सेना की हर चुनौती का अब देसी हल निकालेंगे IIT-IISc, विदेशी तकनीक का नहीं रहेगा इंतजार, रक्षा मंत्रालय की पहल

सेना की हर चुनौती का अब देसी हल निकालेंगे IIT-IISc, विदेशी तकनीक का नहीं रहेगा इंतजार, रक्षा मंत्रालय की पहल


कानपुर: देश की सुरक्षा से जुड़ी तकनीकी चुनौतियों का समाधान अब विदेशी कंपनियों और तकनीकियों के भरोसे नहीं छोड़ा जाएगा. अभी तक जो रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कई तकनीक और उपकरण हैं, जिनके लिए विदेशों पर हमारी निर्भरता रहती है, अब आने वाले समय में यह निर्भरता भी बिल्कुल खत्म होगी. भारत अपने ही वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से सेना की जरूरतों के मुताबिक नई तकनीक विकसित करने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने बड़ी पहल की है.

देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) में डीपीएसयू कोऑर्डिनेशन सेल (डीसीसी) स्थापित किए जाएंगे. इन सेल के माध्यम से रक्षा कंपनियों, सैन्य अधिकारियों और वैज्ञानिकों को एक मंच पर लाया जाएगा. खास बात यह है कि इनके संचालन का खर्च रक्षा मंत्रालय उठाएगा.

दूसरे देशों पर कम होगी निर्भरता
इस पहल का मुख्य उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में आने वाली तकनीकी समस्याओं का समाधान देश के भीतर ही तलाशना है. अभी कई आधुनिक रक्षा उपकरणों और तकनीकों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है. किसी उपकरण की डिजाइन में बदलाव करना हो या उसकी क्षमता बढ़ानी हो, कई बार विदेशी विशेषज्ञों की मदद लेनी पड़ती है. अब डीसीसी के जरिए सेना और रक्षा कंपनियों की जरूरतों को सीधे देश के वैज्ञानिकों तक पहुंचाया जाएगा. इससे स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा और दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी.

एक मंच पर बैठेंगे वैज्ञानिक और सैन्य अधिकारी
डीसीसी की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनियों के अधिकारी, सैन्य विशेषज्ञ और आईआईटी-आईआईएससी के वैज्ञानिक एक साथ बैठकर समस्याओं पर चर्चा कर सकेंगे. सेना को किसी हथियार, विमान या दूसरे सैन्य उपकरण में तकनीकी परेशानी आती है तो उसकी जानकारी संबंधित विशेषज्ञों तक पहुंचाई जाएगी. इसके बाद वैज्ञानिक उस समस्या का समाधान खोजने के लिए शोध और तकनीकी प्रयोग कर सकेंगे. इससे सेना की जरूरत और वैज्ञानिकों के शोध के बीच सीधा संपर्क बनेगा.

आईआईटी कानपुर में शुरू हुई तैयारी
आईआईटी कानपुर के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के सीनियर प्रोफेसर अभिषेक के मुताबिक, इस दिशा में संस्थान का एडवांस्ड वेपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (एडब्ल्यूईआईएल) के साथ करार हुआ है. इसके अलावा हेलीकॉप्टर के ब्लेड की डिजाइन पर काम करने के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ भी विशेषज्ञ सहयोग कर रहे हैं. इन परियोजनाओं के माध्यम से रक्षा उपकरणों की डिजाइन, क्षमता और प्रदर्शन को बेहतर बनाने पर काम किया जा रहा है. आने वाले समय में ऐसे सहयोग से कई नई तकनीकों को विकसित करने का रास्ता खुलेगा.

कानपुर से बेंगलुरु तक जुड़ेगी विशेषज्ञों की ताकत
इस पहल की एक खास बात यह भी है कि किसी रक्षा कंपनी की समस्या का समाधान केवल उसी संस्थान में नहीं तलाशा जाएगा, जहां डीसीसी स्थापित होगा. मसलन, अगर किसी तकनीकी चुनौती का बेहतर समाधान आईआईटी कानपुर के बजाय आईआईएससी बेंगलुरु के किसी वैज्ञानिक के पास है, तो उनकी विशेषज्ञता का भी लाभ लिया जा सकेगा. इसी तरह जरूरत पड़ने पर अलग-अलग आईआईटी के विशेषज्ञ एक ही परियोजना पर मिलकर काम कर सकेंगे. इससे देशभर में उपलब्ध वैज्ञानिक प्रतिभा और शोध सुविधाओं का इस्तेमाल रक्षा क्षेत्र के विकास में किया जा सकेगा.

रक्षा मंत्रालय उठाएगा पूरा खर्च
डीसीसी के संचालन और जरूरी व्यवस्थाओं का खर्च रक्षा मंत्रालय की ओर से उठाया जाएगा. इससे संस्थानों को रक्षा कंपनियों के साथ समन्वय बनाने और तकनीकी समस्याओं पर काम करने में आसानी होगी. ड्रोन, आधुनिक हथियारों, हेलीकॉप्टर, विमानन तकनीक और सैन्य उपकरणों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.



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