Karwa Chauth: करौली में करवा चौथ की अनोखी परंपरा, शक्कर के करवे बनाते हैं मुस्लिम कारीगर, जानें खासियत

Karwa Chauth: करौली में करवा चौथ की अनोखी परंपरा, शक्कर के करवे बनाते हैं मुस्लिम कारीगर, जानें खासियत


Last Updated:

Karauli Karwa Chauth Sweet Karva Tradition: करौली में करवा चौथ पर एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है. यहां सुहागिन महिलाएं मिट्टी के करवों के बजाय शक्कर से बने मीठे करवों को विशेष महत्व देती हैं. इन करवों को मुस्लिम कारीगर कई पीढ़ियों से अपने हाथों से तैयार करते आ रहे हैं. कारीगर जब्बार खान के अनुसार, करीब 8 से 10 परिवार हर साल करवा चौथ से पहले शक्कर के करवे बनाने में जुट जाते हैं. इन्हें तैयार करने के लिए पहले चीनी की चाशनी बनाई जाती है और फिर मिट्टी के विशेष सांचों में डालकर आकार दिया जाता है. छोटे, मध्यम और बड़े आकार में मिलने वाले इन करवों की कीमत इस बार 20 से 40 रुपये तक पहुंच गई है. पहले ये 10 से 20 रुपये में मिलते थे. पूजा के बाद इन्हें प्रसाद के रूप में खाया भी जा सकता है. यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सौहार्द की मिसाल भी पेश करती है.

करौली. करवा चौथ का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में पूजन सामग्री की रौनक बढ़ने लग जाती है. आमतौर पर करवा चौथ पर मिट्टी के करवे खरीदने की परंपरा है, लेकिन राजस्थान के करौली में एक अनूठी परंपरा देखने को मिलती है. यहां सुहागिन महिलाओं के बीच मिट्टी के करवों से ज्यादा शक्कर से बने मीठे करवों की मांग रहती है. खास बात यह है कि इन करवों को मुस्लिम कारीगर अपने हाथों से तैयार करते हैं. पीढ़ियों से इस काम में जुटे परिवार आज भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.

इस बार करवा चौथ पर इन मीठे करवों को खरीदने के लिए महिलाओं को पहले की तुलना में ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी है. चीनी महंगी होने के कारण शक्कर के करवों के दाम बढ़ गए हैं. पहले जो करवे 10 से 20 रुपये में मिल जाते थे, उनकी कीमत अब बढ़कर 20 से 40 रुपये तक पहुंच गई है. इसके बावजूद इनकी मांग बनी हुई है. स्थानीय महिलाओं के लिए ये करवे केवल पूजन सामग्री नहीं, बल्कि परंपरा और शगुन से भी जुड़े हुए हैं.

मिट्टी के सांचे में तैयार होता है मीठा करवा

करौली में शक्कर के करवे बनाने वाले कारीगर जब्बार खान बताते हैं कि यहां कई पीढ़ियों से मुस्लिम परिवार इस काम को करते आ रहे हैं. करीब 8 से 10 परिवार हर साल करवा चौथ से पहले इन करवों को तैयार करने में जुट जाते हैं. त्योहार के दौरान इनकी मांग बढ़ने के कारण कारीगर पहले से ही बड़ी संख्या में करवे बनाना शुरू कर देते हैं. इसे बनाने की प्रक्रिया भी खास है. सबसे पहले चीनी की चाशनी तैयार की जाती है. इसके बाद चाशनी को मिट्टी से बने विशेष सांचे में डाला जाता है. इस प्रक्रिया के बाद इसे आकार दिया जाता है और तैयार होने पर करवा बाजार में बिक्री के लिए पहुंचता है. कारीगर रईस खान ने बताया कि करवा तैयार करते समय साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि इनका इस्तेमाल धार्मिक पूजन में किया जाता है.

छोटे से लेकर बड़े आकार तक मिलते हैं करवे

कारीगर रईस खान ने बताया कि करौली में शक्कर के करवे मुख्य रूप से तीन प्रकार के बनाए जाते हैं. इनमें छोटे, मीडियम और बड़े आकार के करवे शामिल हैं.आकार, डिजाइन और रंग के आधार पर इनमें अंतर होता है. महिलाएं अपनी पसंद और जरूरत के अनुसार इन्हें खरीदती हैं. इन मीठे करवों की खासियत केवल इनका पारंपरिक महत्व ही नहीं, बल्कि इनका स्वाद भी है. मिट्टी के करवे के विपरीत शक्कर से बने इन करवों को पूजा के बाद खाया भी जा सकता है. मीठे स्वाद के कारण महिलाएं इन्हें शगुन के तौर पर इस्तेमाल करने के साथ प्रसाद के रूप में भी ग्रहण करती हैं. यही वजह है कि करौली में करवा चौथ के मौके पर इनकी खास मांग रहती है.

हिंदू-मुस्लिम परंपरा की है खूबसूरत मिसाल 

करौली के शक्कर के करवे सामाजिक सौहार्द की भी एक मिसाल है. जहां हिंदू महिलाएं इन्हें करवा चौथ के पूजन और शगुन के लिए खरीदती हैं, वहीं इन्हें बनाने का हुनर मुस्लिम कारीगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभालते आ रहे हैं. चीनी महंगी होने से इस बार कीमतें जरूर बढ़ी हैं, लेकिन करौली की इस खास परंपरा और मीठे करवों के प्रति महिलाओं का लगाव आज भी कायम है.



Source link