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230 रुपये महीने की नौकरी, पत्रकारिता का जुनून और फिर एक ऐसा मोड़ जिसने पूरी जिंदगी बदल दी. बिहार में जन्मे डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा ने पत्रकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी, लेकिन आगे चलकर उन्होंने देश की प्रमुख निजी सुरक्षा सेवा कंपनियों में शामिल SIS ग्रुप की नींव रखी. 1974 में शुरू हुआ उनका यह सफर कारोबार के साथ लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ गया. राजनीति विज्ञान और कानून की पढ़ाई करने वाले सिन्हा भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे और राज्यसभा सांसद भी बने. 30 अक्टूबर को उनका निधन हो गया. जानिए उनकी पढ़ाई, पत्रकारिता के दिनों के संघर्ष और एक बड़े कारोबारी समूह को खड़ा करने की पूरी कहानी…
R K Sinha Success Story, sis founder: आरके सिन्हा ने SIS कंपनी कैसे शुरू की.
R.K. Sinha Success Story: राज्यसभा के पूर्व सांसद भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य और SIS ग्रुप के संस्थापक डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा का 30 अक्टूबर को नोएडा स्थित अपने आवास पर निधन हो गया. उनके निधन से बिहार के राजनीतिक और कारोबारी जगत में शोक है. सिन्हा की पहचान सिर्फ एक राजनेता या उद्योगपति के रूप में नहीं थी बल्कि उनकी जिंदगी संघर्ष, पत्रकारिता और रोजगार देने के संकल्प की कहानी भी है. कभी करीब 230 रुपये महीने की तनख्वाह पर पत्रकारिता करने वाले सिन्हा ने आगे चलकर निजी सुरक्षा सेवा के क्षेत्र में बड़ा कारोबार खड़ा किया. उनकी कंपनी SIS ग्रुप देश-विदेश में सुरक्षा और दूसरी व्यावसायिक सेवाएं देने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल हुई.आरके सिन्हा की कहानी उन युवाओं के लिए मिसाल है जो जीवन में कुछ बडा करना चाहते हैं.
बक्सर में जन्म, पटना में पढ़ाई और पत्रकारिता से शुरुआत
रविन्द्र किशोर सिन्हा का जन्म 22 सितंबर 1951 को बिहार के बक्सर जिले में हुआ था. उनके पिता की नौकरी पटना में थी इसलिए बचपन से ही उनका परिवार पटना में रहने लगा. पढ़ाई के दौरान ही उनका रुझान पत्रकारिता की ओर हो गया. उन्होंने राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की और कानून की शिक्षा भी हासिल की. इसके बाद उन्होंने पत्रकार के रूप में अपना करियर शुरू किया.सिन्हा ने ‘सर्चलाइट-प्रदीप’ जैसे अखबारों में काम किया. वह अपराध और राजनीतिक मामलों की रिपोर्टिंग करते थे. उनकी पहचान गंभीर और खोजपरक पत्रकार के रूप में बनी. वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध संवाददाता की भूमिका भी निभाई और युद्ध क्षेत्र से रिपोर्टिंग की.
230 रुपये की नौकरी छूटी तो बदली जिंदगी की दिशा
पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में सिन्हा को करीब 230 रुपये महीने का वेतन मिलता था. उनके जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब युद्ध की रिपोर्टिंग के बाद उनके लेखन और राजनीतिक विचारों को लेकर अखबार की नौकरी चली गई. उन्होंने बाद में बताया था कि अखबार के मालिक पर उनके लिखने को लेकर दबाव था.नौकरी छूटना उनके लिए मुश्किल समय था, लेकिन उन्होंने इसे अपने जीवन का अंत नहीं माना. इसी दौर में उन्होंने समाज और रोजगार से जुड़े कामों की ओर कदम बढ़ाया. उनकी कहानी का अहम पहलू यह है कि उन्होंने अपनी पत्रकारिता की समझ और लोगों से संपर्क को एक नए काम की शुरुआत का आधार बनाया.
जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा से शुरू हुई SIS
सिन्हा बिहार में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन से भी जुड़े रहे. वर्ष 1974-75 के आंदोलन के अनुभवों पर उन्होंने ‘जनांदोलन’ नाम की किताब लिखी. इसी दौर में जयप्रकाश नारायण से हुई बातचीत ने उनके आगे के काम को दिशा देने में भूमिका निभाई.सिन्हा ने बताया था कि उद्योगपतियों को प्रशिक्षित और भरोसेमंद कर्मचारियों की जरूरत थी, जबकि युवाओं को रोजगार चाहिए था. खास तौर पर 1971 के युद्ध के बाद सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए रोजगार के अवसर तैयार करने का विचार उनके मन में आया. इसी सोच के साथ उन्होंने 1974 में सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज यानी SIS की शुरुआत की. शुरुआती काम छोटे स्तर पर शुरू हुआ लेकिन समय के साथ कंपनी का विस्तार होता गया. वर्ष 1985 में इसे प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाया गया.
तीन लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली कंपनी
SIS ग्रुप ने सुरक्षा सेवाओं से शुरुआत की और आगे चलकर कई तरह की व्यावसायिक सेवाओं में अपनी जगह बनाई. कंपनी का कारोबार भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे बाजारों तक पहुंचा. सिन्हा से जुड़ी सफलता की कहानियों में कंपनी के कारोबार के 13 हजार करोड़ रुपये से अधिक होने और तीन लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देने का दावा किया जाता रहा है. सिन्हा की कारोबारी सोच का एक अहम हिस्सा रोजगार पैदा करना था. वह सुरक्षा सेवाओं में प्रशिक्षण और अनुशासन को महत्वपूर्ण मानते थे. उनका मानना था कि जरूरतमंद लोगों को प्रशिक्षण देकर स्थायी रोजगार से जोड़ना भी कारोबार के जरिए समाज की मदद करने का एक तरीका है.
कारोबार के साथ राजनीति और शिक्षा से भी जुड़ाव
सिन्हा की राजनीतिक यात्रा भी लंबी रही. वह 1966 में भारतीय जनसंघ से जुड़े थे और बाद में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए. फरवरी 2014 में वह बिहार से भाजपा के राज्यसभा सांसद चुने गए. उनका कार्यकाल अप्रैल 2014 से अप्रैल 2020 तक रहा. कारोबार के अलावा उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी काम किया. वह देहरादून में द इंडियन पब्लिक स्कूल की स्थापना से जुड़े रहे और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटी एंड सेफ्टी मैनेजमेंट के संस्थापक अध्यक्ष भी थे. उनकी पहचान सुरक्षा प्रबंधन, प्रशिक्षण और रोजगार सृजन के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के रूप में भी बनी.डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा का जीवन पत्रकारिता से कारोबार और फिर संसद तक पहुंचने की यात्रा रहा. उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि नौकरी छूटने या मुश्किल समय आने के बाद भी नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं. उन्होंने जिस काम की शुरुआत सेवानिवृत्त सैनिकों और जरूरतमंद युवाओं को रोजगार देने की सोच के साथ की थी, वही आगे चलकर बड़े कारोबारी समूह में बदल गया.