क्या बिहार की राजनीति में तीसरी ताकत बनने की राह पर प्रशांत किशोर की जन सुराज? MLC चुनाव से JSP को क्या मिला

क्या बिहार की राजनीति में तीसरी ताकत बनने की राह पर प्रशांत किशोर की जन सुराज? MLC चुनाव से JSP को क्या मिला


पटना. बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजों में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को एक तरफ सारण में झटका लगा, तो दूसरी तरफ मिथिला में पार्टी का खाता खुल गया है. सारण शिक्षक सीट से मौजूदा एमएलसी एवं जन सुराज प्रत्याशी आफाक अहमद बुरी तरह चुनाव हार गए. वहीं, मिथिला क्षेत्र की दरभंगा शिक्षक सीट पर सुरेश प्रसाद राय ने जीत दर्ज कर पीके की पार्टी को औपचारिक तौर पर विधान परिषद में एंट्री दिला दी है. बता दें कि जन सुराज ने आठों एमएलसी सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से तीन पर पार्टी के कैंडिडेट हार गए. बाकी चार सीटों के अंतिम नतीजे आने बाकी हैं, लेकिन वहां पर भी मतगणना में जन सुराज उम्मीदवार की हार तय है. लेकिन इतना जरूर हुआ है कि प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी अपनी धमक इस चुनाव में भी दिखा दी है.

दरभंगा की जीत से खुला सदन का दरवाजा

एक ओर आरजेडी और कांग्रेस अलग-अलग कमजोर दिखी, वहीं तीसरे फोर्स के तौर पर जन सुराज उभरती दिख रही है. जन सुराज के लिए दरभंगा शिक्षक सीट की जीत सबसे बड़ी उपलब्धि रही. पार्टी के उम्मीदवार सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मौजूदा एमएलसी मदन मोहन झा को 324 मतों से हराया. इसके साथ ही प्रशांत किशोर की पार्टी को बिहार विधान परिषद में पहली बार प्रतिनिधित्व मिला. ऐसे में यह नतीजा कांग्रेस के लिए भी झटका है, क्योंकि वह अपनी सीट बचाने में नाकाम रही. वहीं, जन सुराज के लिए इसका महत्व इसलिए भी है कि अब पार्टी के पास सदन के भीतर अपनी बात रखने और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक भूमिका निभाने का अवसर होगा.

सारण में हार ने दिखाई जन सुराज की सीमा

दूसरी तरफ सारण शिक्षक सीट का नतीजा जन सुराज के लिए निराशाजनक रहा. यहां पार्टी के मौजूदा एमएलसी आफाक अहमद चुनाव हार गए और निर्दलीय उम्मीदवार राहुल राज ने जीत दर्ज की. यानी पार्टी अपने मौजूदा प्रतिनिधि की सीट भी नहीं बचा सकी. यह नतीजा बताता है कि प्रशांत किशोर की सक्रियता और पार्टी के प्रचार के बावजूद हर क्षेत्र में मतदाताओं का भरोसा जीतना आसान नहीं है. ऐसे में राजनी के जानकारों की नजर में जन सुराज को अब यह समझना होगा कि एक सीट पर मिली सफलता को दूसरे क्षेत्रों में कैसे दोहराया जाए.

आरजेडी और कांग्रेस की कमजोरी से बन रहा है अवसर?

इन चुनावों में कांग्रेस को दरभंगा शिक्षक सीट गंवानी पड़ी, जबकि पटना शिक्षक सीट पर आरजेडी के डॉ. संजीव कुमार ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता नवल किशोर यादव को हराया. आरजेडी के लिए यह बड़ी जीत रही, लेकिन आठ सीटों के पूरे नतीजों में पार्टी को केवल एक सीट मिली. कांग्रेस का प्रदर्शन भी कमजोर रहा. ऐसे में जन सुराज के सामने विपक्षी राजनीति में जगह बनाने का अवसर दिखाई देता है. लेकिन, दूसरी ओर यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि आरजेडी और कांग्रेस की कमजोरी का पूरा लाभ जन सुराज को ही मिलेगा. विपक्षी मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए पार्टी को संगठन, उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों पर लगातार काम करना होगा.

मुस्लिम और यादव मतदाताओं तक पहुंच की चुनौती

दरअसल, प्रशांत किशोर अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं. मुस्लिम मतदाताओं के बीच जन सुराज की संभावनाओं की चर्चा होती रही है. यादव समाज तक पहुंच बनाने के लिए भी पार्टी सक्रिय रही है. राघोपुर की घटना के बाद प्रशांत किशोर की सक्रियता को भी इसी राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है. हालांकि, विधान परिषद चुनाव के नतीजों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मुस्लिम या यादव मतदाता बड़े पैमाने पर जन सुराज की ओर जा रहे हैं. इन निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता और विधानसभा चुनाव का सामाजिक समीकरण अलग होता है. ऐसे में पार्टी की असली परीक्षा तब होगी, जब उसे व्यापक मतदाता समूहों के बीच अपना समर्थन साबित करना होगा.

क्या तीसरे विकल्प की जमीन तैयार हो रही है?

जन सुराज ने सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारकर यह संकेत दिया कि वह केवल प्रचार तक सीमित नहीं रहना चाहती. एक सीट पर जीत ने उसे राजनीतिक पहचान और विधान परिषद में प्रवेश दिया है. लेकिन तीसरी ताकत बनने के लिए केवल एक जीत काफी नहीं होगी. पार्टी को अपने उम्मीदवारों की विश्वसनीयता, बूथ स्तर के संगठन और अलग-अलग क्षेत्रों में स्थायी समर्थन का आधार तैयार करना होगा. उसे यह भी साबित करना होगा कि उसका समर्थन किसी एक उम्मीदवार या स्थानीय समीकरण तक सीमित नहीं है.

जन सुराज के लिए क्या हासिल हुआ?

फिलहाल, एमएलसी चुनाव जन सुराज के लिए न तो पूरी सफलता की कहानी है और न ही असफलता का संकेत. बांकीपुर में बीजेपी को हराने के बाद अब एमएलसी में भी एक सीट जीतकर पीके ने दिखा दिया कि उनकी पार्टी सिर्फ हवा नहीं, जमीन पर भी लड़ रही है. हालांकि 8 में 1 सीट से अभी बड़ी ताकत नहीं कहा जा सकता, लेकिन बिहार की द्विध्रुवीय राजनीति में तीसरे विकल्प की जगह जन सुराज लेती दिख रही है. जहां एक ओर दरभंगा की जीत ने संभावनाओं का दरवाजा खोला है, जबकि सारण की हार ने चुनौतियां सामने रखी हैं. अब प्रशांत किशोर के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे इस शुरुआत को बिहार की व्यापक राजनीति में स्थायी तीसरे विकल्प में बदल पाते हैं.



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