प्रयागराज में बिरहा, आल्हा और कजरी जैसी लोककलाओं को बढ़ाने पर जोर, 40 साल से एनसीजेडसीसी कर रहा संरक्षण व प्रचार

प्रयागराज में बिरहा, आल्हा और कजरी जैसी लोककलाओं को बढ़ाने पर जोर, 40 साल से एनसीजेडसीसी कर रहा संरक्षण व प्रचार


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Prayagraj News: बिरहा की गूंज, आल्हा का जोश, कजरी की मिठास और ध्रुपद के सुर भारतीय संस्कृति की पहचान हैं. बदलते समय के साथ इन पारंपरिक लोककलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी हो गया है. प्रयागराज के उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में लोक और शास्त्रीय संगीत से जुड़े कलाकारों ने अपनी कला और अनुभव साझा किए. बिरहा गायक विनोद कुमार पटेल वर्ष 2004 से इस विधा से जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि बिरहा को आगे बढ़ाने के लिए गांवों और विद्यालयों में जाकर बच्चों को इसके प्रति जागरूक करने की जरूरत है.

प्रयागराज: बिरहा की गूंज, आल्हा का जोश, कजरी की मिठास और ध्रुपद के सुर भारतीय संस्कृति की पहचान हैं. बदलते समय के साथ इन पारंपरिक लोककलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी हो गया है. प्रयागराज के उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में लोक और शास्त्रीय संगीत से जुड़े कलाकारों ने अपनी कला और अनुभव साझा किए. इस दौरान लोकगीतों को आगे बढ़ाने और बच्चों को इनसे जोड़ने पर जोर दिया गया.

लोक गायन को बढ़ाने की जरूरत

बिरहा गायक विनोद कुमार पटेल वर्ष 2004 से इस विधा से जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि बिरहा को आगे बढ़ाने के लिए गांवों और विद्यालयों में जाकर बच्चों को इसके प्रति जागरूक करने की जरूरत है. करीब चार साल पहले उन्होंने एक विद्यालय में बच्चों को बिरहा सिखाने का प्रयास किया था. इसमें 10 से 20 बच्चों ने रुचि दिखाई और इसे सीखने के लिए आगे आए. उनका कहना है कि बच्चों को सही मार्गदर्शन और सीखने का अवसर मिले तो वे इस परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं. बांदा के रहने वाले ध्रुपद गायक साकेत कुमार रेकवार ने कहा कि ध्रुपद गायन प्राचीन संगीत परंपरा का हिस्सा है. आज भी बहुत से लोग इस गायन शैली के बारे में नहीं जानते हैं. उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे भारतीय शास्त्रीय संगीत को सुनें और इसे सीखने में रुचि लें. बच्चों को बचपन से ही अच्छा संगीत सुनने का अवसर मिले तो धीरे-धीरे उनकी रुचि बढ़ सकती है. इसके बाद गुरु से प्रशिक्षण लेकर वे इस विधा को सीख सकते हैं.

कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में सलाहकार कल्पना सहाय ने कहा कि लोकगीत समाज और मानवीय भावनाओं से जुड़े हैं. बिरहा, आल्हा, कजरी, भोजपुरी, बुंदेली और अवधी के गीतों में लोगों के जीवन और सामाजिक परिस्थितियों की झलक मिलती है. पहले गांवों में किसान दिनभर काम करने के बाद चौपालों पर बैठकर लोकगीत गाते थे. इससे उनकी थकान दूर होती थी और आपसी मेलजोल भी बढ़ता था. उन्होंने कहा कि संस्कृति कभी ठहरती नहीं है, बल्कि समय के साथ उसका स्वरूप बदलता रहता है. जरूरत इस बात की है कि इसे नए रूप में नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए.

40 वर्षों से एनसीजेडसीसी कर रहा कला का संरक्षण और प्रचार प्रसार

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के मीडिया प्रभारी अमरीश द्विवेदी ने बताया कि केंद्र पिछले 40 वर्षों से लोककलाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए काम कर रहा है. बिरहा, चैती, कजरी और आल्हा जैसी विधाओं को मंच देकर कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया जा रहा है. इसके माध्यम से पुरानी परंपराओं को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है. कलाकारों का मानना है कि लोककलाओं को आगे बढ़ाने के लिए परिवारों, विद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थाओं को मिलकर प्रयास करना होगा. बच्चों को इन गीतों से परिचित कराने और कलाकारों को मंच देने से पारंपरिक संगीत की पहुंच बढ़ सकती है. इससे नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझ सकेगी और उसे आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभा सकेगी.



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