Opinion: राहुल गांधी आपने रामलीला मैदान में तो विपक्षी एकता दिखा दी, पर यह कितनी टिकाऊ?

Opinion: राहुल गांधी आपने रामलीला मैदान में तो विपक्षी एकता दिखा दी, पर यह कितनी टिकाऊ?


राहुल गांधी ने व्यापारियों के तमाम आग्रह-अनुनय ठुकरा कर नवंबर के पहले ही दिन दिल्ली में अपनी ‘दमदार’ दस्तक दिखा दी. SIR और ECI के खिलाफ राहुल की रैली में भी पहले 2024 जैसा विपक्षी एकता का नजारा दिखा. करीब 3 दर्जन विपक्षी दलों की साझा रैली में भीड़ कितनी जुटी, इसके लिए किसी पचड़े में पड़ने की आवश्यकता नहीं. भीड़ की संख्या का अनुमान लगाने के लिए सिर्फ यही जानना जरूरी है कि अधिकृत तौर पर आयोजनकर्ता कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की ओर से रामलीला मैदान में 10 लाख लोगों को जुटाने का लक्ष्य बताया गया था.

हालांकि रैली में आए लोगों के जरिए कांग्रेस ने 3 लाख इडली के पैकेट ही तैयार कराए थे. भीड़ कितनी जुटी, इसके बारे में कोई ब्योरा आयोजक पार्टियों की ओर से नहीं आया. अलबत्ता ‘भारी भीड़’ दावा उनके नेताओं की ओर से जरूर किया गया है. यह भी कि कांग्रेस नेताओं और विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के कर्ता-धर्ताओं की ओर से जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं, उससे उनकी संतुष्टि साफ झलकती है. वैसे भाजपा या एनडीए वाले रैली को फ्लाप बताने में पीछे नहीं हैं. कोई 10 हजार के आस-पास भीड़ की संख्या बता रहा तो कोई मैदान का 40 फीसद हिस्सा खाली कह रहा. गनीमत है कि दोनों अपने-अपने दावों पर इतराने में कोई कमी नहीं कर रहे.

रैली में विपक्षी एकता की साफ झलक मिली

इसमें किसी को कोई शक नहीं कि 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली इंडिया ब्लाक की एकता का बड़ा प्रदर्शन साबित हुई. राहुल गांधी के नेतृत्व में मिंटो रोड से खुली गाड़ियों में मार्च निकला. ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, सुप्रिया सुले समेत 20-21 दलों के नेता एक मंच पर नजर आए. स्टेज पर सभी नेता एक साथ खड़े होकर हाथ हिलाते दिखे. विपक्षी एकता से आह्लादित राहुल गांधी ने स्पष्ट कहा कि यह किसी एक पार्टी की आवाज नहीं, बल्कि युवाओं, किसानों और मजदूरों की आवाज है. एकता इससे भी उजागर हुई कि नेतृत्व पर किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया. राहुल को केंद्र में रखकर गठबंधन ने एक मकसद- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR प्रक्रिया के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया. यह दृश्य विपक्षी एकता की याद दिलाता है, जो पिछले कुछ समय से कमजोर पड़ती दिख रही थी.

नुकसान के दोनों के अपने-अपने आकलन

रैली के बाद सत्ताधारी और प्रतिपक्षी नेताओं ने व्यापारियों की चिंता पर अपने-अपने आकलन पेश किए. कांग्रेस और इंडिया गठबंधन ने इसे ऐतिहासिक सफलता करार दिया और कहा कि भीड़ बढ़ने के कारण लोगों ने उस दिन जबर्दस्त खरीदारी की. राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा कि रिकार्ड संख्या में लोग आए, इससे लोकतंत्र की जीत सुनिश्चित होती है. सोशल मीडिया पर नेताओं ने भीड़ भरी तस्वीरें शेयर कीं. वहीं भाजपा ने इसे फ्लाप शो बताया. सांसद संबित पात्र ने प्रेस कान्फ्रेंस में खाली कुर्सियों के वीडियो दिखाते हुए कहा कि 28,000 कुर्सियों में 5,000 से 7,000 खाली थीं और मैदान का बड़ा हिस्सा खाली रहा.

