Monorail Crash : ‘ड्राइवरलेस’ मोनोरेल चलते-चलते हो गई अंधी, ट्रैक से लेकर सड़क तक मचा हड़कंप, इंसानी समझ के आगे फिर फेल हुई टेक्नोलॉजी

Monorail Crash : ‘ड्राइवरलेस’ मोनोरेल चलते-चलते हो गई अंधी, ट्रैक से लेकर सड़क तक मचा हड़कंप, इंसानी समझ के आगे फिर फेल हुई टेक्नोलॉजी


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ड्राइवरलेस मोनोरेल चलते-चलते कैसे हो गई अंधी? ट्रैक से लेकर सड़क तक मचा हड़कंप

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ब्राजील के साओ पाउलो शहर में एक बड़ा हादसा हो गया. वहां लाइन 15-सिल्वर पर चल रही एक बिना ड्राइवर वाली ‘मोनोरेल’ ट्रेन ट्रैक पर पड़ी क्रेन से टकरा गई. इस भयानक टक्कर के बाद क्रेन और ट्रेन का भारी मलबा सीधे नीचे सड़क पर गिर गया. इससे पूरी सड़क पर अफरा-तफरी मच गई और ऑटोमैटिक तकनीक की पोल खुल गई. इस घटना से साफ हो गया है कि सिर्फ कंप्यूटर और सेंसर्स के भरोसे रहना बहुत खतरनाक हो सकता है. जब तक एडवांस्ड सेंसर और इंसानी निगरानी का सही तालमेल न हो, तब तक बिना ड्राइवर वाली ये ट्रेनें एक बड़ा खतरा बनी रहेंगी.

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मोनोरेल एक्सिडेंट (फोटो ग्रैब- @GemsOfRailway/X Video)

ब्राजील के साओ पाउलो शहर से आई एक खबर ने पूरी दुनिया के ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट्स और आम लोगों को हैरान कर दिया है. यहां एक एक ‘ड्राइवरलेस’ मोनोरेल ट्रेन ट्रैक पर पड़ी एक क्रेन से टकरा गई. टक्कर इतनी भयानक थी कि क्रेन और ट्रेन का मलबा सीधे नीचे बिजी सड़क पर जा गिरा. इस घटना का जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, उसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है. जिस टेक्नोलॉजी को इंसानी गलतियों से मुक्त और बेहद सुरक्षित मानते आ रहे थे, आखिर वो इतनी बड़ी लापरवाही कैसे कर बैठी?

ड्राइवरलेस मोनोरेल में कैसे हुआ हादसा?

शनिवार, 24 अक्टूबर को साओ पाउलो के विला प्रुडेंटे इलाके में लाइन 15-सिल्वर पर एक बिना ड्राइवर वाली यानी गनीमत रही कि ट्रेन में सवार यात्रियों को कोई गंभीर चोट नहीं आई और नीचे सड़क पर चल रही गाड़ियां भी बाल-बाल बच गईं, वरना एक बड़ा हादसा हो सकता था. वीडियो में साफ़ दिख रहा था कि क्रेन पहले से ट्रैक पर झुकी हुई पड़ी थी और सामने से आती हुई ऑटोमैटिक मोनोरेल ट्रेन बिना रुके सीधी उससे टकरा गई. ट्रेन समय रहते ब्रेक नहीं लगा पाई.

आखिर क्या होती है ‘ड्राइवरलेस मोनोरेल’?

मोनोरेल आम ट्रेनों से काफी अलग होती है. आम ट्रेनें दो पटरियों पर चलती हैं, जबकि मोनोरेल जमीन से काफी ऊपर बने एक सिंगल कंक्रीट या स्टील के बीम के सहारे चलती है. इसके पहिए बीम के ऊपर और किनारों पर ग्रिप बनाकर चलते हैं. जब इसे ड्राइवरलेस बनाया जाता है, तो इसमें आगे के केबिन में कोई इंसानी लोको पायलट नहीं बैठता. ये पूरी तरह से CBTC सिस्टम और कंप्यूटर एल्गोरिदम से चलती है.

  • सेंसर और डेटा नेटवर्क: ट्रेन के अंदर लगे कंप्यूटर, ट्रैक साइड के सेंसर और सेंट्रल कंट्रोल रूम लगातार आपस में वाई-फाई या रेडियो सिग्नल के ज़रिए बात करते हैं.
  • ऑटोमेटिक कंट्रोल: ट्रेन की स्पीड कितनी होगी, वो किस स्टेशन पर कितने सेकंड रुकेगी और कहां ब्रेक लगाएगी, ये सब कंट्रोल रूम में बैठा एक सॉफ्टवोयर तय करता है.
  • इंसानी गलती की गुंजाइश खत्म: इस सिस्टम का सबसे बड़ा वादा ये होता है कि ड्राइवर के थकने, ध्यान भटकने या सिग्नल ओवरशूट जैसी मानवीय गलतियों की संभावना शून्य हो जाती है.

लेकिन साओ पाउलो की घटना ने दिखाया कि ये सुरक्षा केवल तभी तक काम करती है जब तक परिस्थितियां कंप्यूटर के प्रोग्राम किए गए नियमों के अनुसार हों लेकिन आउट ऑफ सिलेबस वाली प्रॉम्लब आते ही टेक्नोलॉजी फेल हो जाती है.

