लाखों फॉलोवर्स होने के बावजूद इन्फ्लुएंसर ओमप्रकाश बिश्नोई पंचायत चुनाव क्यों हारे? जानें हार की कहानी उन्हीं की जुबानी

लाखों फॉलोवर्स होने के बावजूद इन्फ्लुएंसर ओमप्रकाश बिश्नोई पंचायत चुनाव क्यों हारे? जानें हार की कहानी उन्हीं की जुबानी


जोधपुर. सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुंच रखने वाले यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ओमप्रकाश बिश्नोई को सरपंच चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है. जोधपुर जिले की ओसियां तहसील की इंदों की ढाणी द्वितीय ग्राम पंचायत से चुनाव लड़ने वाले ओमप्रकाश को महज 33 वोट मिले, खास बात यह है कि इन वोटों में उनके परिवार के 11 वोट भी शामिल थे. सोशल मीडिया पर लोकप्रियता के दम पर जीत की उम्मीद लगाए बैठे ओमप्रकाश के लिए यह परिणाम काफी चौंकाने वाला रहा.

चुनाव में हार के बाद ओमप्रकाश ने जनता के फैसले को स्वीकार किया है, उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता का निर्णय सबसे ऊपर होता है और उन्हें यह फैसला मंजूर है. उनके मुताबिक, सोशल मीडिया पर लोगों का प्यार मिलना और चुनाव में वोट मिलना दो अलग-अलग बातें हैं. इस चुनाव ने उन्हें जमीनी राजनीति को समझने का मौका दिया है.

95 मिलियन तक आते हैं वीडियो पर व्यूज, जीत की थी उम्मीद
ओमप्रकाश बिश्नोई ने बताया कि सोशल मीडिया पर उनके वीडियो को लाखों लोग देखते हैं, उनके कुछ वीडियो पर 95 मिलियन तक व्यूज आते हैं. देश के अलग-अलग शहरों के साथ विदेशों में भी लोग उन्हें फॉलो करते हैं, इसी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें उम्मीद थी कि पंचायत चुनाव में भी लोग उनका समर्थन करेंगे. ओमप्रकाश को भरोसा था कि वे करीब 100 से 150 वोटों के अंतर से चुनाव जीत सकते हैं. उन्हें लगता था कि सोशल मीडिया पर मिलने वाला प्यार और गांव में किया गया जनसंपर्क उनकी जीत का आधार बनेगा. हालांकि, मतगणना के बाद परिणाम उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग निकला और उन्हें केवल 33 वोट मिले.

15 दिन तक घर-घर जाकर मांगे वोट
ओमप्रकाश ने बताया कि उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए करीब 15 दिन तक लगातार मेहनत की, वे गांव में पैदल घूमे और घर-घर जाकर लोगों से मिले. इस दौरान उन्होंने मतदाताओं से गांव के विकास के नाम पर वोट मांगे, उनका कहना है कि कई लोगों ने उन्हें जीत का भरोसा भी दिलाया था. उन्होंने बताया कि प्रचार के दौरान लोगों से बातचीत की, उनकी समस्याएं सुनी और बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया. चुनाव को लेकर वे काफी गंभीर थे और जीत की उम्मीद में दिन-रात मेहनत कर रहे थे, इसके बावजूद मतदान के दिन लोगों ने जो फैसला लिया, वह उनके अनुमान से अलग था.

गौसेवा और गांव के विकास के लिए लड़ना चाहते थे चुनाव
ओमप्रकाश के अनुसार, राजनीति में उतरने का उनका मकसद गांव का विकास करना था, उन्होंने बताया कि वे पिछले करीब 35 वर्षों से धार्मिक कार्यों और गौसेवा से जुड़े हैं. उनका दावा है कि वे करीब 1500 गायों की सेवा करते हैं और नवग्रह मंदिर का निर्माण भी करवा चुके हैं. ओमप्रकाश का सपना था कि सरपंच बनने के बाद सरकारी योजनाओं का लाभ गांव के हर परिवार तक पहुंचे. वे गांव में विकास कार्य करवाना चाहते थे, उन्होंने बताया कि वे पिछले करीब 10 वर्षों से सरपंच बनने के बारे में सोच रहे थे और इस बार चुनाव मैदान में उतरकर अपनी किस्मत आजमाई.

बोले- अगले पांच साल तक लोगों के बीच रहूंगा
चुनाव में हार मिलने के बाद भी ओमप्रकाश ने गांव के लोगों से दूरी नहीं बनाने की बात कही है, उन्होंने कहा कि वे अगले पांच साल तक लोगों के संपर्क में रहेंगे और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करेंगे. ओमप्रकाश ने अपने अनुभव से मिली सीख साझा करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होना और चुनाव जीतना अलग-अलग बातें हैं. चुनाव जीतने के लिए लोगों का भरोसा हासिल करना जरूरी है. उन्होंने जनता के फैसले का सम्मान करते हुए कहा कि जीवन में मिलने वाली ठोकरें बहुत कुछ सिखाती हैं, अब वे इस अनुभव से सीख लेकर आगे बढ़ेंग.



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