Gurudev Sri Sri Ravi Shankar Massage: वैराग्य शब्द को सुनकर हमारे मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती है जो संसार का त्याग कर किसी एकांत या निर्जन स्थान की ओर पलायन कर चुका है, जो उदासीन और उत्साहहीन है. किंतु यह वैराग्य का वास्तविक स्वरूप नहीं है. वैराग्य का अर्थ उदासीन और निष्क्रिय जीवन नहीं है. वैराग्य वास्तविकता को व्यापक दृष्टि से देखने का नाम है. यह अपने मूल स्वरूप की ओर लौटने का मार्ग है. यह उस स्रोत की ओर यात्रा है, जो असीम उत्साह का भंडार है. यद्यपि वैराग्य और उत्साह एक-दूसरे के विपरीत दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में ये एक-दूसरे के पूरक हैं.
वैराग्य मुक्ति का दाता
अधिकांश लोग सुख-भोग की लालसा से प्रेरित रहते हैं, चाहे वह इस संसार में मिलने वाला सुख हो या परलोक में मिलने वाले आनंद की कल्पना. मन विषय-भोगों की ओर दौड़ता रहता है. वह देखने, सुंघने, चखने, सुनने और स्पर्श करने के सुखों की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है. सुखद अनुभव को पाने की तीव्र लालसा हमें वर्तमान क्षण में जीने से रोक सकती है. यहीं पर वैराग्य अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है. वैराग्य हमें इंद्रिय-सुखों की तृष्णा से मुक्त कर राहत व विश्राम देता है और अपने वास्तविक केंद्र की ओर लौटने में सहायता करता है.
वैराग्य का अर्थ है कि सामने कितना ही सुंदर दृश्य क्यों न हो, आप कह सकें, “अभी मुझे इसे देखने में रुचि नहीं है.” भोजन कितना ही स्वादिष्ट क्यों न हो, आप सहजता से कह सकें, “इस समय मेरी इसमें रुचि नहीं है.” वैराग्य वह अवस्था है, जिसमें मन भौतिक जगत और काल्पनिक स्वर्गिक सुखों की लालसा से मुक्त हो जाता है. जीवन में प्रगति के लिए वैराग्य आवश्यक है.
सुख मन की धारणा मात्र
आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि जब भी आप दुखी या व्यथित होते हैं, उसके पीछे कहीं न कहीं सुख प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होती है. सुख पाने की लालसा ही दुख का कारण बन जाती है. जब आप सुख की चिंता से मुक्त होते हैं, तब मुक्ति की ओर बढ़ते हैं. जब मुक्ति की भी आकांक्षा नहीं रहती, तब आप वास्तव में स्वतंत्र होते हैं. अगर गहराई से समझा जाए तो सुख मन की एक धारणा मात्र है. हम सोचते हैं कि यदि हमें अमुक वस्तु मिल जाए, अमुक परिस्थिति बन जाए और हमारी अमुक इच्छाएं पूरी हो जाएं, तो हम सुखी हो जाएंगे. उदाहरण के लिए, यदि आपको मिठाई, चीनी या किसी विशेष भोजन की लालसा होती है, तो स्वयं से पूछिए कि क्या आप लगातार खाते ही रहना चाहते हैं? सजग होकर देखिए कि इससे आपको वास्तव में क्या मिलता है. इसी प्रकार, यदि आपको सुंदर दृश्य देखने की इच्छा होती है, तो उसे देखते रहिए. लेकिन कितनी देर तक देखते रहेंगे? एक समय ऐसा आएगा, जब आप स्वयं कहेंगे, “बस, अब और नहीं देखना.”
