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Diwali Morning Rituals: दिवाली के अगले दिन गांवों में सुबह-सुबह सूप पीटने की आवाज सुनाई देती है. घर की बुजुर्ग महिलाएं तड़के उठकर सूप और डंडे से आवाज करती हुई घर के हर कोने में जाती हैं. इस दौरान वे ‘ईसर आवैं, दलिद्दर जांय’ बोलती हैं. रामपुर की आशा देवी बताती हैं कि यह परंपरा उनके बड़े-बुजुर्गों के समय से चली आ रही है और आज भी गांवों में कई महिलाएं इसे निभाती हैं. मान्यता है कि सूप बजाकर घर से दरिद्रता और परेशानियों को बाहर निकाला जाता है, ताकि आने वाला साल सुख-समृद्धि लेकर आए. जानिए, बड़ी दिवाली के दूसरे दिन सूप पीटने की यह अनोखी परंपरा कैसे निभाई जाती है और इसके पीछे क्या मान्यता है.
Diwali Morning Rituals: बड़ी दिवाली के अगले दिन गांवों में सुबह-सुबह एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है. घरों में अभी अंधेरा रहता है और लोग सो रहे होते हैं, तभी खटपट की आवाज सुनाई देने लगती है. घर की बुजुर्ग महिलाएं बांस का सूप लेकर उसे डंडे या करछली से पीटते हुए निकल पड़ती हैं. इसे सूप बजाकर दरिद्रता भगाने की परंपरा कहा जाता है. नई पीढ़ी के लिए यह रस्म भले ही कुछ अलग हो, लेकिन गांवों में कई बुजुर्ग महिलाएं आज भी इसे हर साल निभाती हैं.
इस परंपरा के बारे में रामपुर के थाना अजीमनगर क्षेत्र की रहने वाली आशा देवी ने बताया कि दिवाली के अगले दिन सुबह सूप बजाने की रस्म उनके बड़े-बुजुर्गों के समय से चली आ रही है. पहले घर की बुजुर्ग महिलाएं इसे निभाती थीं और अब वह भी हर साल इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं. आशा देवी के मुताबिक, बड़ी दिवाली के दूसरे दिन सुबह करीब तीन बजे उठकर सबसे पहले घर में रखा पुराना बांस का सूप लिया जाता है. इसके बाद एक छोटा डंडा या करछली लेकर उसे पीटा जाता है.
घर के हर कोने में बजाया जाता है सूप
आशा देवी बताती हैं कि सूप बजाते हुए घर के हर कोने में जाया जाता है. आंगन, कमरे और दरवाजे के पास भी सूप बजाया जाता है. इसके बाद महिलाएं घर से बाहर निकलकर मोहल्ले के मुख्य चौराहे तक जाती हैं. इस दौरान वे ‘ईसर आवैं, दलिद्दर जांय’ बोलती हैं. इसका मतलब है कि घर में ईश्वर आएं, सुख-समृद्धि और लक्ष्मी का वास हो, जबकि दरिद्रता और परेशानियां दूर चली जाएं.
सुख-समृद्धि के लिए निभाई जाती है यह रस्म
गांव में आज भी कई घरों की महिलाएं इस परंपरा को निभाती हैं. इसे घर से गरीबी, बुराई और नकारात्मकता को बाहर निकालने की मान्यता से जोड़ा जाता है. सूप बजाते समय महिलाएं कामना करती हैं कि घर की परेशानियां और अभाव दूर हों और आने वाला साल खुशहाली लेकर आए. यह रस्म घर में सुख-शांति बनाए रखने की कामना के साथ निभाई जाती है.
सूप और डंडे को घर वापस नहीं लातीं महिलाएं
सूप बजाने के बाद महिलाएं उसे घर वापस नहीं लातीं. वे सूप और उसे पीटने के लिए इस्तेमाल किए गए डंडे को किसी बाग, तालाब, पोखर या मोहल्ले के चौराहे पर छोड़ देती हैं. मान्यता है कि जिस तरह सूप को घर से बाहर छोड़ा जाता है, उसी तरह दरिद्रता और परेशानियां भी घर से दूर चली जाती हैं. इसके बाद महिलाएं घर लौटकर झाड़ू-पोंछा करती हैं और साफ-सफाई में जुट जाती हैं. सुबह-सुबह निभाई जाने वाली यह पुरानी रस्म आज भी गांवों में दिवाली का हिस्सा बनी हुई है. बुजुर्ग महिलाएं इसे पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के तौर पर आज भी निभा रही हैं.