US Mid Term Election 2026: सौ बात की एक बात ये कि सारी दुनिया की नज़र इस पर है कि क्या कोई अब्दुल अमेरिका की सेनेट में बैठेगा? कभी भविष्य में नहीं, अभी इस बार के चुनावों में. अमेरिका में मिड-टर्म चुनाव हो रहे हैं, ये तो ज़्यादातर लोग जानते ही हैं. और सब लोग ये देख रहे हैं कि ट्रंप की पार्टी का क्या हाल होता है इन चुनावों में. क्योंकि दुनिया को तो ये देखना है कि ट्रंप आगे ईरान युद्ध में क्या करते हैं. अगर उनकी पार्टी का बहुमत वहां की संसद में नहीं रहा तो उनके लिए कई फ़ैसले लेना मुश्किल हो जाएगा. लेकिन इस सब के बीच सबसे ज़्यादा नज़र बनी हुई है अब्दुल पर. कौन अब्दुल? ये अब्दुल वो हैं जो वहां चुनाव लड़ रहे हैं. ये कौन सा वाला चुनाव है ये समझने की ज़रूरत है क्योंकि अगर वो चुनाव जीत गए तो अमेरिका में इतिहास बन जाएगा. और ट्रंप को तो झटका लगेगा ही.
तो पहले तो ये क्लियर समझ लेते हैं कि अमेरिका में ट्रंप के चुनाव नहीं हो रहे हैं. वो तो राष्ट्रपति चुनाव होते हैं और वो होते हैं 4 साल में. अभी ट्रंप को दूसरी बार राष्ट्रपति बने 2 ही साल हुए हैं. तो राष्ट्रपति चुनाव तो आएंगे 2029 में. और उनमें भी ट्रंप नहीं लड़ पाएंगे क्योंकि वहां कोई व्यक्ति दो ही बार राष्ट्रपति बन सकता है. और ये ट्रंप का दूसरा कार्यकाल चल रहा है. ये वहां की संसद के चुनाव हो रहे हैं. वहां भी संसद को दो सदन हैं जैसे हमारे यहां लोकसभा और राज्यसभा हैं. लोकसभा की तरह वहां पर है है हाउस ऑफ रेप्रेजेंटेटिव्स, जिसे आम बोलचाल में हाउस कहते हैं. तो हाउस कोई बोले तो यूं समझ लो कि वहां कि लोकसभा की बात हो रही है. इसमें होते हैं 435 सदस्य और ये हर 2 साल में चुने जाते हैं. जी, यही फ़र्क यहां समझना ज़रूरी है. हमारे यहां तो लोकसभा के सांसद चुने जाते हैं 5 साल के लिए और जिस पार्टी के सांसद ज़्यादा होते हैं वो चुनती है अपना प्रधानमंत्री. वहां क्या है कि राष्ट्रपति का चुनाव सीधा जनता करती है. तो राष्ट्रपति के लिए अलग से वोटिंग होती है और संसद के लिए अलग. संसद में जिस पार्टी का बहुमत आ जाए ज़रूरी नहीं कि राष्ट्पति उसी पार्टी का हो. क्योंकि राष्ट्रपति तो अलग से चुना जाता है.
अमेरिका में किसका चुनाव, कैसे होता है?
राष्ट्रपति चुनते हैं 4 साल के लिए और हाउस के सांसद चुनते हैं 2 साल के लिए. यानी हाउस के लिए चुनाव हर 2 साल में आ जाते हैं. और जैसे हमारे यहां लोकसभा में होता है वैसे ही वहां भी हर राज्य को उसकी आबादी के हिसाब से सीटें मिलती हैं. इसलिए बड़े राज्यों के ज्यादा सांसद होते हैं हाउस में और छोटे राज्यों के कम सांसद होते हैं हाउस में. लेकिन जो उनकी संसद का दूसरा सदन है, यानी जो उनकी राज्यसभा है, उसका नाम है सीनेट या सेनेट. उसका सिस्टम वहां अलग है. हमारे यहां तो राज्यसभा के सांसद चुनने के लिए पब्लिक वोट नहीं डालती, लेकिन वहां सीनेट के सदस्य चुनने के लिए भी सीधा पब्लिक ही वोट करती है. औऱ राज्यसभा में छोटे-बड़े सारे राज्य बराबर होते हैं. हर राज्य के दो सीनेटर होते हैं. सिर्फ़ दो. तो 50 राज्यों के 100 सेनेटर होते हैं. इनका कार्यकाल 6 साल का होता है और हर दो साल में एक-तिहाई सीटें खाली होती हैं. यानी उनके चुनाव भी हर 2 साल में होते हैं लेकिन सिर्फ़ एक-तिहाई सीटों के.