तृष्णा से मुक्त होना वैराग्य
आपका मन असीम आनंद चाहता है, लेकिन पांचों इंद्रियां उसे यह असीमता नहीं दे सकतीं. इसी टकराव में मन बार-बार थकता और बेचैन होता है. इच्छाओं के पीछे लगातार भागते रहने से मन बोझिल हो जाता है. एक बार पीछे मुड़कर अपनी पुरानी इच्छाओं को देखिए. क्या उन्होंने आपको स्थायी विश्राम दिया? नहीं. उन्होंने तो नई इच्छाओं को जन्म दिया और फिर उनके पीछे दौड़ने के लिए प्रेरित किया. यह एक ऐसे झूले की तरह है, जो लगातार गोल-गोल घूमता रहता है. आप बहुत दूर तक यात्रा करते प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में कहीं भी पहुंचते नहीं हैं. इच्छाएं मन को इसी भ्रम में उलझाए रखती हैं. इसका दूसरा छोर है इच्छारहित होने की इच्छा में फंस जाना. जब आप यह संकल्प कर लेते हैं कि आपको कोई इच्छा नहीं रखनी, तो यह संकल्प भी एक नई इच्छा बन जाता है. कुछ लोग अपनी सारी इच्छाओं को नष्ट करने के प्रयास में लगे रहते हैं. यह दृष्टिकोण भी विशेष उपयोगी नहीं है. इंद्रियों के विषयों के साथ विवेकपूर्वक व्यवहार करते हुए अपने आत्मस्वरूप की ओर जाना ही वैराग्य है. कुछ क्षणों के लिए इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर, उनकी तृष्णा से मुक्त होकर अपने मूल स्रोत की ओर लौटना ही वैराग्य है.
ध्यान और वैराग्य
ध्यान के लिए भी वैराग्य एक बुनियादी आवश्यकता है. जब भी आप ध्यान करने बैठें, आपका मन वैराग्य की अवस्था में होना चाहिए. वैराग्य के बिना ध्यान अधिक गहरा नहीं हो पाएगा और आपको वह विश्राम भी नहीं मिलेगा, जिसकी आप तलाश कर रहे हैं. इच्छा पूर्ति के लिए प्रयासरत मन ध्यान में बाधा बनता है. अपेक्षाएं भी ध्यान में अवरोध उत्पन्न करती हैं. आपने किसी से सुना कि ध्यान में प्रकाश दिखाई देता है या स्वर्ग से कोई आकर हाथ पकड़कर ले जाता है. फिर आप आंखें बंद करके स्वयं भी ऐसे अनुभवों की कल्पना करने लगते हैं. ये सब मन की कल्पनाएं हैं. अपनी कल्पनाओं और मनगढ़ंत अपेक्षाओं को छोड़ दीजिए. उन्हें अग्नि में अर्पित कर दीजिए, उन्हें पूरी तरह भस्म होने दीजिए. आखिर आप कितना सुख पाना चाहते हैं और वह सुख कितनी देर तक टिकेगा? एक दिन सब समाप्त हो जाना है.
वैराग्य, दिव्य प्रेम और सेवा
क्या कोई ऐसी चीज भी है, जिसके प्रति हमें वैराग्य नहीं रखना चाहिए? हां, दिव्य प्रेम के प्रति. ईश्वर के प्रति उत्कंठा और सत्संग की चाह को वैराग्य के नाम पर कभी मंद न पड़ने दें. हमारे भीतर ज्ञान प्राप्त करने, साधना करने, भक्ति में डूबने और सेवा करने की प्रेरणा देने वाली एक छोटी-सी अग्नि प्रज्वलित रहती है. कभी-कभी हम ज्ञान का सहारा लेकर इसी अग्नि को बुझाने लगते हैं. आपने लोगों को यह कहते सुना होगा, “कोई बात नहीं, ईश्वर तो सर्वत्र है. वह मेरे हृदय में भी है. जब उसकी इच्छा होगी, तब मुझे ध्यान घटित होगा.” ऐसे बहाने बनाना वैराग्य नहीं है. जब सेवा करने का अवसर आता है, तो मन कहता है, “यह सब तो माया है. संसार तो मिथ्या है. सब कुछ अपने आप हो रहा है. जब समय आएगा, तब सब हो जाएगा.” इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान का उपयोग अपनी सुविधा या आलस्य को उचित ठहराने के लिए किया जाने लगता है. ज्ञान को उसके वास्तविक संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत करना उचित नहीं है. वैराग्य के नाम पर अपने भीतर के उत्साह और रुचि की चिंगारी को बुझने न दें. ज्ञान का ऐसा दुरुपयोग करने पर आप जीवन के अनेक महत्वपूर्ण अवसर खो देते हैं. ईश्वर के प्रति अपनी उत्कंठा और समाज की सेवा करने की भावना को सदैव जीवित रखें.