azam khan political death | up chunav 2027 | जेल से बाहर रहते आजम खान तो क्या बदल जाता यूपी चुनाव 2027 का समीकरण, अखिलेश के लिए कितनी बड़ी परीक्षा?

azam khan political death | up chunav 2027 | जेल से बाहर रहते आजम खान तो क्या बदल जाता यूपी चुनाव 2027 का समीकरण, अखिलेश के लिए कितनी बड़ी परीक्षा?


लखनऊ. सपा के दिग्गज नेता आजम खान शनिवार को जेल से बाहर आते ही फिर गिरफ्तार हो गए. योगी राज में आजम खान एक बार फिर जेल यात्रा पर जाएंगे, यह लगभग तय हो गया है. शनिवार शाम रामपुर जेल से रिहाई और फिर गिरफ्तारी और अब गाजियाबाद के एमपी-एमएलए कोर्ट में आजम खान की पेशी ने यूपी चुनाव 2027 की कहानी लिख दी. अब आजम खान का जनवरी से मार्च 2027 तक निकलने का कोई रास्ता फिलहाल नजर नहीं आता, क्योंकि ईडी की गिरफ्तारी के बाद शख्स 6 महीना तो जेल में रहता ही है. तब तक यूपी चुनाव 2027 खत्म भी हो जाएगा. आजम खान की गिरफ्तारी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुरानी बहस को फिर चर्चा में ला दिया है. क्या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी का बड़ा धक्का लगा है? क्या आजम खान बाहर रहते तो उनकी सक्रियता अखिलेश यादव के लिए मुस्लिम मतदाताओं के बीच भरोसा मजबूत करता? क्या अखिलेश यादव को एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी की उस राजनीति से चुनौती मिलेगी, जिसमें वे मुस्लिम समुदाय की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज और प्रतिनिधित्व का सवाल उठाते रहे हैं?

शनिवार को आजम खान की रिहाई के कुछ ही मिनट बाद ईडी ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार कर लिया. यानी जिस नेता की जेल से वापसी को सपा 2027 से पहले राजनीतिक संदेश के तौर पर पेश कर सकती थी, उनकी आजादी फिलहाल फिर कानूनी प्रक्रिया में उलझ गई है. ईडी की कार्रवाई का आधार जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण में कथित वित्तीय अनियमितताएं हैं.

ईडी ने आजम खान को क्यों गिरफ्तार किया?

31 अक्टूबर 2026 को आजम खान अपने बेटे अब्दुल्ला आजम के साथ रामपुर जेल से बाहर आए थे. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों को कथित दो पैन कार्ड मामले में जमानत दी थी. लेकिन जेल से निकलने के कुछ ही समय बाद ईडी ने आजम खान को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार कर लिया. अब्दुल्ला आजम घर चले गए. ईडी की जांच का संबंध रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण में कथित वित्तीय अनियमितताओं से है. एजेंसी के मुताबिक, आयकर विभाग की वैल्यूएशन रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी की इमारतों की लागत करीब 494.46 करोड़ रुपये आंकी गई, जबकि ट्रस्ट के आयकर रिकॉर्ड में 2013-14 से 2024-25 के दौरान पूंजीगत खर्च 78.32 करोड़ रुपये बताया गया. इस तरह करीब 416.14 करोड़ रुपये के खर्च का अंतर सामने आने का दावा किया गया है. ईडी इसी कथित अंतर और धन के स्रोत की जांच कर रही है. यह एजेंसी के आरोप हैं, जिनका अंतिम निर्धारण अदालत में होना है.


आजम खान जेल से बाहर रहते तो क्या होता?

इस सवाल का जवाब आजम खान की राजनीतिक उपयोगिता को समझने में छिपा है. वह सिर्फ रामपुर के नेता नहीं रहे हैं. दस बार विधायक चुने जा चुके आजम खान समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं और लंबे समय तक पार्टी के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम चेहरों में गिने जाते रहे हैं. मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव, दोनों के मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी सरकार में अहम भूमिका रही. अगर आजम खान 2027 के चुनाव प्रचार के दौरान जेल से बाहर रहते, तो सपा को कम से कम तीन स्तरों पर उनका राजनीतिक लाभ मिल सकता था.

