Inspirational Story Of Mallesh: आंखों में रोशनी नहीं फिर भी हुनर से बनाई पहचान; पेंशन के पैसों से खड़ा किया हस्तकला का रोजगार

Inspirational Story Of Mallesh: आंखों में रोशनी नहीं फिर भी हुनर से बनाई पहचान; पेंशन के पैसों से खड़ा किया हस्तकला का रोजगार


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Inspirational Story Of Mallesh: तेलंगाना के हैदराबाद से आत्मबल और स्वाभिमान की एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहाँ जन्म से दृष्टिबाधित मल्लेश ने मुश्किलों के आगे घुटने टेकने के बजाय अपने हुनर को ढाल बनाया. एक ही महीने में पिता और भाई को खोने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. मल्लेश ने सरकार से मिलने वाली दिव्यांग पेंशन के पैसों से कच्चा माल खरीदकर प्लास्टिक वायर की टोकरियां, बैग और पर्दे बनाने का काम शुरू किया. आज वे अपने इस कारोबार से न केवल आत्मनिर्भर हैं बल्कि अपनी बुजुर्ग मां का एकमात्र सहारा बने हुए हैं.

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हैदराबाद: हैदराबाद के रहने वाले मल्लेश ने यह साबित कर दिखाया है कि यदि आपके हौसले बुलंद और इरादे मजबूत हों, तो जिंदगी की कोई भी कठिन राह आपकी प्रगति को नहीं रोक सकती है. जन्म से ही दोनों आंखों की रोशनी न होने के बावजूद मल्लेश ने कभी भी परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके. हालांकि, उनका जीवन तब बेहद दुखद और कठिन दौर में चला गया, जब पढ़ाई के दौरान ही केवल एक महीने के भीतर उनके पिता और भाई दोनों का देहांत हो गया. इस अचानक आई भीषण त्रासदी ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया. परिवार में कोई अन्य कमाने वाला सदस्य न होने के कारण उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. अपनी बुजुर्ग मां की देखभाल करने और घर का खर्च चलाने की भारी जिम्मेदारी के चलते उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी.

दसवीं कक्षा की पढ़ाई के दौरान मल्लेश ने गडवाल स्थित एक विशेष विद्यालय में अपनी शिक्षिका सोमेश्वरी से प्लास्टिक वायर से टोकरियां, बैग और अन्य सामान बनाने का प्रशिक्षण लिया था. उन्होंने अपनी लगन और कड़ी मेहनत के दम पर बहुत ही कम समय में इस कला को अच्छी तरह सीख लिया था. उस समय उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि स्कूल के दिनों में सीखा गया यह हुनर एक दिन उनके जीवन की सबसे बड़ी ढाल और आजीविका का जरिया बनेगा. जब सरकारी नौकरी पाने की उनकी तमाम कोशिशें नाकाम रहीं, तो उन्होंने निराश होने के बजाय अपने हाथों के इस हुनर पर भरोसा जताया.

दिव्यांग पेंशन से शुरू किया स्वावलंबन का सफर.
किसी के आगे हाथ फैलाने या लाचार बनने के बजाय मल्लेश ने आत्मनिर्भर बनने का फैसला किया. सरकार से मिलने वाली दिव्यांग पेंशन की राशि का सही उपयोग करते हुए उन्होंने कच्चा माल खरीदना शुरू किया. पिछले सात सालों से वे रंग-बिरंगे और मजबूत प्लास्टिक वायर से आकर्षक टोकरियां, टिकाऊ बैग, चटाइयां और खूबसूरत दरवाजे के पर्दे तैयार कर रहे हैं. पेद्दाकोत्तापल्ले में उनकी अपनी दुकान है और वे अलग-अलग प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाकर अपने बनाए सामानों को बेचते हैं.

इच्छाशक्ति के दम पर मां का बने इकलौता सहारा.
दृष्टिहीन होने के बाद भी मल्लेश का कहना है कि लगातार अभ्यास की वजह से उनकी उंगलियां इतनी सधी हुई हैं कि वायर की बुनाई अपने आप एक लय में चलती रहती है. भले ही इस काम से आज केवल घर का गुजारा हो पाता है, लेकिन वे पूरी ईमानदारी और स्वाभिमान के साथ अपनी बुजुर्ग मां का एकमात्र सहारा बने हुए हैं. यदि प्रशासन से थोड़ी और मदद मिल जाए, तो उनका परिवार और अधिक सुरक्षित हो सकता है.



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