China Europe Trade Dispute: चीन की करेंसी युआन में ट्रेड करना चाहते हैं यूरोपीय देश, फिर डर क‍िस बात का?

China Europe Trade Dispute: चीन की करेंसी युआन में ट्रेड करना चाहते हैं यूरोपीय देश, फिर डर क‍िस बात का?


यूरोपीय देश चाहते हैं क‍ि चीन के साथ ट्रेड चीन की करेंसी युआन में हो, लेकिन उन्‍हें डर भी सता रहा है. दरअसल, यूरोपीय यून‍ियन के अधिकारी अगले महीन चीन जाने की तैयारी कर रहे हैं. मकसद चीन को अपनी मुद्रा युआन का मूल्य बढ़ने देने के लिए मनाना है.यूरोप का मानना है कि युआन की कीमत कम रहने से चीन के सामान यूरोपीय बाजार में सस्ते पड़ते हैं. इससे यूरोप की अपनी कंपनियों के लिए मुकाबला करना मुश्किल हो रहा है.

अंतरराष्ट्रीय कारोबार में किसी सामान की कीमत इस बात से भी प्रभावित होती है कि एक देश की मुद्रा दूसरे देश की मुद्रा के मुकाबले कितनी मजबूत या कमजोर है. मान लीजिए, चीन में बना कोई सामान 100 युआन का है. अगर युआन कमजोर है, तो यूरो के मुकाबले उस सामान की कीमत यूरोप के खरीदार के लिए कम पड़ सकती है. इससे चीन के निर्यातकों को कीमत के मामले में फायदा मिल सकता है. दूसरी तरफ, यूरोप में बना सामान चीनी खरीदारों के लिए महंगा हो सकता है. इसी वजह से यूरोप के कुछ नेता मानते हैं कि चीन की मुद्रा का मूल्य कम रहने से दोनों पक्षों के बीच कारोबार में असंतुलन बढ़ सकता है.

यूरोप को चीन से आखिर शिकायत क्या है?

यूरोप की सबसे बड़ी चिंता चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा है. व्यापार घाटे का मतलब है कि कोई देश दूसरे देश से जितना सामान बेचता है, उससे ज्यादा सामान खरीदता है. यूरोपीय संघ चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन और कई तरह के औद्योगिक उत्पाद खरीदता है. यूरोप के उद्योगों का कहना है कि चीन से आने वाले सस्ते उत्पादों के कारण उनकी कंपनियों के लिए बाजार में टिके रहना मुश्किल हो रहा है. यूरोप की चिंता सिर्फ मुद्रा तक सीमित नहीं है. चीन की बड़ी उत्पादन क्षमता, सरकारी सहायता और कम कीमत पर सामान बेचने की रणनीति को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में यूरोपीय संघ का चीन के साथ वस्तुओं के व्यापार में घाटा 370 अरब यूरो से अधिक था. 2026 में इसके और बढ़ने की आशंका जताई गई है.

फिर यूरोप चीन के साथ युआन में कारोबार क्यों करना चाहता है?

यहां दोनों बातों के बीच अंतर समझना जरूरी है. किसी देश के साथ उसकी मुद्रा में कारोबार करना और उस मुद्रा की कीमत पर सवाल उठाना एक ही बात नहीं है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कंपनियां और देश अलग-अलग मुद्राओं का इस्तेमाल कर सकते हैं. चीन के साथ युआन में भुगतान करने से कुछ कारोबारियों को डॉलर के इस्तेमाल और उससे जुड़ी लागत पर निर्भरता कम करने का विकल्प मिल सकता है. लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि यूरोपीय संघ के सभी देश अब युआन में व्यापार करने जा रहे हैं. मौजूदा विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि चीन की मुद्रा का मूल्य सही स्तर पर है या नहीं और उसका यूरोप के निर्यात, आयात तथा उद्योगों पर क्या असर पड़ता है. यूरोप चीन के साथ व्यापार करना चाहता है, लेकिन साथ ही यह भी चाहता है कि कारोबार में प्रतिस्पर्धा की शर्तें उसके उद्योगों के लिए नुकसानदेह न हों.

जर्मनी के चांसलर ने युआन पर क्या दावा किया?

जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने युआन के मूल्य को लेकर 25 से 30 फीसदी तक कम आंके जाने का दावा किया है. उनके मुताबिक, अगर चीन की मुद्रा का मूल्य इतना कम है, तो यूरोप की कंपनियों के लिए चीनी उत्पादों से कीमत के आधार पर मुकाबला करना मुश्किल होगा. हालांकि, यह मर्ज का आकलन है, कोई सर्वमान्य निष्कर्ष नहीं. मुद्रा का सही मूल्य तय करना आसान नहीं होता. इसके लिए महंगाई, ब्याज दर, उत्पादकता, व्यापार और दूसरी आर्थिक परिस्थितियों को देखना पड़ता है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आकलन का हवाला देते हुए यूरोपीय सेंट्रल बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लागार्ड ने भी युआन के कम मूल्य पर होने की बात कही थी, हालांकि उनका बताया गया अनुमान मर्ज के दावे से कम था. इसलिए 25 से 30 फीसदी वाले आंकड़े को अंतिम तथ्य की तरह पेश करना सही नहीं होगा.

यूरोप के अधिकारी चीन क्यों जा रहे हैं?

यूरोपीय संघ के अधिकारी चीन के साथ व्यापार असंतुलन और मुद्रा नीति पर बातचीत करना चाहते हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, यूरोपीय आयोग के वरिष्ठ आर्थिक अधिकारी मार्टेन वेरवे के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल नवंबर के आखिरी सप्ताह में बीजिंग जा सकता है. इसके बाद यूरोपीय सेंट्रल बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लागार्ड और यूरोपीय अर्थव्यवस्था से जुड़े दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों की चीन यात्रा की योजना भी है. इन बैठकों में चीन की मुद्रा नीति के अलावा यूरोपीय कंपनियों के लिए चीनी बाजार तक पहुंच और व्यापार में प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे उठ सकते हैं. यूरोप चाहता है कि चीन के साथ व्यापार में उसके उद्योगों को बराबरी का मौका मिले. हालांकि, यात्राओं की तारीखें और बातचीत के नतीजे अभी अंतिम नहीं हैं.

चीन ने क्या जवाब दिया और आगे क्या हो सकता है?

चीन ने अपनी मुद्रा को जानबूझकर कमजोर रखकर निर्यात में फायदा लेने के आरोपों को खारिज किया है. चीन के केंद्रीय बैंक का कहना है कि देश को व्यापार में बढ़त हासिल करने के लिए युआन का अवमूल्यन करने की जरूरत नहीं है. चीन का तर्क है कि मुद्रा की कीमत कई आर्थिक और वित्तीय कारकों से तय होती है. ऐसे में यह जरूरी नहीं कि व्यापार घाटे की पूरी वजह सिर्फ विनिमय दर हो. अगर युआन मजबूत होता है, तो कुछ चीनी उत्पाद यूरोप में महंगे पड़ सकते हैं और यूरोपीय कंपनियों को राहत मिल सकती है. लेकिन व्यापार घाटा घटाने के लिए मांग, उत्पादन लागत, सरकारी सहायता और दोनों देशों के बाजारों तक पहुंच जैसे मुद्दे भी अहम रहेंगे.



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