मुस्लिम नेतृत्व का संदेश: आजम खान की मौजूदगी से सपा यह संदेश दे सकती थी कि पार्टी में मुस्लिम नेताओं की भूमिका केवल चुनावी समर्थन तक सीमित नहीं है.

पश्चिमी यूपी में संगठनात्मक प्रभाव: रामपुर और आसपास के जिलों में आजम खान के पुराने समर्थकों को सक्रिय करने में उनकी भूमिका हो सकती थी.

अखिलेश के लिए राजनीतिक संवाद: आजम खान की सभाएं और बयान सपा के मुस्लिम मतदाताओं के बीच संवाद का एक अलग मंच बन सकते थे.

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि आजम खान की मौजूदगी से मुस्लिम वोट अपने आप सपा के पक्ष में एकजुट हो जाते. रामपुर की राजनीति में भी पिछले कुछ वर्षों में समीकरण बदले हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के मोहिबुल्लाह नदवी की जीत और आजम खान के समर्थकों के साथ उनके संबंधों को लेकर उठे सवाल बताते हैं कि आजम का प्रभाव महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन उसे असीमित नहीं माना जा सकता.

ओवैसी के नैरेटिव को कैसे मिल सकती थी चुनौती?

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि मुस्लिम मतदाता दूसरे दलों को समर्थन तो देते हैं, लेकिन सत्ता और नेतृत्व में उन्हें अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिलती. अक्टूबर 2026 में रामपुर की रैली में भी ओवैसी ने अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सपा यादवों का ख्याल रखती है, जबकि मुसलमानों का इस्तेमाल वोट के लिए करती है. उन्होंने आजम खान की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए भी सपा नेतृत्व पर सवाल उठाए.

यहीं आजम खान की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. यदि वह जेल से बाहर रहकर सपा के मंच से सक्रिय होते, तो अखिलेश यादव के पास ओवैसी के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने के लिए एक बड़ा उदाहरण होता. सपा यह दिखा सकती थी कि आजम खान जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता पार्टी के भीतर अहम स्थान रखते हैं और उनकी राय को महत्व दिया जाता है. लेकिन ओवैसी के नैरेटिव को चुनौती देना सिर्फ आजम खान को मंच पर लाने से संभव नहीं होता. इसके लिए टिकट वितरण, संगठन में मुस्लिम नेताओं की भागीदारी, विधानसभा और सरकार में प्रतिनिधित्व तथा स्थानीय मुद्दों पर पार्टी की स्पष्ट नीति भी जरूरी होगी.

आजम खान से मुलाकात करेंगे अखिलेश यादव.

आजम के साथ-साथ मुस्लिम नेतृत्व को भरोसा

22 अक्टूबर को अखिलेश यादव ने रामपुर जेल में आजम खान से मुलाकात की थी. मुलाकात के बाद उनका बयान ‘आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे’, सिर्फ व्यक्तिगत सम्मान का संदेश नहीं था. चुनाव से पहले इसे पार्टी के मुस्लिम समर्थकों और आजम के पुराने खेमे को भरोसा देने के प्रयास के रूप में भी देखा गया. इस मुलाकात के पीछे एक संगठनात्मक पहलू भी था. आजम खान ने जेल से ही रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम सुझाए थे. उनकी ओर से भेजे गए नामों की सूची ने यह संकेत दिया कि वह चुनावी रणनीति और टिकट चयन में अपनी भूमिका बनाए रखना चाहते हैं.

सपा के सामने अब चुनौती यह होगी कि वह आजम खान के पुराने समर्थकों को पार्टी के साथ जोड़े रखे और साथ ही नए मुस्लिम नेतृत्व को भी जगह दे. पार्टी को यह संतुलन बनाना होगा कि आजम खान का राजनीतिक सम्मान बना रहे, लेकिन स्थानीय स्तर पर दूसरे नेताओं की महत्वाकांक्षाएं और संगठन की जरूरतें भी नजरअंदाज न हों.



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