क्यों खतरनाक हो सकती हैं ड्राइवरलेस मोनोरेल? 5 बड़े जोखिम

  1. ड्राइवरलेस सिस्टम का सबसे बड़ा ड्रॉबैक ये है कि वो ‘पैटर्न पहचान’ और ट्रैक सेंसर्स पर निर्भर होते हैं. यदि ट्रैक पर कोई दूसरी ट्रेन आ जाए या सिग्नल रेड हो, तो सिस्टम तुरंत समझ जाता है. लेकिन जब कोई क्रेन, पेड़ की शाखा या बाहरी चीज अचानक ट्रैक पर गिरती है, तो कई बार ऑप्टिकल और रडार सेंसर उसे समय रहते डिटेक्ट नहीं कर पाते. एक इंसानी ड्राइवर दूर से ही किसी असामान्य चीज को देखकर इमरजेंसी ब्रेक लगा सकता है, लेकिन कंप्यूटर केवल अपने तय एल्गोरिदम के अनुसार ही प्रतिक्रिया देता है. साओ पाउलो में यही हुआ, ट्रेन क्रेन को ‘देख’ ही नहीं पाई और सीधे जा टकराई.
  2. मोनोरेल जमीन से कई मीटर ऊपर हवा में बने कंक्रीट पिलर्स पर चलती हैं. अगर किसी ड्राइवरलेस ट्रेन में अचानक आग लग जाए, कंप्यूटर ठप हो जाए या कोई टक्कर हो जाए, तो यात्रियों को बाहर निकालना एक अलग मुसीबत बन जाता है. पारंपरिक ट्रेनों में यात्री ट्रैक पर पैदल उतर सकते हैं, लेकिन मोनोरेल में नीचे सीधे गहरी खाई या चलती सड़कें होती हैं. अगर ट्रेन के अंदर कोई इमरजेंसी ऑपरेटर नहीं है, तो यात्रियों में भगदड़ मचने का खतरा दोगुना हो जाता है.
  3. मोनोरेल सीधे व्यस्त शहरी सड़कों, चौराहों और फ्लाईओवर्स के ऊपर बनाई जाती हैं, इसलिए ट्रैक पर होने वाली किसी भी टक्कर का असर सीधे नीचे की सड़क पर पड़ता है. साओ पाउलो हादसे में जब ट्रेन क्रेन से टकराई, तो धातु और कंक्रीट का भारी मलबा नीचे हाईवो पर गिर गया. गाड़ियां नीचे सामान्य रफ्तार से चल रही थीं, ये महज एक चमत्कार था कि मलबा किसी कार के ऊपर नहीं गिरा.
  4. ड्राइवरलेस ट्रेनें पूरी तरह से वायरलेस नेटवर्क और सेंट्रल सर्वर्स से संचालित होती हैं. इसका मतलब है कि ये सिस्टम हमेशा साइबर हमलों, हैकिंग या सॉफ्टवोयर बग्स के निशाने पर रहते हैं. यदि सेंट्रल सर्वर से सिग्नल ड्रॉप हो जाए या सॉफ्टवोयर में कोई छोटा सा ग्लिच आ जाए, तो पूरी लाइन की ट्रेनें अचानक रुक सकती हैं या फिर खतरनाक तरीके से गलत कमांड ले सकती हैं.
  5. जब किसी सिस्टम को पूरी तरह ऑटोमैटिक बना दिया जाता है तो मान लिया जाता है कि कि वो हर स्थिति को संभाल लेगा. लेकिन तकनीक में इंसानी समझ की कमी होती है. एक लोको पायलट को ट्रैक पर होने वाली छोटी से छोटी हलचल या निर्माण कार्य के खतरों का अंदाजा पहले ही हो जाता है. ड्राइवरलेस सिस्टम में जब तक इमरजेंसी सेंसर ट्रिगर नहीं होता, ट्रेन अपनी तय रफ्तार से आगे बढ़ती रहती है.

साओ पाउलो हादसे से दुनिया को क्या सबक लेना चाहिए?

साओ पाउलो की घटना कोई पहली चेतावनी नहीं है, लेकिन ये इस बात का सीधा इशारा है कि शहरी परिवोन में केवल अंधाधुंध ऑटोमेशन ही काफी नहीं है. जब तक ड्राइवरलेस मोनोरेल के ट्रैक के आसपास निर्माण कार्य हो रहे हों, तब तक अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जैसे-

  • मैनुअल ओवरराइड और वॉचमैन: ट्रैक के आसपास क्रेन या भारी मशीनरी का काम होने पर ऑटोमैटिक सिस्टम के साथ-साथ इंसानी निगरानी जरूर होनी चाहिए.
  • एडवांस लेजर और AI सेंसर: ट्रेनों में ऐसे आधुनिक LiDAR और AI-आधारित कैमरे लगाए जाने चाहिए जो किसी भी आकार की अज्ञात बाधा को 500 मीटर दूर से ही पहचान कर इमरजेंसी ब्रेक लगा सकें.
  • नीचे की सड़कों पर सुरक्षा नेट: एलिवोटेड मोनोरेल पटरियों के नीचे सुरक्षा जाल बनाए जाने चाहिए ताकि दुर्घटना की स्थिति में मलबा सीधे राहगीरों और वाहनों पर न गिरे.

ड्राइवरलेस ट्रेनें यकीनन भविष्य का परिवहन हैं, लेकिन वो सुरक्षित तभी रह सकती हैं जब सुरक्षा प्रोटोकॉल में तकनीक के साथ-साथ इंसानी सतर्कता का सही संतुलन बनाया जाए.



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