दूल्हों ने पहले ही बुक कर लिए सारे रिसॉर्ट्स, अब ‘आत्मा की आवाज़’ से अपने नेताओं को कैसे बचाएंगी पार्टियां?

दूल्हों ने पहले ही बुक कर लिए सारे रिसॉर्ट्स, अब ‘आत्मा की आवाज़’ से अपने नेताओं को कैसे बचाएंगी पार्टियां?


जयपुर. राजस्थान और इसके अलावा भी कई और जगहों पर लोग ये कहते और मानते हैं कि ‘हारे का सहारा बाबा खाटू श्याम हमारा’. पर इस राज्य में समस्या हारे की नहीं, जीतने वालों के सिर पर मंडराती दिख रही है. राजस्थान में ‘एक राज्य, एक चुनाव’ के तहत हज़ारों-हज़ार लोग पंचायतों, जिला पंचायतों और अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ रहे हैं. मतगणना होगी 20 नवंबर के दिन.

भाव-ताव, बिकने-खरीदने या हॉर्स ट्रेडिंग से बचाने के लिए पार्टियां अपने प्रत्याशियों को अलग-अलग होटलों और रिसॉर्ट्स में छिपाती हैं. कहीं इसे ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ कहते हैं, तो कहीं ‘बाड़ेबंदी’. विजयी उम्मीदवारों को और बहुत बार उनके परिवार वालों को अच्छे से अच्छे होटलों और रिसॉर्ट्स में ठहराया जाता है और उनकी भरपूर आवभगत की जाती है. खर्च का नहीं, बल्कि ध्यान इस बात का रखा जाता है कि जीते हुए नेताजी या नेता-पति किसी से कुछ ले-देकर सरक न जाएँ. उन्हें फ़ोन के पास फटकने तक नहीं दिया जाता; मोबाइल ज़ब्त कर लिए जाते हैं और उन्हें शाही क़ैद में तब तक रखा जाता है जब तक वो अपना वोट सही जगह न गिरा दें. लेकिन इस बार ये मुश्किल है, क्योंकि लोकतंत्र का ये त्योहार शादियों के सीज़न में पड़ रहा है.

दामाद जैसी खातिरदारी और ‘आत्मा की आवाज़’ का डर

करीब 9,500 जनप्रतिनिधि जीत कर आएंगे, जिनमें से महिला आरक्षण के कारण आधी महिलाएं होंगी. हर जीते प्रत्याशी की नए दामाद की तरह रखे जाने की उम्मीद होती है और इनकी नाराज़गी कइयों की किस्मत पलट देती है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इन पंचायत चुनावों में दल-बदल कानून लागू नहीं होता है. मतलब आप जीत कर एक पार्टी से आए हों तो भी ‘आत्मा की आवाज़’ पर अपना वोट दूसरे दल के प्रत्याशी को दे सकते हैं, चाहे आप पर बिकने का कोई भी आरोप लगता रहे.

तारीखों का पेंच: एक तरफ बारात, दूसरी तरफ बाड़ेबंदी

ऐसे में पार्टियों का सीधा टकराव शादी वालों से है. अव्वल तो होटलों के कमरे पूरे के पूरे बुक हैं या जहाँ कमरे मिल भी रहे हैं वहाँ जीते प्रत्याशियों को भीड़ और फोन से अलग रखना बेहद कठिन है. पंडित भूदेव शास्त्री के मुताबिक 12 जुलाई 2026 के बाद पहला सावा 20 और 21 नवंबर को आ रहा है. यह विवाह मुहूर्त देवउठनी एकादशी का सावा है जो चातुर्मास के बाद बड़े सावे के रूप में होगा.

इसके बाद 25 और 26 नवंबर को भी बड़ा विवाह मुहूर्त है. फिर 2, 3, 4, 5, 11 और 12 दिसंबर तक विवाह मुहूर्त हैं. इसके बाद एक माह के लिए खरमास लग जाएगा, फिर 15 जनवरी 2027 को ही विवाह मुहूर्त होगा. इधर 20 नवंबर को जिला परिषद सदस्यों और पंचायत समिति सदस्यों के मतों की गणना होगी, वहीं 25 नवंबर को जिला प्रमुख का चुनाव होगा और 27 नवंबर को प्रधान का चुनाव होगा. ऐसे में इस बात को समझा जा सकता है कि न केवल राजस्थान में बल्कि पड़ोसी अन्य राज्यों में भी विवाह के यही मुहूर्त रहने वाले हैं.

