तोते जैसी चोंच और पंखों वाला ‘हेल चिकन’, मिला 6.6 करोड़ साल पुराना डायनासोर
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डायनासोर की दुनिया में सिर्फ मांस खाने वाले खतरनाक शिकारी ही नहीं थे. वैज्ञानिकों को 6.6 करोड़ साल पुराना एक ऐसा डायनासोर मिला है जिसे फल खाना पसंद था. इसका नाम इन्फर्नोगैलस जेम्सी है और इसे ‘हेल चिकन’ कहा जा रहा है. इसकी चोंच तोते जैसी थी और शरीर पर पंख होने का अनुमान है. करीब 1.5 मीटर लंबा यह जीव टी-रेक्स और ट्राइसेराटॉप्स जैसे विशाल डायनासोर के साथ रहता था. इसकी खोपड़ी में मिली तीन खास खूबियों से वैज्ञानिकों को पता चला कि यह फल और मुलायम पौधों को चबाकर खाता था. जानिए इसकी खोज से डायनासोर की दुनिया के कौन से नए राज खुले हैं.
वैज्ञानिकों को 6.6 करोड़ साल पुराना फल खाने वाला डायनासोर मिला है. (फोटो Reuters)
डायनासोर का नाम सुनते ही दिमाग में एक विशालकाय जीव की तस्वीर उभरती है. बड़े-बड़े दांत और मजबूत जबड़े. शिकार का पीछा करते हुए दूसरे जीवों को दबोच लेना. लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि उसी दौर में एक ऐसा डायनासोर भी रहता था जिसे मांस नहीं बल्कि फल खाना पसंद था? वैज्ञानिकों को करीब 6.6 करोड़ साल पुराना ऐसा ही एक डायनासोर मिला है. इसका नाम ‘इन्फर्नोगैलस जेम्सी’ रखा गया है. इसे प्यार से ‘हेल चिकन’ यानी नरक का मुर्गा कहा जा रहा है. इसकी चोंच तोते जैसी थी और वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका शरीर पंखों से ढका हो सकता था. यह डायनासोर अपने समय के सबसे खतरनाक शिकारी टी-रेक्स के साथ धरती पर रहता था.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार इस खोज ने डायनासोर की दुनिया को लेकर वैज्ञानिकों की पुरानी समझ में नया मोड़ दिया है. अब तक अधिकतर चर्चा इस बात पर होती रही कि डायनासोर कैसे शिकार करते थे और क्या खाते थे. लेकिन यह जीव दिखाता है कि उस दौर में खाने-पीने की आदतों में भी काफी विविधता थी. वैज्ञानिकों ने इसकी खोपड़ी का बारीकी से अध्ययन किया और पाया कि इसकी बनावट मुलायम भोजन को चबाने के लिए खास तौर पर विकसित हुई थी. इसके जबड़े आगे-पीछे हिल सकते थे और चोंच पर मौजूद खास धारियां भोजन को मसलने में मदद करती थीं. यानी यह सिर्फ फल निगलता नहीं था बल्कि उन्हें चबाकर खाता था.
कहां मिला यह ‘हेल चिकन’ डायनासोर?
इस डायनासोर के जीवाश्म अमेरिका की हेल क्रीक चट्टानी संरचना में मिले हैं. यह इलाका पहले भी कई मशहूर डायनासोर के जीवाश्मों की खोज के लिए जाना जाता है. इसी जगह के नाम और इसकी पक्षी जैसी बनावट को मिलाकर इसका नाम ‘हेल चिकन’ रखा गया. वैज्ञानिकों के मुताबिक यह करीब 6.6 करोड़ साल पहले क्रिटेशियस काल के आखिरी दौर में रहता था. इसका आकार आज के टर्की पक्षी के आसपास बताया गया है. इसकी लंबाई करीब 1.5 मीटर और वजन लगभग 11 किलोग्राम था. इसके मुंह में दांत नहीं थे. इसकी जगह तोते जैसी मजबूत चोंच थी. इसके करीबी जीवों के जीवाश्मों के आधार पर वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके शरीर पर भी पंख रहे होंगे. हालांकि इसकी पंखों वाली बनावट को लेकर यह अनुमान करीबी प्रजातियों के जीवाश्मों पर आधारित है.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह फल और दूसरे मुलायम पौधों को खाता था.(फोटो Reuters)
टी-रेक्स और ट्राइसेराटॉप्स के साथ रहता था
- हेल चिकन उस समय धरती पर मौजूद कई विशालकाय डायनासोर के बीच रहता था. इनमें टी-रेक्स यानी टायरानोसॉरस रेक्स और ट्राइसेराटॉप्स जैसे जीव शामिल थे. एंकिलोसॉरस भी उसी दौर में मौजूद था. इन विशाल जीवों के बीच यह छोटा डायनासोर अपने भोजन के लिए अलग पहचान रखता था.
- वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह फल और दूसरे मुलायम पौधों को खाता था. इसकी खोपड़ी की बनावट इस बात का सबसे बड़ा संकेत देती है. अध्ययन के प्रमुख लेखक और स्टोनी ब्रुक यूनिवर्सिटी के जीवाश्म विज्ञानी ग्रेग फंस्टन ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से कहा, ‘यह खोज डायनासोर की जीवनशैली के बारे में हमारी समझ को काफी व्यापक बनाती है. इससे पता चलता है कि थेरोपॉड समूह के डायनासोर अपने वातावरण के मुताबिक कितने अनुकूल हो सकते थे.’
चोंच और जबड़े में मिलीं फल खाने की तीन खास खूबियां
वैज्ञानिकों ने हेल चिकन की खोपड़ी में तीन ऐसी विशेषताएं पहचानीं जो इसे फल खाने वाला डायनासोर बताती हैं.
- पहली खासियत इसके जबड़ों की मांसपेशियां थीं. इनकी बनावट ऐसी थी कि यह भोजन को आगे-पीछे चबाने में सक्षम था.
- दूसरी खासियत निचले जबड़े का लचीला जोड़ था. इसकी मदद से निचला जबड़ा आगे की तरफ भी हिल सकता था. इससे भोजन को चबाना आसान होता होगा.
- तीसरी खासियत इसकी चोंच पर मौजूद उभरी हुई धारियां और खांचे थे. ये मुलायम फल और पौधों के हिस्सों को दबाकर मसलने में मदद करते होंगे.
शोधकर्ताओं के मुताबिक आज कुछ पक्षियों और कछुओं में इन खूबियों में से अलग-अलग विशेषताएं देखने को मिलती हैं. लेकिन इन तीनों का एक साथ मिलना खास है. इससे पता चलता है कि हेल चिकन की चोंच और जबड़े फल खाने के लिए बेहद अनुकूल थे.
पत्थर निगलने के बजाय खुद चबाता था खाना
कई शाकाहारी डायनासोर भोजन को पीसने के लिए छोटे पत्थर निगलते थे. ये पत्थर उनके पेट में भोजन को पचाने और पीसने में मदद करते थे. लेकिन हेल चिकन का तरीका अलग दिखाई देता है. इसकी खोपड़ी और जबड़ों की बनावट से संकेत मिलता है कि यह भोजन को मुंह में ही चबाकर मसलता था. इससे वैज्ञानिकों को डायनासोर के भोजन पचाने के तरीकों में मौजूद अंतर समझने का नया मौका मिला है.
क्या पौधों के बीज फैलाने में भी मदद करता था?
इस खोज से एक और दिलचस्प सवाल उठा है. क्रिटेशियस काल के दौरान धरती पर फूल और फल देने वाले पौधे तेजी से फैल रहे थे. आज भी फल खाने वाले जीव एक जगह से दूसरी जगह बीज पहुंचाते हैं. इससे पौधों को नए इलाकों में फैलने में मदद मिलती है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हेल चिकन और उसके करीबी जीव भी उस दौर में ऐसा करते होंगे. हालांकि इसकी पुष्टि के लिए अभी और सबूतों की जरूरत है.
इस अध्ययन के सह-लेखक थॉमस डजियन के मुताबिक, ‘इन्फर्नोगैलस की खोज दिखाती है कि डायनासोर के भोजन की विविधता हमारी पहले की सोच से कहीं ज्यादा रही होगी.’ इस शोध के नतीजे ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ नाम की वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. कुल मिलाकर यह खोज बताती है कि डायनासोर की दुनिया सिर्फ शिकारियों और शाकाहारी विशालकाय जीवों तक सीमित नहीं थी. वहां फल खाने वाला एक ऐसा छोटा डायनासोर भी था जिसकी चोंच उसे बाकी जीवों से बिल्कुल अलग बनाती थी.