अमेरिकी सीनेट के डेमोक्रेट उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद. (फोटो: एएफपी)
अमेरिकी मिड टर्म इलेक्शन का पूरा गणित
हाउस के हर 2 साल में सभी सीटों के चुनाव होते हैं और सेनेट के हर 2 साल में एक-तिहाई सीटों के चुनाव होते हैं. हाउस की अहमियत ये है कि हाउस से ही बजट पास होता है और सेनेट की अहमियत ये है कि मंत्री और जज वगैरह की नियक्ति में राष्ट्रपति को सेनेट की मंज़ूरी लेनी पड़ती है. बाक़ी तो सारी ताक़त राष्ट्रपति के पास है वहां पर. अभी स्थिति ये है कि दोनों जगहों पर ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है. सीनेट के जो 100 सदस्य हैं उनमें 53 रिपब्लिकन हैं और 45 डेमोक्रैट है और दो स्वतंत्र भी शामिल हैं जो डेमोक्रैटिक पार्टी के साथ ही बैठते हैं. यानी 53 ट्रंप के साथ हैं और 47 विपक्ष में हैं. हाउस में भी रिपब्लिकन पार्टी के पास बहुमत है, लेकिन बहुत ही मामूली सा बहुमत है. 435 में 218 सीटें उनके पास हैं. अब जो चुनाव हैं उनमें पूरा हाउस और सीनेट की 35 सीटों के लिए सांसद चुने जाएंगे. डेमोक्रैटिक पार्टी को, यानी ट्रंप की विरोधी पार्टी तो को सीनेट में बहुमत के लिए कम अज़ कम चार सीटें रिपब्लिकन पार्टी से छीननी होंगी. लेकिन पूरी दुनिया की नज़र लगी है एक ऐसे राज्य पर जिसमें अभी डेमोक्रैटिक पार्टी के सीनेटर ही हैं कि क्या वो सीट डेमोक्रैटिक पार्टी फिर से जीत सकती है या नहीं.
डोनाल्ड ट्रंप को मिड टर्म चुनाव में कहीं झटका न लग जाए (फोटो साभार रायटर्स)
कैसे अब्दुल बदल सकते हैं अमेरिका का इतिहास
क्यों नज़र हैं इस सीट पर? क्योंकि पहली बार सीनेट में जाने का दावेदार एक मुसलमान है. ये राज्य है मिशिगन. मिशिगन राज्य में अमेरिकी सीनेट की एक खाली सीट के लिए चुनाव हो रहा है. मौजूदा सीनेटर गैरी पीटर्स रिटायर हो रहे हैं. और उनकी पार्टी यानी डेमोक्रैटिक पार्टी की तरफ से जो लड़ रहे हैं उनका नाम है अब्दुल एल-सय्यद. नाम ही ऐसा है कि दुनिया में हेडलाइंस तो बननी ही थी. क्योंकि अभी फ़्रांस में दंगे हुए तो ट्रंप ने कह दिया था कि देखो क्या हाल हो गया है यूरोप का इस्लामी शरणार्थियों को शरण देने की वजह से. और यहां ख़ुद उनकी सीनेट में पहली बार एक दावेदार अब्दुल आ गए हैं. ट्रंप के गोरे वोट बैंक के लिए तो ये ऐसे है जैसे क़यामत ही आने वाली है अमेरिका में. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से माइक रॉजर्स उम्मीदवार हैं. और डेमेक्रैटिक पार्टी में उम्मीदवार बनने की रेस जब अब्दुल जीत गए तो टिकट की दौड़ में जो नेता पिछड़ गईं उन्होंने ख़ुद अपनी पार्टी के ख़िलाफ़ जा कर ट्रंप की पार्टी के उम्मीदवार का ही समर्थन कर दिया है.
अब्दुल की जीत से ट्रंप को लगेगा झटका
ये मिशिगन का सीनेट की एक सीट का चुनाव पूरी दुनिया में चर्चा में है क्योंकि अगर अब्दुल जीत जाते हैं तो वो अमेरिका के इतिहास के पहले मुस्लिम सीनेटर बन जाएंगे. साथ ही ये सीट इसलिए भी बहुत मायने रखती है कि इससे ये भी तय होगा कि सीनेट पर किस पार्टी का कंट्रोल होगा. अभी रिपब्लिकन पार्टी के पास सीनेट में बहुमत है और ट्रंप राष्ट्रपति हैं. डेमोक्रैटिक पार्टी इस सीट को फिर से अपने पास रखकर बहुमत लेने की कोशिश कर रही हैं. अब्दुल कोई दूसरे देश से आकर अमेरिका में नहीं बसे हैं. वो मिशिगन में ही पैदा हुए हैं, रोचेस्टर हिल्स में. उनके माता-पिता ज़रूर मिस्र से आए थे. वो ख़ुद डॉक्टर हैं और स्वास्थ्य विभाग के बड़े अधिकारी रह चुके हैं. उनका मुख्य मुद्दा है कि सबके लिए सरकारी स्वास्थ्य बीमा चाहते हैं, राजनीति में बड़े उद्योगपतियों के पैसे का रोल हटाना चाहते हैं और इज़राइल को अमेरिकी सैन्य सहायता बिना शर्त न देने की बात करते हैं.
मिशगन में मुस्लिम खूब बढ़े
मिशिगन ऐसा राज्य है जो स्विंग स्टेट कहा जाता है. यानी एक बार इस पार्टी को देता है अगली बार दूसरी पार्टी को. तो ट्रंप की विरोधी पार्टी अपनी सीट बचाने के लिए एक मुस्लिम उम्मीदवार पर क्यों दांव लगा रही है? क्योंकि मिशिगन वो राज्य है जहां मुस्लिम आबादी हाल के सालों में बढ़ी है. डियरबोर्न नाम का एक इलाक़ा है वहां तो अरब मूल के लोगों का बहुमत हो गया है. अब वहां मस्जिदें हैं. साइनबोर्ड अरबी भाषा में हैं अमेरिका के इस इलाक़े में. ईद पर छुट्टी होती है. हाउस में तो यहां से मुस्लिम सांसद भेजे जा चुके हैं. अब पहली बार सीनेट में भी उम्मीदवार मुस्लिम होने जा रहे हैं. ट्रंप यही सब कह कर तो अपने गोरे वोटरों को बताते हैं कि उनका अमेरिका बदल रहा है और वो ये नहीं होने देंगे. अमेरिका के मिशिगन से अगर अब्दुल सेनेट में पहुंच गए तो वो हो जाएगा जिसपर ट्रंप यूरोप को कोसते रहते हैं. सौ बात की एक बात.