नई दिल्ली (Student Well-Being Pulse Report 2026). आज के दौर में बच्चों की जिंदगी किताबों, होमवर्क और एग्जाम रिजल्ट तक सीमित नहीं है. यह मानसिक तनाव, भविष्य के डर और अनिश्चितता का जाल बन चुकी है. मुंबई स्थित ‘IC3 इंस्टीट्यूट’ ने ‘स्टूडेंट वेल-बीइंग पल्स’ रिपोर्ट जारी की है. इसमें चौंकाने वाले आंकड़े आए हैं. इस सर्वे में देश के 8,542 से अधिक स्टूडेंट्स शामिल थे. रिपोर्ट के मुताबिक, 12वीं के लगभग 59% स्टूडेंट्स अपनी स्कूल लाइफ से संतुष्ट नहीं हैं और स्कूल जाने को बोझ मानने लगे हैं.
बच्चों पर सर्वे, आंकड़ों ने चौंकाया
40 प्रतिशत से अधिक बच्चों को यह तक नहीं पता कि उनके अपने स्कूल में मेंटल हेल्थ सपोर्ट या काउंसलिंग कहां उपलब्ध है. उचित करियर गाइडेंस की कमी और सोने से पहले अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण तीन चौथाई (75%) स्टूडेंट्स को रात में पूरी नींद (7-8 घंटे) नहीं मिल पा रही है. इससे भविष्य के प्रति उनकी घबराहट और एंग्जाइटी बढ़ रही है.
पढ़ाई का भारी बोझ और स्कूल लाइफ से घटता मोह
आज के स्कूली बच्चों के कंधों पर सिर्फ बैग का वजन नहीं, बल्कि नंबर लाने का असहनीय दबाव है. IC3 इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि 12वीं कक्षा के 59% स्टूडेंट्स स्कूल लाइफ से नाखुश हैं. सुबह स्कूल जाने की खुशी अब फॉर्मेलिटी बनकर रह गई है. परीक्षा के भारी सिलेबस, पेरेंट्स की उम्मीदों और साथियों के साथ कॉम्पिटिशन के कारण बच्चे मानसिक रूप से थक चुके हैं. स्कूल उन्हें सीखने और आनंद लेने की जगह स्ट्रेसफुल फैक्ट्री जैसे लगने लगे हैं.
भविष्य की अनिश्चितता और करियर काउंसलिंग का अभाव
स्टूडेंट्स के तनाव का दूसरा सबसे बड़ा कारण भविष्य को लेकर उनका असमंजस है. रिपोर्ट के अनुसार, लगभग आधे (50%) स्टूडेंट्स को कभी भी स्कूल लेवल पर व्यवस्थित करियर काउंसलिंग ही नहीं मिली है. जब बच्चों को साफ-साफ समझ में नहीं आता है कि वे आगे चलकर क्या बनेंगे या उनके लिए कौन सा करियर सही है तो भविष्य का डर उनके मन में घर कर जाता है. यही अनिश्चितता उनकी नींद और मानसिक शांति, दोनों चुरा रही है.
नींद की गंभीर किल्लत और स्क्रीन टाइम का जाल
12वीं तक आते-आते बच्चों की रातें आराम की जगह ओवरथिंकिंग और फोन स्क्रॉलिंग का अड्डा बन चुकी हैं. इस सर्वे के मुताबिक, 4 में से 3 (75%) सीनियर स्टूडेंट्स 7 से 8 घंटे की नींद नहीं ले पाते हैं, जबकि इतनी न्यूनतम नींद उनके लिए जरूरी है. इसके पीछे मुख्य वजह पढ़ाई का ओवरलोड और बेडरूम में सोने से ठीक पहले मोबाइल स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल है. नींद पूरी न होने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, सुस्ती और फोकस की कमी आम होती जा रही है.
जेंडर के आधार पर मेंटल हेल्थ का अलग संकट
मानसिक तनाव का असर हर स्टूडेंट पर अलग तरह से पड़ रहा है. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है किशोरावस्था की इस दौड़ में छात्राएं (लड़कियां) अपने तनाव को अंदर ही अंदर घोटती हैं (internalise stress). वे लड़कों की तुलना में लगभग दोगुने दर से लगातार उदासी का सामना करती हैं. वहीं, नॉन-बाइनरी स्टूडेंट्स की मेंटल हेल्थ सबसे अधिक संवेदनशील और खराब पाई गई है. उन्हें समाज और स्कूल, दोनों लेवल्स पर विशेष देखभाल की जरूरत है.