भाजपा का आरोप है कि विपक्ष विदेशी ताकतों के इशारे पर अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहा है. दोनों पक्ष अपने-अपने आंकड़ों और नैरेटिव पर अड़े हुए हैं. भाजपा ने व्यापारिक संगठनों के हवाले से कहा कि रैली के कारण त्योहारी सीजन में कम से कम 11 हजार करोड़ रुपये के कारोबार का नुकसान हुआ है. नियमित खरीदारी के लिए आने वाले 3-4 लाख लोग पहुंच ही नहीं पाए. राहुल गांधी का आरोप है कि उन्होंने देश भर से लोगों को इस अपील के साथ बुलाया था कि वे दिल्ली में खरीदारी कर सकें. भाजपा ने जान-बूझकर दुकानें बंद करा दीं. जयराम रमेश का तो अलग ही दावा है. उनका कहना है कि महारैली से वास्तव में दिल्ली के स्थानीय व्यवसायियों और रेहड़ी-पटरी वालों की बिक्री में बढ़ोतरी हुई. देश भर से लाखों लोग दिल्ली आए तो खरीदारी भी की ही होगी. इससे हर छोटे-बड़े व्यापारी को सीधा या अप्रत्यक्ष फायदा हुआ है.

भीड़ कम या अधिक पर अब छिड़ी है बहस

कांग्रेस ने पहले 10 लाख लोगों का लक्ष्य बताया था, लेकिन रैली का आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया. पुलिस अनुमानों के मुताबिक हजारों लोग जुटे. कुछ रिपोर्ट्स में 50,000 के आसपास आंकड़ा दिया गया. कई राज्यों से कार्यकर्ता ट्रेन और बसों से पहुंचे थे. तेलंगाना और केरल से बड़े दल आए. मैदान के अंदर और बाहर भीड़ दिखी, लेकिन कुर्सियों के खाली होने का मुद्दा भाजपा ने जोर-शोर से उठाया. सोशल मीडिया पर दोनों तरफ के वीडियो वायरल हो रहे हैं. एक तरफ भरी भीड़ की तस्वीरें तो दूसरी तरफ खाली जगहें दिखाई जा रही हैं. बहस जारी है कि रैली कितनी सफल रही या फ्लाप हुई. वैसे भी रामलीला मैदान में 45-50 हजार लोगों के बैठने की ही क्षमता है. इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि 10 लाख की भीड़ जुटाने के कांग्रेस के दावे में कितना दम है.

विपक्ष को मिल गया ’27-29′ का चुनावी मुद्दा

रैली का हासिल यह रहा कि विपक्ष को अगले साल 2027 में होने वाले 5 राज्यों के चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए मुद्दा मिल गया है. SIR और ‘वोट चोरी’ के मुद्दे ने 2027 के विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए बड़ा चुनावी हथियार विपक्ष को दे दिया है. राहुल गांधी ने कहा भी कि 2024 का चुनाव अवैध था, क्योंकि 13 करोड़ से अधिक नाम काटे गए. उन्होंने ज्ञानेश कुमार को जेल जाने की चेतावनी दी और मोदी-शाह पर कानूनी कार्रवाई की बात कही. यह मुद्दा अब विपक्ष के लिए दीर्घकालिक अभियान बन गया है. गठबंधन इसे लोकतंत्र बचाने की लड़ाई बता रहा है. आने वाले चुनावों में यह नैरेटिव कितना असरदार साबित होता है, यह वक्त पर पता चलेगा.

SIR का विरोध कर बिहार-बंगाल हारा विपक्ष

दिलचस्प बात यह है कि SIR का सबसे ज्यादा विरोध बिहार और पश्चिम बंगाल में हुआ था, जहां प्रक्रिया पहले लागू हुई. उन राज्यों के चुनाव परिणामों में विपक्ष को अपेक्षित सफलता नहीं मिली. बिहार में एनडीए मजबूत रहा और बंगाल में भी भाजपा ने नए क्षेत्रों में बढ़त बनाई. रैली में इन राज्यों के नेताओं की मौजूदगी के बावजूद यह याद दिलाता है कि सड़क के प्रदर्शन और चुनावी नतीजों में फर्क हो सकता है. विपक्ष अब राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग हो सकती है. बिहार में 202 सीटों के साथ एनडीए की सरकार है तो बंगाल में भाजपा ने 3 बार से लगातार सत्ता में रही तृणमूल को दहाई अंकों में सिमटा दिया. पार्टी में टूट हुई, वह अलग से ममता बनर्जी का सिरदर्द साबित हुआ.



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