Diwali 2026: दिवाली पर क्यों खरीदे जाते हैं मिट्टी के बड़े सकोरे? लक्ष्मी पूजा से जुड़ा है खास महत्व

Diwali 2026: दिवाली पर क्यों खरीदे जाते हैं मिट्टी के बड़े सकोरे? लक्ष्मी पूजा से जुड़ा है खास महत्व


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दिवाली पर क्यों खरीदे जाते हैं मिट्टी के बड़े सकोरे? जानें इससे जुड़ी परंपरा

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Diwali Sakore Religious Significance: दीपावली पर घरों में लक्ष्मी पूजन के लिए कई तरह की पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें मिट्टी से बने बड़े सकोरे भी शामिल हैं. भरतपुर में दिवाली के अवसर पर इन सकोरों का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है. पूजा के दौरान इनमें अनाज, मिठाइयां और दूसरी सामग्री रखकर देवी-देवताओं को अर्पित की जाती है. यही वजह है कि त्योहार से पहले इनकी खरीदारी बढ़ जाती है. मांग को देखते हुए स्थानीय कुंभकार मिट्टी को तैयार कर अलग-अलग आकार के सकोरे बनाने में जुटे हैं. इन्हें बनाने के बाद सुखाया जाता है और इस्तेमाल के योग्य तैयार किया जाता है. आधुनिक दौर में पूजा के नए बर्तन उपलब्ध होने के बावजूद मिट्टी के सकोरों की परंपरा कायम है. इनकी बिक्री से कुंभकारों की आजीविका को सहारा मिलता है और स्थानीय हस्तकला को प्रोत्साहन मिलता है.

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दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही भरतपुर में बाजारों की रौनक बढ़ने लगी है. त्योहार पर घरों में साफ-सफाई और सजावट के साथ पूजा-पाठ की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. इसी बीच मिट्टी से बने सकोरों की मांग भी बढ़ने लगी है. दीपावली पर इन सकोरों का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. यही वजह है.कि त्योहार से पहले कुंभकार मिट्टी के बड़े सकोरे बनाने में जुट गए हैं.

दीपावली के अवसर पर मिट्टी के सकोरों का इस्तेमाल मुख्य रूप से लक्ष्मी पूजन और देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए किया जाता है. परंपरा के अनुसार इन सकोरों में अनाज, मिठाइयां और अन्य पूजन सामग्री रखकर भगवान को अर्पित की जाती है. श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा करते हुए सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं. यही कारण है. कि दीपावली की पूजा में मिट्टी से बने इन पारंपरिक पात्रों का खास स्थान है.

भरतपुर में मिट्टी के सकोरों से जुड़ी यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है. आधुनिकता के दौर में पूजा की सामग्री के कई नए विकल्प बाजार में उपलब्ध हैं. लेकिन इसके बावजूद मिट्टी के सकोरों के प्रति लोगों की आस्था बनी हुई है. त्योहार के दौरान बड़ी संख्या में लोग इन्हें खरीदने के लिए बाजार पहुंचते हैं और अपनी पारंपरिक पूजा-पद्धति के अनुसार इनका इस्तेमाल करते हैं.

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दीपावली के लिए बनाए जाने वाले सकोरे सामान्य दिनों में इस्तेमाल होने वाले पात्रों से आकार में बड़े भी होते हैं. इनमें पूजा के दौरान अनाज, मिठाइयां और दूसरी सामग्री आसानी से रखी जा सकती है. जरूरत और परंपरा के अनुसार अलग-अलग आकार के सकोरे तैयार किए जाते हैं ताकि लोग अपनी पूजा की व्यवस्था के मुताबिक इन्हें खरीद सके.

इन सकोरों को तैयार करने के लिए कुंभकार पहले मिट्टी को अच्छी तरह तैयार करते हैं. इसके बाद मिट्टी को आकार देकर सकोरे बनाए जाते हैं और उन्हें सुखाकर इस्तेमाल के योग्य बनाया जाता है. इस काम में मेहनत और समय दोनों लगते हैं. दीपावली के नजदीक आते ही कुम्हार परिवार उत्पादन बढ़ाने में जुट जाते हैं ताकि त्योहार के समय ग्राहकों की मांग पूरी की जा सके.

मिट्टी के सकोरों की खरीदारी से कुंभकारों को भी त्योहार के दौरान रोजगार मिलने की उम्मीद रहती है. दीपावली जैसे पर्व उनके व्यवसाय के लिए महत्वपूर्ण होते हैं. बाजार में बदलते चलन के बीच मिट्टी के बर्तनों की परंपरा को बनाए रखना भी जरूरी है. स्थानीय स्तर पर इनकी खरीदारी से पारंपरिक हस्तकला और कुम्हारों की मेहनत को प्रोत्साहन मिलता है.

भरतपुर में दीपावली के दौरान मिट्टी के सकोरे केवल पूजा-पाठ की सामग्री नहीं बल्कि आस्था और वर्षों पुरानी परंपरा के प्रतीक भी है. लक्ष्मी पूजन में इनका इस्तेमाल त्योहार की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखता है. यही वजह कि दीपावली से पहले कुंभकार बड़े-बड़े मिट्टी के सकोरे बनाने में जुटे हुए हैं और लोग भी अपनी परंपरा के अनुसार इन्हें खरीदने की तैयारी कर रहे हैं.

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