों मारी गई? इसको समझने से पहले एक बार इजरायल के मौजूदा सियासी घमासान पर नजर डालते हैं. इजरायल के चुनाव में नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि आइजेनकोट की अगुवाई वाले विपक्षी गठबंधन के पास 48 सीटें हैं.
अब इस स्थिति में दोनों ही पक्ष बहुमत के नंबर से दूर हैं. संसद में बहुमत बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है. इस स्थिति में अरब दलों के पास मौजूद 19 सीटें सरकार बनाने में अहम रोल निभा सकती हैं. इस बैठक में गादी आइजेनकोट के साथ ही आतिद पार्टी के लीडर याइर लैपिड, बेयतेनु पार्टी के लीडर एविग्दोर लिबरमैन, डेमोक्रेट्स पार्टी के लीडर याइर गोलान, बेयाचद पार्टी के नफ्ताली बेनेट भी मौजूद रहे.
अरब पार्टी की बात करें तो ये अरबी मूल के लोगों के हित की बात करने वाली इस्लामिक मूवमेंट की पार्टी है. अब इजरायल का फंडा ही अलग है. फिलस्तीन के साथ विवाद और अस्तित्व की लड़ाई को लेकर उसकी पड़ोसी मुस्लिम देशों के साथ ही विरोध है. खुद बेंजामिन नेतन्याहू ही धुर दक्षिणपंथी विचार के हैं.
अब वापस लौटते हैं राबिन वाले केस पर. इजरायल के इतिहास में 4 नवंबर 1995 की तारीख एक ऐसा जख्म है, जो आज भी पूरी तरह नहीं भरा है. इसी दिन इजरायल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. हैरानी की बात यह थी कि उन्हें मारने वाला कोई फिलस्तीनी, अरब नागरिक या विदेशी दुश्मन नहीं, बल्कि खुद इजरायल का एक यहूदी नागरिक था.
हमलावर को राबिन की शांति नीति से इतनी नफरत थी कि उसने अपने ही देश के प्रधानमंत्री की जान ले ली. राबिन की हत्या केवल एक प्रधानमंत्री की हत्या नहीं थी, बल्कि इजरायल के भीतर दो विचारधाराओं के बीच चल रहे संघर्ष का खतरनाक नतीजा भी थी. एक पक्ष फिलस्तीनियों के साथ बातचीत और समझौते के जरिए शांति चाहता था, जबकि दूसरा पक्ष इसे इजरायल की सुरक्षा, यहूदी पहचान और ऐतिहासिक जमीन से समझौता मानता था.
यित्जाक राबिन और यासिर आराफात का हाथ मिलाते बिल क्लिंटन
यित्ज़ाक राबिन इजरायल के सैन्य और सियासी इतिहास की सबसे अहम शख्सियत में से एक थे. वह इजरायल के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने सेना में टॉप पोस्ट पर पहुंचने के बाद देश की राजनीति में भी अहम भूमिका निभाई. राबिन का सबसे ऐतिहासिक फैसला फिलस्तीनी मुक्ति संगठन (PLO) के साथ बातचीत करना था. उस समय PLO की अगुवाई यासिर अराफात कर रहे थे. इजरायल लंबे समय तक PLO को आतंकवादी संगठन मानता रहा था.
साल 1993 में इजरायल और फिलस्तीनी नेतृत्व के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे ओस्लो एकॉर्ड कहा जाता है. 13 सितंबर 1993 को अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मौजूदगी में इजरायल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन और PLO के नेता यासिर अराफात ने व्हाइट हाउस में समझौते की घोषणा से जुड़े दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते की सबसे बड़ी बात यह थी कि पहली बार इजरायल और PLO ने एक-दूसरे को औपचारिक रूप से मान्यता दी.
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