पश्चिम एशिया की उथल-पुथल के बीच ईरान ने एक ऐसा कड़ा कदम उठाया है, जिसने वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक हड़कंप मचा दिया है. ईरान की सरकार ने ऐलान कर दिया है कि उसके कब्जे में मौजूद अमेरिका और इजरायल की करोड़ों-अरबों डॉलर की बेशकीमती ‘अमानत’ को अब खुले बाजार में नीलाम करके बेच खाया जाएगा. जिस अमानत पर अमेरिका और इजरायल अपना हक जताते रहे हैं, उस पर अब तेहरान का कब्जा है और वो इसकी बिक्री से मिलने वाले एक-एक पैसे का इस्तेमाल एक खास ‘नेक काम’ में करने जा रहा है. ईरान इस इस दादागीरी वाले मूड में इसलिए नजर आ रहा है कियोंकि अमेरिकी प्रशासन के पास अब पलटवार करने के बहुत सीमित रास्ते बचे हैं.
ईरान के पास अमेरिका और इजरायल की कौन सी ‘अमानत’?
ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मीजान के मुताबिक ईरान के न्यायिक तंत्र से जुड़े टॉप अधिकारी और ‘सेंटर फॉर ज्यूडिशियरी अटॉर्नी’ के प्रमुख हसन अब्दोलियानपुर ने इस कड़े फैसले की पुष्टि की है.
उन्होंने कहा है कि जिस ‘अमानत’ को बेचने की तैयारी चल रही है, वो दरअसल फारस की खाड़ी और ओमान के समुद्री इलाकों से जब्त किए गए अमेरिकी और इजरायली जहाज और उन पर लदा अरबों रुपए का कीमती माल हैं.
हालांकि, ईरानी अधिकारी ने सुरक्षा और रणनीतिक कारणों का हवाला देते हुए ये खुलासा नहीं किया है कि उनके कब्जे में फिलहाल कुल कितने अमेरिकी या इजरायली जहाज और कितना सामान मौजूद है. लेकिन उनके ये बयान इस बात का सबूत है कि ईरान अब इन जब्त जहाजों को सिर्फ अपनी बंदरगाहों पर खड़ा रखकर वक्त बर्बाद नहीं करेगा, बल्कि कानूनी प्रक्रिया चलाकर इनकी खुली नीलामी करने जा रहा है.
नीलामी का पैसा और ईरान का ‘नेक काम’ वाला दांव
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात ये है कि ईरान इन जहाजों और माल की बिक्री से आने वाले भारी-भरकम पैसे का क्या करने वाला है. हसन अब्दोलियानपुर के मुताबिक, ये पैसा किसी सरकारी खजाने में सीधे जमा होने के बजाय एक बेहद सेंसेटिव और मानवीय काम में लगाया जाएगा.
पीड़ित परिवारों का सहारा: ईरान सरकार का कहना है कि नीलाम किए गए जहाजों और कार्गो से मिलने वाली पूरी रकम उन ईरानी परिवारों को सौंपी जाएगी, जिन्होंने अमेरिकी सैन्य हमलों या सैन्य कार्रवाइयों में अपने परिजनों को खोया है.
हर्जाने के रूप में पेश करने की कोशिश: तेहरान इस पूरी प्रक्रिया को एक कानूनी ‘मुआवजे’ के रूप में दुनिया के सामने रख रहा है. ईरान का तर्क है कि अमेरिका ने उस पर जो कठोर आर्थिक पाबंदियां लगाई हैं और फारस की खाड़ी में जो सैन्य कार्रवाई की है, उससे ईरान को भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा है. इसलिए जब्त संपत्तियों को बेचकर उस नुकसान की भरपाई की जा रही है.
फारस की खाड़ी में कब्जे का खेल और इजरायल पर निशाना
फारस की खाड़ी और होर्मुज का समुद्री रास्ता अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक इलाका बन चुका है. पिछले कुछ सालों के दौरान ईरान ने इस रास्ते से गुजरने वाले कई विदेशी तेल टैंकरों और कमर्शियल जहाजों को अपने कब्जे में लिया है.
