जब भी सेहत की बात आती है, अक्सर अच्छी डाइट और एक्टिव लाइफसटाइल जैसी चीजों का जिक्र आता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारी हेल्थ का जानवरों और पर्यावरण से भी गहरा कनेक्शन है? हमारी एक्सरसाइज और हमारे खाने-पीने के आदतों के अलावा हमारे आसपास का पर्यावरण, जानवरों की सेहत और प्राकृतिक संसाधन भी हमारी जिंदगी को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं. इसी संबंध को समझाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ‘वन हेल्थ’ यानी ‘एक स्वास्थ्य’ की अवधारणा पर जोर दे रहा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘वन हेल्थ डे’ के मौके पर सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात लोगों के सामने रखी. वन हेल्थ एक ऐसा एकीकृत नजरिया है, जो इंसानों, जानवरों और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जोड़कर देखता है. इसका मकसद इन तीनों के बीच संतुलन बनाना और उसे लंबे समय तक बनाए रखना है.
इंसान, जानवर और प्रकृति का स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़ा
आमतौर पर स्वास्थ्य की बात आते ही हमारा ध्यान इंसानों की बीमारियों, इलाज और खानपान पर जाता है. लेकिन हकीकत यह है कि इंसान, जानवर और प्रकृति एक-दूसरे पर निर्भर हैं. इनमें से किसी एक की सेहत बिगड़ने पर बाकी दोनों भी प्रभावित हो सकते हैं. जैसे अगर पीने का पानी दूषित हो जाए तो इसका असर सिर्फ इंसानों पर नहीं, बल्कि उस पानी पर निर्भर जानवरों पर भी पड़ता है. इसी तरह हवा में बढ़ता प्रदूषण इंसानों और पशु-पक्षियों, दोनों के लिए सांस संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है.
जंगलों की कटाई और प्राकृतिक आवासों के खत्म होने से जंगली जानवरों का जीवन प्रभावित होता है. जब जानवर भोजन और रहने की जगह की तलाश में इंसानी बस्तियों के करीब आने लगते हैं, तो इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव बढ़ सकता है. इससे कुछ संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा भी बढ़ सकता है.
नई बीमारियों से निपटने में भी मददगार है वन हेल्थ
वन हेल्थ का उद्देश्य केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि दुनिया के सामने मौजूद कई बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटना भी है. आज नई संक्रामक बीमारियों का उभरना, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) और खाद्य सुरक्षा जैसी समस्याएं चिंता का विषय हैं. युनाइटेड नेशन्स भी लगातार इन चिंताओं के प्रति ध्यान खींच रहा है. एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का मतलब है कि बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीव दवाओं के असर के प्रति प्रतिरोधी होते जा रहे हैं. ऐसे में संक्रमण का इलाज करना मुश्किल हो सकता है. इन चुनौतियों से निपटने के लिए केवल डॉक्टरों या स्वास्थ्य विभागों का प्रयास काफी नहीं है. इसमें पशु चिकित्सकों, पर्यावरण विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और सरकारी विभागों को भी मिलकर काम करना होगा.
समय पर पहचान और बचाव से कम हो सकता है बीमारी का खतरा
वन हेल्थ का एक अहम पहलू बीमारियों की समय रहते पहचान करना है. उदाहरण के लिए, अगर जानवरों में किसी संक्रामक बीमारी के लक्षणों का शुरुआती दौर में ही पता चल जाए तो उसके इंसानों तक पहुंचने के खतरे को कम करने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं. इसी तरह खाने-पीने की चीजों की साफ-सफाई और सुरक्षा पर ध्यान देकर कई बीमारियों से बचाव किया जा सकता है. साफ पानी, स्वच्छ वातावरण और स्वस्थ पशु-पक्षी भी बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं.
स्थानीय स्तर से लेकर पूरी दुनिया तक जरूरी है सहयोग
WHO के मुताबिक, वन हेल्थ की अवधारणा को स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर तक अपनाया जा सकता है. इसके लिए स्वास्थ्य, पशुपालन, कृषि और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है. इस सोच का संदेश साफ है कि स्वस्थ समाज बनाने के लिए केवल अस्पतालों और दवाओं पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. इंसानों की सेहत को बेहतर बनाए रखने के लिए जानवरों और प्रकृति का स्वस्थ रहना भी उतना ही जरूरी है.
(इनपुट एजेंसी से भी)