आधे से ज्यादा बच्चों को नहीं पता कि मदद कहां मांगें
देश में बड़ी संख्या में बच्चे मानसिक रूप से टूट रहे हैं. चौंकाने वाली बात है कि उनमें से 40% से अधिक बच्चों को यह तक पता नहीं होता कि स्कूल के अंदर वे किससे अपनी परेशानी शेयर करें. कई स्कूलों में काउंसलिंग सेल होते नहीं हैं या उनके बारे में स्टूडेंट्स को कोई जानकारी नहीं दी जाती. ऐसे में स्कूली बच्चे अपनी समस्याएं अपने दोस्तों से शेयर तो करते हैं. लेकिन कच्ची उम्र के दोस्त उन्हें प्रोफेशनल या सही सलाह देने में असमर्थ होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और स्कूलों की सुस्ती
राहत की बात है कि अब इस मुद्दे पर न्यायपालिका ने भी संज्ञान लिया है. सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के स्कूलों में व्यापक और अनिवार्य स्कूल-बेस्ड काउंसलिंग सिस्टम स्थापित करने पर जोर दिया है. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से इस दिशा में काम कर रहे लोगों को बल मिला है. हालांकि, कागजी आदेशों से आगे बढ़कर स्कूलों को धरातल पर अपना सिस्टम बदलने की सख्त जरूरत है.
फाउंडर गणेश कोहली की दो टूक: यह खामोश संकट नहीं
IC3 इंस्टीट्यूट के संस्थापक गणेश कोहली ने इस रिपोर्ट पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि यह कोई छिपा हुआ या शांत रहने वाला मुद्दा नहीं रह गया है. यह बहुत खतरनाक संकट बन चुका है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को अब ऑप्शनल (ऐच्छिक) नहीं समझा जा सकता. हर स्कूल को अपने बुनियादी ढांचे (Infrastructure) में काउंसलिंग और इमोशनल समर्थन को अनिवार्य रूप से शामिल करना होगा.
शिक्षकों को बनना होगा ‘ट्रेंड गेटकीपर’
स्कूलों में सिर्फ काउंसलर नियुक्त कर देना ही काफी नहीं है. रिपोर्ट के सुझावों के मुताबिक, स्कूलों को अपने शिक्षकों और स्टाफ को इस तरह ट्रेन करना होगा कि वे ‘गेटकीपर’ की भूमिका निभा सकें. इसका मतलब है कि क्लासरूम में पढ़ाते समय टीचर को भांपना आना चाहिए कि कौन सा बच्चा मानसिक दबाव में है और उसे कब प्यार से बात करके सही दिशा दिखाने की जरूरत है.
आपस में मदद ले रहे हैं बच्चे
मुश्किल समय में स्टूडेंट्स सबसे पहले अपने दोस्तों (Peers) के पास मदद के लिए जाते हैं. लेकिन दोस्त खुद भी उसी नासमझ उम्र में होते हैं. वे पैनिक या एंग्जाइटी को सही तरह से संभाल नहीं पाते. इसलिए स्कूलों में ऐसा सुरक्षित माहौल बनाना जरूरी है, जहां स्टूडेंट्स बिना किसी झिझक या डर के सीधे ट्रेन्ड काउंसलर के पास जाकर खुलकर अपनी बात रख सकें.
कैसे संभलेगी आने वाली पीढ़ी?
अगर इस ‘साइलेंट क्राइसिस’ को समय रहते नहीं रोका गया तो यह युवा पीढ़ी के भविष्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाएगा. स्कूलों, पेरेंट्स और पॉलिसी मेकर्स को मिलकर प्रैक्टिकल सिस्टम तैयार करना होगा. उसमें पढ़ाई के साथ-साथ बच्चे की मानसिक शांति, उसकी खुशी और बैलेंस्ड लाइफस्टाइल को पहले प्राथमिकता देना जरूरी है.