ईरान का कहना है कि जब भी अमेरिका अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में ईरानी तेल टैंकरों को अवैध रूप से रोकता है या उन पर पाबंदी लगाता है, तो जवाब में ईरान भी अमेरिकी और उसके सहयोगी देशों के जहाजों को अपनी सीमा में घेर लेता है.
अक्सर इन जहाजों को जब्त करते वक्त ईरान ये कानूनी तर्क देता है कि जहाजों ने समुद्री सुरक्षा नियमों को तोड़ा है, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है या वो बिना परमीशन के ईरानी जलसीमा में घुसे थे. इसके साथ ही, इजरायल के साथ चल रहे युद्ध के बीच ईरान ने लाल सागर और फारस की खाड़ी में इजरायली कंपनियों से जुड़े जहाजों को खास तौर पर अपनी रडार पर रखा हुआ है.
अंतरराष्ट्रीय कानून, वाशिंगटन और तेल अवीव में खलबली
ईरान के इस नए पैंतरे ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के सामने कई कानूनी और कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. किसी दूसरे संप्रभु देश की संपत्ति और निजी जहाजों को इस तरह नीलाम कर देना अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के तहत सीधा विवाद खड़ा करता है.
- समुद्री डकैती का आरोप: अमेरिका और इजरायल ईरान के इस कदम को कतई कानूनी नहीं मानेंगे. वो इसे अंतरराष्ट्रीय पानी में ‘समुद्री डकैती’ और गैर-कानूनी जब्ती करार देकर वैश्विक मंचों पर ईरान को घेरने की कोशिश कर सकते हैं.
- सैन्य टकराव का बड़ा खतरा: अमेरिका पहले भी कई बार कह चुका है कि उसके या उसके सहयोगियों के जहाजों को रोकना गैर-कानूनी है. इस नीलामी के ऐलान के बाद अमेरिकी नौसेना फारस की खाड़ी में अपनी पेट्रोलिंग और युद्धपोतों की तैनाती बढ़ा सकती है, जिससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीधा सैन्य टकराव होने की आशंका बहुत बढ़ गई है.
- इजरायल की व्यापारिक चिंताएं: इजरायल के लिए अपने व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा हमेशा से प्राथमिकता रही है. ईरान द्वारा इजरायली कार्गो को बेचे जाने की खबर से इजरायली शिपिंग कंपनियों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं.
वैश्विक व्यापार और महंगाई पर क्या पड़ेगा असर?
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़ी इस ‘जब्ती और नीलामी’ की जंग का खामियाजा केवल इन्हीं देशों को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है.
- शिपिंग का किराया और बीमा महंगा: जब भी फारस की खाड़ी में जहाजों के जब्त होने या नीलाम होने की खबरें आती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां उस रास्ते से जाने से डरती हैं. जहाजों का इंश्योरेंस प्रीमियम अचानक बहुत बढ़ जाता है, जिससे दुनिया भर में सामान की ढुलाई महंगी हो जाती है.
- तेल की कीमतों में उछाल: दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी इलाके से होकर गुजरता है. अगर जहाजों की खरीद-बिक्री को लेकर तनाव बढ़ता है और रास्ते में रुकावट आती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम अचानक आसमान छू सकते हैं.
- सप्लाई चेन पर दबाव: जहाजों पर लदे अरबों रुपये के सामान की नीलामी होने से उन अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को भारी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ेगा, जिनका माल उन जहाजों में फंसा हुआ था.
ईरान का ये फैसला केवल आर्थिक फायदा उठाने की कोशिश नहीं है, बल्कि ये वाशिंगटन और तेल अवीव को दिया गया एक बहुत बड़ा राजनीतिक और कूटनीतिक मैसेज है. ईरान ये दिखाना चाहता है कि वो पश्चिमी देशों की पाबंदियों और सैन्य दबाव के आगे सरेंडर करने वाला नहीं है. हालांकि, अमेरिका और इजरायल की इस ‘अमानत’ को नीलाम करने का दांव मध्य पूर्व में पहले से उबल रहे तनाव को एक बेहद खतरनाक मोड़ पर ला सकता है.