सफेद चमड़ी के क्यों होते जा रहे हैं मगरमच्छ? कोटा के नाले में क्या बह रहा है
Last Updated:
Kota Crocodiles News: राजस्थान के कोटा में नाले में रहने वाले मगरमच्छों का रंग बदलकर सफेद होता जा रहा है. आमतौर पर काले या कीचड़ जैसे भूरे रंग के दिखने वाले मगरमच्छों में आए इस बदलाव के पीछे स्थानीय लोग फैक्ट्रियों से निकलने वाले रासायनिक कचरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. वन विभाग का कहना है कि उसे अब तक इस मामले की जानकारी नहीं थी. लोग गोरा होने के लिए महंगी क्रीम खरीदते हैं, लेकिन कोटा के मगरमच्छों को यह ‘निखार’ मुफ्त में मिल रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि यहां सफेद पड़ता रंग खूबसूरती नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी पर मंडराते खतरे की चेतावनी हो सकता है.
भारत में गोरी स्किन को लेकर लोगों की दीवानगी किसी से छिपी नहीं है. शादी के विज्ञापनों से लेकर सात दिन में निखार देने का दावा करने वाली फेयरनेस क्रीम तक, दशकों से गोरे रंग को खूबसूरती का पैमाना बनाकर पेश किया जाता रहा है. लेकिन राजस्थान के कोटा में मगरमच्छों का सफेद होना खूबसूरती नहीं, बल्कि खतरे का संकेत है. शहर के डीसीएम औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाले नाले में रहने वाले मगरमच्छ, जो आमतौर पर काले या कीचड़ जैसे भूरे रंग के दिखाई देते हैं, अब सफेद नजर आ रहे हैं.
खास बात यह है कि इनके इस रंग के पीछे कोई क्रीम नहीं, बल्कि प्रदूषण को वजह माना जा रहा है. स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसके लिए फैक्ट्रियों से निकलने वाले रसायनयुक्त पानी को जिम्मेदार ठहराया है. उनका दावा है कि प्रदूषित पानी के कारण नाले में रहने वाले छोटे जलीय जीवों की कई प्रजातियां लगभग खत्म हो चुकी हैं.
कोटा को देश की एजुकेशन सिटी के रूप में जाना जाता है, लेकिन यहां का डीसीएम इंडस्ट्रियल सेक्टर अब एक अलग वजह से चर्चा में है. इस इलाके से गुजरने वाले नाले में शहर के सीवेज के साथ-साथ इंडस्ट्रियल यूनिट्स का वेस्ट पानी भी पहुंचता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक दो बड़ी औद्योगिक इकाइयां अपना गंदा पानी इसी नाले में छोड़ती हैं. केमिकल वाला पानी लगातार बहने के कारण नाला बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है.
Add News18 as
Preferred Source on Google
इस नाले को लेकर चिंता कोई नई नहीं है. पिछले कुछ सालों में यहां बार-बार मगरमच्छों की मौत के मामले सामने आते रहे हैं. अब उनके शरीर का रंग बदलने की घटनाओं ने पर्यावरण को लेकर आशंका और भी बढ़ा दी है. एक्सपर्ट्स की रिसर्च के मुताबिक नाले के पानी में बड़े पैमाने पर केमिकल प्रदूषण मौजूद है. ऐसे में जलीय जीवों पर इसका बुरा असर पड़ना नैचुरल है. उनके मुताबिक छोटे पानी के जीवों की संख्या में गिरावट और मगरमच्छों की मौजूदा स्थिति, दोनों ही पर्यावरणीय संकट की ओर इशारा करते हैं.
स्थानीय लोगों का दावा है कि पहले मगरमच्छ इंसानों को देखकर पानी में छिप जाते थे, लेकिन अब उनका व्यवहार ज्यादा आक्रामक दिखाई देने लगा है. डीसीएम नाले का पानी आगे जाकर चंद्रलोई नदी में मिलता है. यह नदी मगरमच्छों की मौजूदगी के लिए जानी जाती है. इस नदी में 1000 से ज्यादा मगरमच्छ रहते हैं. अगर इंडस्ट्रियल कचरा इसी तरह नदी और नाले में पहुंचता रहा, तो इसका नुकसान केवल नाले तक सीमित नहीं रहेगा. प्रदूषण नदी और उसके आसपास के पूरे पर्यावरण को प्रभावित कर सकता है.
नाले के आसपास रहने वाले ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें हवा और पानी दोनों में केमिकल्स के प्रभाव का एहसास होता है. उनका दावा है कि प्रदूषण का असर केवल पानी में रहने वाले जीवों पर नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ रहा है. इंडस्ट्रियल यूनिट्स से लगातार निकलने वाले कचरे ने पानी के जीवों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है. बार-बार शिकायतों के बावजूद अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है. उनका आरोप है कि फैक्ट्रियों से निकलने वाला केमिकल पानी आज भी नाले में छोड़ा जा रहा है.