जौनपुर में शख्स ने मनाई बैल की तेरहवीं, मौत के बाद इंसानों की तरह निभाई रस्में, दिया ब्रह्मभोज का न्योता

जौनपुर में शख्स ने मनाई बैल की तेरहवीं, मौत के बाद इंसानों की तरह निभाई रस्में, दिया ब्रह्मभोज का न्योता


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Jaunpur News: कहते हैं कि इंसान की तरह पशुओं से भी लगाव हो जाता है और फिर वह घर का सदस्य बन जाता है. लेकिन उसके चले जाने के बाद परिवार अधूरा-सा लगता है. कुछ ऐसी ही कहानी है जौनपुर के रामलगन यादव की, जिनके पास एक बैल थी. बैल के गुजरने के बाद उन्होंने उसका रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया और ब्रह्मभोज कराया.

जौनपुर: इंसान और पशु का रिश्ता अक्सर सिर्फ देखभाल तक सीमित नहीं रहता. कई बार कोई पशु परिवार का ऐसा हिस्सा बन जाता है, जिसके जाने का दुख किसी अपने के बिछड़ने जैसा होता है. जौनपुर में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां बैल के निधन पर उसके मालिक ने इंसानों की तरह दसवां और तेरहवीं का कार्यक्रम आयोजित किया. इस आयोजन की क्षेत्र में खूब चर्चा हो रही है.

मामला केराकत क्षेत्र के चकगोविंदपुर गांव का है. यहां के रहने वाले रामलगन यादव के बैल का निधन 15 अक्टूबर 2026 को हो गया था. बैल से उनके गहरे लगाव को देखते हुए परिवार ने 27 अक्टूबर को तेरहवीं संस्कार और ब्रह्मभोज का आयोजन किया. इसके लिए शोक समाचार छपवाकर लोगों को आमंत्रित भी किया गया. आमंत्रण पत्र में बैल का नाम ‘नकछेदन महादेव बाबा’ जी लिखा गया था.

घर का सदस्य बन गया बैल
रामलगन यादव ने बताया कि करीब 16 साल पहले वह इस बैल को 2800 रुपये में खरीदकर घर लाए थे. शुरुआत में इसे कोई लेना नहीं चाहता था. उनके एक मित्र ने भी कहा था कि बैल की ठीक से देखभाल नहीं हुई, तो वह मर जाएगा. हालांकि, रामलगन उसे घर ले आए. उनके पिता ने बैल को देखकर साफ कह दिया कि इसे बेचना नहीं है. इसके बाद उन्होंने बैल को परिवार के साथ ही रखा. धीरे-धीरे बैल से उनका ऐसा लगाव हो गया कि वह घर के सदस्य जैसा बन गया.

वह बताते हैं कि बैल ने अपने जीवन में कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया. समय के साथ उसकी पहचान भी बढ़ती गई और लोग उसे देखने आते थे. रामलगन कहते हैं कि बैल की याद उन्हें रोज आएगी और उसका जाना उनके लिए किसी अपने के बिछड़ने से कम नहीं है.

रीति-रिवाज से किया अंतिम संस्कार, रखा तेरहवीं पर भोज
रामलगन यादव ने बताया कि जिस तरह किसी इंसान की मृत्यु के बाद रीति-रिवाज निभाए जाते हैं, उसी तरह उन्होंने बैल के निधन पर भी क्रिया-कर्म किया. दसवां करने के बाद तेरहवीं पर ब्रह्मभोज रखा गया. इसमें पूरी, सब्जी, पनीर, चावल, दाल और बूंदी सहित कई व्यंजन बनवाए गए. उनका कहना है कि इस आयोजन के पीछे दिखावा नहीं, बल्कि बैल के प्रति वर्षों का लगाव और अपनापन है.

इस अनोखे आयोजन को लेकर गांव और आसपास के इलाकों में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही है. कोई इसे पशु के प्रति प्रेम बता रहा है तो कोई इसे अलग परंपरा मान रहा है. हालांकि, रामलगन यादव के लिए यह आयोजन उस साथी को श्रद्धांजलि देने का तरीका है, जो 16 साल तक उनके परिवार का हिस्सा बना रहा.



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