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Nadol Ashapura Mata Mandir History: पाली जिले के नाडोल में स्थित आशापुरा माता मंदिर चौहान वंश की कुलदेवी का प्रमुख शक्तिपीठ है. 10वीं शताब्दी में नाडोल के संस्थापक राव लक्ष्मण चौहान की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ शाकंभरी ने उन्हें साम्राज्य स्थापना का वरदान दिया था. मनोकामनाएं (आशाएं) पूरी होने के कारण माता का नाम ‘आशापुरा’ पड़ा. 1000 वर्ष पुराने इस मंदिर में अखंड ज्योति जलती है. नवरात्रि पर यहां विशाल मेला भरता है और श्रद्धालु जड़ूला (मुंडन) संस्कार के लिए देश-विदेश से पहुंचते हैं.
पाली: राजस्थान की पावन धरा अपने शूरवीरों, समृद्ध इतिहास और अलौकिक शक्तिपीठों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है. पाली जिले के ऐतिहासिक कस्बे नाडोल में स्थित माँ आशापुरा का मंदिर राजस्थान में माता के सबसे प्रमुख और भव्य देवस्थानों में से एक माना जाता है. लगभग 1,000 वर्ष पुराना यह ऐतिहासिक धाम न केवल चौहान राजवंश की विभिन्न शाखाओं की कुलदेवी का स्थल है, बल्कि राजस्थान के कई राजपूत घरानों और विभिन्न समाजों की अगाध आस्था का केंद्र भी है. मान्यता है कि नाडोल राज्य के संस्थापक राव लक्ष्मण चौहान की कठिन तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर माँ शाकंभरी ने उनकी हर मनोकामना पूरी की थी, जिसके बाद वे ‘आशा पूरी करने वाली’ यानी ‘आशापुरा माता’ के नाम से विख्यात हुईं.
नाडोल के इस शक्तिपीठ की स्थापना का इतिहास 10वीं शताब्दी के प्रतापी राजा राव लक्ष्मण (लखन) चौहान से जुड़ा हुआ है. शाकंभरी (सांभर) के राजा वाक्पतिराज के पुत्र राव लक्ष्मण चौहान अपने नए स्वतंत्र राज्य की स्थापना का संकल्प लेकर नाडोल क्षेत्र में आए थे. उस समय नाडोल का क्षेत्र अनेक विषम परिस्थितियों और समस्याओं से घिरा हुआ था तथा राजा के पास सीमित सेना व संसाधन थे. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने और राज्य में शांति स्थापित करने के लिए राव लक्ष्मण ने माँ शाकंभरी की घोर तपस्या की. उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें दर्शन दिए और एक शक्तिशाली व समृद्ध राज्य स्थापित करने का वरदान दिया.
सभी आशाएं पूरी होने से पड़ा ‘आशापुरा’ नाम
माँ शाकंभरी के दिव्य आशीर्वाद से राव लक्ष्मण चौहान की सभी मनोकामनाएं और साम्राज्य विस्तार की आशाएं पूर्ण हुईं. उन्होंने नाडोल में एक सुदृढ़ चौहान साम्राज्य की नींव रखी. क्योंकि माता ने राजा की सभी ‘आशाएं पूरी कीं’, इसलिए इस क्षेत्र में माँ शाकंभरी को ‘आशापुरा माता’ के नाम से पुकारा जाने लगा. इसके बाद राजा राव लक्ष्मण ने नाडोल में माता के भव्य और कलात्मक मंदिर का निर्माण करवाया तथा उन्हें अपने वंश की कुलदेवी के रूप में स्थापित किया.
स्थापत्य कला और मंदिर का अलौकिक स्वरूप
नाडोल का आशापुरा माता मंदिर अपने स्थापत्य और आध्यात्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है. मंदिर का प्रवेश द्वार अत्यंत भव्य और कलात्मक है, जहां प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को असीम शांति का अनुभव होता है. गर्भगृह में विराजित माँ आशापुरा की प्रतिमा सिंह (शेर) पर सवार है, जो श्रद्धालुओं को अभयदान देती हुई प्रतीत होती है. मंदिर परिसर में वर्षों से प्रज्वलित अखंड ज्योति यहां के वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करती है.
धार्मिक परंपराएं, मुंडन संस्कार और पहुंच मार्ग
चौहान वंश की विभिन्न शाखाओं (चावड़ा, हाड़ा, खींची, सोनगरा आदि) के साथ-साथ देश-विदेश में बसे श्रद्धालु अपने नवजात बच्चों के मुंडन (जड़ूला) संस्कार और नवदंपत्तियों के सुखद जीवन की मन्नत मांगने नाडोल आते हैं. मान्यता है कि माता के दर पर लाल चुनरी चढ़ाने और मन्नत का धागा बांधने से हर मनोकामना पूरी होती है. नवरात्रि में यहां विशाल मेले का आयोजन होता है. नाडोल पहुंचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन ‘फालना’ और ‘पाली मारवाड़’ हैं, जबकि नजदीकी हवाई अड्डे जोधपुर (130 किमी) और उदयपुर (140 किमी) में स्थित हैं.