नो रूम, नो एंट्री: टूरिस्ट सीज़न में वीआईपी सिक्योरिटी का संकट

जहां राजनीतिक बाड़ेबंदी होती है, वहां किसी अन्य को प्रवेश नहीं दिया जाता है. असल में जब भी राजनीतिक पार्टियों की ओर से बाड़ेबंदी होती है, तो उस होटल और रिसॉर्ट को सुरक्षा घेरे में पार्टियां रखती हैं. उसकी वजह यह है कि किसी भी तरह से बाहरी व्यक्ति से बाड़ेबंदी वाले सदस्यों का मेल-मिलाप या बातचीत न हो पाए. इसके लिए पार्टी के पदाधिकारियों को ज़िम्मेदारी दी जाती है. ऐसे में राजनीतिक पार्टियों को पूरे के पूरे होटल और रिसॉर्ट ही बुक करवाने पड़ते हैं, जो मौजूदा समय में उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं.

क्या बता रहे होटल-बैक्वेट मालिक

जयपुर में हरी वन नाम के बैंक्वेट के मालिक विनोद कुमार शर्मा ने बताया कि विवाह समारोहों के लिए रिसॉर्ट और होटल पहले से ही बुक हैं. इधर पर्यटन सीज़न भी शुरू हो गया है, जिसमें देशी और विदेशी (डोमेस्टिक और इंटरनेशनल) पर्यटक भी बड़ी संख्या में इस दौरान राजस्थान आते हैं. ऐसे में राजस्थान में इतनी बड़ी संख्या में और वह भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के हिसाब से होटल या रिसॉर्ट मिलना मुश्किल होगा.

फ्लैशबैक: 1967 से चल रहा है ‘होटल पॉलिटिक्स’ का यह खेल

होटलों के कमरों को लेकर मची यह आपाधापी बेवजह नहीं है. राजस्थान की राजनीति में बाड़ेबंदी का इतिहास दशकों पुराना है और पार्टियां अच्छी तरह जानती हैं कि पहरा ज़रा भी ढीला पड़ा, तो पासा पलटते देर नहीं लगती. इस सियासी घेराबंदी की शुरुआत 1967 में हुई थी, जब मोहनलाल सुखाड़िया के नेतृत्व वाली कांग्रेस को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. उस दौर में अन्य दलों के विधायकों का समर्थन जुटाने और उन्हें अपने पाले में बनाए रखने के लिए पहली बार एक जगह ठहराने की रणनीति अपनाई गई थी.

जब जनता दल के समर्थन से बनी भाजपा सरकार

इसके बाद 1990 में जब जनता दल के समर्थन से भाजपा की सरकार बनी और भैरोंसिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने, तब भाजपा के पास 85 सीटें थीं और जनता दल के 55 विधायक थे. जनता दल में टूट हुई और एक धड़े ने शेखावत सरकार को समर्थन दिया. उस नाज़ुक मोड़ पर भी अपने खेमे के विधायकों को एकजुट रखने के लिए गुप्त स्थान पर ठहराने और बाड़ेबंदी की खूब चर्चाएं रहीं. साल 2016 के राज्यसभा चुनाव में भी शह-मात का यही खेल दोहराया गया, जब भाजपा ने अपने विधायकों की बाड़ेबंदी कर उन्हें जयपुर के पास एक होटल में रखा.

होटल की दीवार फांदकर एस्केप: जब फेल हो गया पहरा

लेकिन पहरा चाहे जितना सख्त हो, बाड़ेबंदी में सेंधमारी के किस्से भी कम दिलचस्प नहीं रहे. इसका सबसे चर्चित उदाहरण 2019 के जयपुर नगर निगम में देखने को मिला. तब भाजपा की कड़ी बाड़ेबंदी के बीच पार्षद विष्णु लाटा होटल की दीवार फांदकर बाहर निकल भागे और सीधे कांग्रेस के समर्थन से मेयर की कुर्सी पर जा बैठे. दीवार फांदने और पाला बदलने के इसी डर का नतीजा था कि 2020 में जब प्रदेश का बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी लंबी बाड़ेबंदी की. इसी साल जब राज्य के 6 नगर निगमों के चुनाव संपन्न हुए, तो कांग्रेस और भाजपा- दोनों ही दलों ने किसी भी जोखिम से बचने के लिए अपने-अपने पार्षदों को तुरंत होटलों में बंद कर दिया था. साफ है कि राजस्थान की सियासत में ‘शाही क़ैद’ का यह पैंतरा भले ही पुराना हो, लेकिन इस बार लोकतंत्र के इस सियासी दंगल के सामने शादियों के सावे और भरे हुए होटलों ने सबसे बड़ी दीवार खड़ी कर दी है.



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