रिपब्लिकन हारे नहीं, बेइज्जत हुए भी ट्रंप, किसी राष्ट्रपति के साथ नहीं हुआ ऐसा
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US Mid Term Elections: अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समर्थित रिपब्लिकन उम्मीदवारों की हार से उनकी लोकप्रियता और राजनीतिक प्रभाव पर सवाल उठने लगे हैं. यह एक तरह से सीधे राष्ट्रपति की बेइज्जती है. इस चुनाव में ट्रंप ने काफी जोरशोर से प्रचार किया था. उन्होंने अपनी ही पार्टी में अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को तरजीह दी थी लेकिन अब उनकी हार पार्टी के भीतर उनकी पकड़ और प्रतिष्ठा को एक बड़ा झटका है.
मिड टर्म चुनाव में ट्रंप के पसंदीदा उम्मीदवारों की भी बुरी हार हुई है.
US Mid Term Elections: अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन को बड़ा झटका लगा है. डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में अच्छी बढ़त हासिल की हैं. लेकिन इस चुनाव में कहानी सिर्फ कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण की नहीं है. नतीजों ने डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक प्रभाव पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. दरअसल, ट्रंप ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था. उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवारों के पक्ष में जमकर प्रचार किया. कई सीटों पर अपनी पसंद के उम्मीदवारों को समर्थन दिया. लेकिन अब उन्हीं उम्मीदवारों को मतदाताओं के बीच हार का सामना करना पड़ा है. यह एक तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति की बेइज्जती लगती है. आमतौर पर ऐसा किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ नहीं होता. राष्ट्रपति बनने के मात्र दो साल के भीतर ट्रंप की लोकप्रियता इतनी गिर जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था. टेक्सास, ओहायो, कंसास और साउथ कैरोलिना जैसे राज्यों में ट्रंप समर्थित उम्मीदवारों की हार ने पार्टी के भीतर उनकी पकड़ को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
ट्रंप की पसंद को भी मतदाताओं ने नकारा
इस चुनाव में ट्रंप के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात यह रही कि उनकी पसंद के कई उम्मीदवार अपनी सीट नहीं बचा सके. सीएनएन न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक टेक्सास में ट्रंप के समर्थन से चुनाव लड़ रहे रिपब्लिकन केन पैक्सटन को डेमोक्रेट जेम्स तलारिको ने हरा दिया. ओहायो में रिपब्लिकन सीनेटर जॉन हस्टेड को डेमोक्रेट शेरॉड ब्राउन ने शिकस्त दी. नॉर्थ कैरोलिना में ट्रंप समर्थित माइकल व्हाटली को पूर्व डेमोक्रेटिक गवर्नर रॉय कूपर ने हराया.
कंसास में भी ट्रंप के समर्थन वाले सीनेटर रोजर मार्शल को डेमोक्रेट एडम हैमिल्टन के हाथों हार मिली. लेकिन सबसे चौंकाने वाला नतीजा साउथ कैरोलिना से आया. यह रिपब्लिकन पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता है. यहां डेमोक्रेट एनी एंड्रयूज ने रिपब्लिकन डार्लिन ग्राहम को हरा दिया. इस राज्य में 1998 के बाद किसी डेमोक्रेट ने सीनेट का चुनाव नहीं जीता था.
इन नतीजों ने दिखाया कि डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन के बावजूद कई उम्मीदवारों को जीत नहीं मिली. जिन सीटों को रिपब्लिकन पार्टी सुरक्षित मान रही थी, वहां भी डेमोक्रेट्स ने सेंध लगा दी. इससे ट्रंप की उम्मीदवार चुनने और पार्टी के भीतर अपनी पसंद मनवाने की क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं.
ट्रंप ने चुनाव को प्रतिष्ठा से क्यों जोड़ा?
डोनाल्ड ट्रंप ने इस बार मिडटर्म चुनाव को सामान्य मध्यावधि चुनाव नहीं रहने दिया. उन्होंने लगातार अपने समर्थकों से अपील की कि वे इसे ऐसे देखें, जैसे राष्ट्रपति पद के लिए भी चुनाव हो रहा हो. उन्होंने देशभर में प्रचार किया. कई राज्यों में रैलियां कीं और रिपब्लिकन उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की. ट्रंप जानते थे कि मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति की लोकप्रियता का असर उनकी पार्टी के उम्मीदवारों पर पड़ता है. इस बार महंगाई, टैरिफ, ईरान युद्ध और घर खर्च की बढ़ती लागत को लेकर मतदाताओं में नाराजगी थी. डेमोक्रेट्स ने इन्हीं मुद्दों को चुनाव प्रचार का बड़ा आधार बनाया.
नतीजे आने के दौरान ट्रंप ने कुछ समय तक सोशल मीडिया पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. बाद में उन्होंने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि वह खुद चुनाव मैदान में नहीं थे. अगर वह भी मतपत्र पर होते तो रिपब्लिकन पार्टी भारी अंतर से जीतती. इस बयान को चुनावी हार की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश के तौर पर देखा गया.
रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी उठ सकते हैं सवाल
सीएनएन के मुताबिक चुनाव के बाद ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही पार्टी में राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की होगी. अभी तक रिपब्लिकन पार्टी में उनकी पसंद और फैसलों को काफी हद तक स्वीकार किया जाता रहा है. कई नेता खुलकर उनका विरोध करने से बचते रहे हैं. लेकिन चुनाव में उनकी पसंद के उम्मीदवारों की हार के बाद पार्टी के भीतर विरोध की आवाजें तेज हो सकती हैं.
सीनेट में बहुमत गंवाने का मतलब भी ट्रंप के लिए सिर्फ संख्या कम होना नहीं है. अब डेमोक्रेट्स को संसदीय समितियों पर नियंत्रण, प्रशासनिक फैसलों की जांच और अधिकारियों को तलब करने की ज्यादा ताकत मिलेगी. राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल और न्यायिक नियुक्तियों पर भी उनकी भूमिका बढ़ेगी. इससे ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है.